भागलपुर की रसोई में ‘पुराने दौर’ की वापसी: गैस संकट ने छीनी आधुनिकता की चमक, मिट्टी के चूल्हे और कोयले की भट्टी का बढ़ा क्रेज

मध्य पूर्व के तनाव ने बिगाड़ा घरेलू बजट, एलपीजी की किल्लत के बीच फिर से सुलगने लगीं अंगीठियां; शादी-ब्याह के सीजन में कैटरिंग व्यवसाय पर सबसे बड़ा प्रहार

भागलपुर। रेशम नगरी भागलपुर के घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में आधुनिकता का प्रतीक बन चुका ‘नीला फ्लेम’ यानी एलपीजी गैस अब धीरे-धीरे गायब होने लगा है। दुनिया के दