
भागलपुर। भारतीय वांग्मय के सबसे समृद्ध ग्रंथ श्रीमद्भागवत महापुराण की कथाएं जब जनमानस के बीच पहुंचती हैं, तो वे केवल शब्द नहीं रह जातीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव बन जाती हैं। भागलपुर के आध्यात्मिक वातावरण में इन दिनों राजा परीक्षित के जन्म की वह दिव्य कथा चर्चा का केंद्र बनी हुई है, जो विनाश के बीच सृजन और अधर्म के अंधकार के बीच ईश्वरीय प्रकाश की विजय का सबसे बड़ा प्रमाण है। यह कथा उस संधि काल की है जब द्वापर युग अपनी विदा ले रहा था और कलयुग अपनी आहट दे रहा था। इस कथा का केंद्र बिंदु है एक ऐसा बालक, जिसने जन्म लेने से पहले ही मृत्यु का साक्षात्कार किया और जिसने अपनी रक्षा स्वयं भगवान के हाथों होते देखी। पांडव वंश के अंतिम दीप परीक्षित के जन्म की यह गाथा आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी हजारों वर्ष पूर्व थी, क्योंकि यह हमें सिखाती है कि जब संसार के सभी अस्त्र और शस्त्र विफल हो जाते हैं, तब केवल ‘विश्वास’ और ‘शरणागति’ ही रक्षक बनती है।
कुरुक्षेत्र की राख से उपजा विनाश का अंतिम संकल्प
महाभारत का वह भीषण युद्ध समाप्त हो चुका था। कुरुक्षेत्र की मिट्टी लहू से सनी हुई थी और गांधारी के सौ पुत्रों का अहंकार काल के गाल में समा चुका था। पांडवों ने युद्ध तो जीत लिया था, लेकिन उनके भीतर एक रिक्तता थी। जीत के उस जश्न के बीच भी एक गहरा सन्नाटा पसरा था। इसी सन्नाटे के बीच प्रतिशोध की एक ऐसी अग्नि सुलग रही थी, जिसने मर्यादा की सभी सीमाओं को लांघ दिया। गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने पांडवों के वंश को समूल नष्ट करने का एक आत्मघाती संकल्प लिया। अश्वत्थामा का क्रोध इतना अंधा था कि उसने पांडवों के सोते हुए पुत्रों का वध करने के बाद भी अपनी प्यास शांत नहीं की। उसे पता था कि अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पांडव वंश का अंतिम अंकुर पल रहा है। पांडवों के अस्तित्व को जड़ से मिटाने के लिए अश्वत्थामा ने उस अमोघ अस्त्र का आह्वान किया, जिसका प्रतिकार किसी साधारण योद्धा के वश में नहीं था— ‘ब्रह्मास्त्र’।
ब्रह्मास्त्र की वह विनाशकारी ज्वाला उत्तरा के गर्भ की ओर बढ़ी। यह एक ऐसी स्थिति थी जहां न अर्जुन का गांडीव काम आ सकता था और न भीम की गदा। एक अजन्मे शिशु पर ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली अस्त्र का प्रयोग करना युद्ध के इतिहास का सबसे कायरतापूर्ण कृत्य था। उत्तरा भयभीत थी, व्याकुल थी। उसके पास भागने का कोई मार्ग नहीं था। उस संकट की घड़ी में उत्तरा ने केवल एक ही नाम पुकारा, जो हर युग में दीन-हीन और असहायों का सहारा रहा है— ‘कृष्ण’।
गर्भ के भीतर कृष्ण का सुदर्शन और जीवन का कवच
जब उत्तरा ने कृष्ण की शरण ली, तब द्वारकाधीश ने अपनी माया का एक ऐसा स्वरूप प्रकट किया जो आज भी भक्तों को रोमांचित कर देता है। कृष्ण ने देखा कि ब्रह्मास्त्र की अग्नि उत्तरा के शरीर को नहीं, बल्कि उसके भीतर पल रहे ‘भविष्य’ को भस्म करने पर तुली है। तब कृष्ण ने सूक्ष्म रूप धारण कर उत्तरा के गर्भ में प्रवेश किया। श्रीमद्भागवत के वर्णन के अनुसार, गर्भ के भीतर जहां काल का नंगा नाच होने वाला था, वहां कृष्ण ने अपने ‘सुदर्शन चक्र’ का सुरक्षा कवच तैयार कर दिया। सुदर्शन चक्र की शीतल और ओजस्वी किरणों ने ब्रह्मास्त्र की उस भीषण गर्मी को सोख लिया।
वह बालक, जो अभी संसार की हवा से भी अपरिचित था, अपनी मां के गर्भ के भीतर भगवान के चतुर्भुज रूप का दर्शन कर रहा था। वह देख रहा था कि एक तेजोमय पुरुष उसके चारों ओर घूम रहे विनाश को अपनी अंगुली पर नाचते चक्र से शांत कर रहा है। वह दिव्य पुरुष कोई और नहीं, स्वयं योगेश्वर कृष्ण थे। गर्भ के भीतर हुआ वह साक्षात्कार ही उस बालक के भविष्य की नींव बना। ब्रह्मास्त्र विफल हो गया और पांडव वंश का वह अंतिम दीप बुझने से बच गया। यह घटना हमें यह संदेश देती है कि ईश्वर की सुरक्षा में रहने वाले का बाल भी बांका नहीं हो सकता, चाहे पूरी सृष्टि का विनाशक अस्त्र ही उसके विरुद्ध क्यों न छोड़ दिया जाए।
’परीक्षित’: हर चेहरे में ईश्वर को खोजने वाली एक दिव्य दृष्टि
समय चक्र अपनी गति से चला और उत्तरा ने एक अत्यंत ओजस्वी बालक को जन्म दिया। इस बालक के जन्म पर पांडवों के घर में वह खुशियां लौटीं जो बरसों पहले खो गई थीं। लेकिन इस बालक का व्यवहार अन्य शिशुओं से एकदम अलग था। जैसे ही इस बालक ने अपनी आंखें खोलीं, वह हर आने-जाने वाले व्यक्ति के चेहरे को बहुत ध्यान से देखता था। वह मानो किसी को तलाश रहा था। वह हर चेहरे की ‘परीक्षा’ लेता था कि क्या यह वही पुरुष है जिसे उसने गर्भ के अंधेरे में देखा था? क्या यह वही तेजोमय रूप है जिसने उसे ब्रह्मास्त्र की ज्वाला से बचाया था?
बालक की इसी अनोखी प्रवृत्ति के कारण उसका नाम ‘परीक्षित’ पड़ा। परीक्षित का अर्थ है— जो परीक्षा ले या जो परख करे। परीक्षित का पूरा जीवन उस दिव्य रूप की खोज में बीता जिसे उन्होंने जन्म से पहले देखा था। उनकी यह दृष्टि यह भी सिखाती है कि एक बार यदि जीव को ईश्वर के सत्य स्वरूप का आभास हो जाए, तो फिर संसार की कोई भी वस्तु उसे तृप्त नहीं कर सकती। वह हर क्षण केवल उसी परम तत्व की खोज में लगा रहता है। परीक्षित केवल एक राजा नहीं थे, वे एक ऐसे जिज्ञासु थे जिनके भीतर ईश्वर को पाने की तड़प उनके अस्तित्व के साथ ही पैदा हुई थी।
धर्म का शासन और कलयुग की आहट का मुकाबला
जब युधिष्ठिर ने अपनी जीवन यात्रा पूरी की और पांडव हिमालय की ओर प्रस्थान करने लगे, तब उन्होंने राज्य की बागडोर परीक्षित के हाथों में सौंपी। परीक्षित ने अपने पूर्वजों के पदचिन्हों पर चलते हुए एक ऐसे राज्य की स्थापना की जहां न्याय और सत्य का शासन था। उनके शासनकाल में प्रजा इतनी सुखी थी कि रामराज्य की स्मृतियां ताजा हो गई थीं। लेकिन समय की अपनी गति होती है। परीक्षित के शासनकाल के दौरान ही कलयुग का आगमन हुआ।
कथाओं में उल्लेख मिलता है कि परीक्षित ने जब देखा कि कलयुग एक बैल (धर्म) के पैरों पर प्रहार कर रहा है, तो उन्होंने तुरंत अपनी तलवार निकाल ली। कलयुग ने जब परीक्षित का प्रताप देखा, तो वह उनके चरणों में गिर गया। परीक्षित ने उसे रहने के लिए स्थान दिए, लेकिन स्वर्ण (अधर्म की कमाई) में कलयुग का वास होना उनके स्वयं के पतन का कारण बना। परीक्षित की कथा यह भी दर्शाती है कि कलयुग कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, जब तक राजा या शासक धर्म पर अडिग रहता है, तब तक नकारात्मक शक्तियां समाज पर हावी नहीं हो सकतीं। उनका जीवन अनुशासन और मर्यादा का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
आस्था और ज्ञान का वह शाश्वत संदेश जो आज भी जीवित है
भागलपुर के विद्वानों और कथावाचकों का मानना है कि परीक्षित की जन्म कथा केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं है, बल्कि यह हमारे अंतर्मन की कथा है। उत्तरा का गर्भ हमारी ‘आत्मा’ का प्रतीक है और अश्वत्थामा का ब्रह्मास्त्र उन ‘विषयों और विकारों’ का प्रतीक है जो हमारी सात्विकता को नष्ट करना चाहते हैं। कृष्ण का सुदर्शन वह ‘ज्ञान और भक्ति’ है जो हमें इन विकारों से बचाता है।
आज के भागदौड़ भरे जीवन में, जहां हर व्यक्ति किसी न किसी अदृश्य ब्रह्मास्त्र (तनाव, असफलता, बीमारियां) से घिरा हुआ है, परीक्षित की कथा एक नया भरोसा जगाती है। यह कथा बताती है कि संकट के समय यदि हम भी उत्तरा की भांति निष्काम भाव से ईश्वर को पुकारें, तो आज भी वह सुदर्शन चक्र हमारी रक्षा के लिए सक्रिय हो सकता है। परीक्षित का जन्म यह प्रमाणित करता है कि पांडव वंश का अंत नहीं हुआ, क्योंकि धर्म कभी मरता नहीं है। धर्म का एक अंश हमेशा सुरक्षित रहता है ताकि वह नए युग की रचना कर सके।
इस प्रकार, राजा परीक्षित की जन्म कथा हमें आस्था के उस धरातल पर ले जाती है जहां तर्क समाप्त हो जाते हैं और केवल भक्ति का साम्राज्य शुरू होता है। भागलपुर के इस आध्यात्मिक परिवेश में राजा परीक्षित की कथा का श्रवण करना श्रोताओं के लिए किसी दिव्य अनुभूति से कम नहीं है। यह कथा हमें याद दिलाती है कि हम सभी अपने जीवन में ‘परीक्षित’ ही हैं, जो हर रोज इस संसार में उस ईश्वर के अंश की तलाश कर रहे हैं, जो हमारे भीतर ही कहीं सुरक्षित है।
राजा परीक्षित की यह दिव्य गाथा भागलपुर के लोगों के हृदय में धर्म की उस अलख को और अधिक प्रज्वलित कर रही है, जो कलयुग के थपेड़ों के बीच भी हमें सत्य की राह दिखाने का सामर्थ्य रखती है।


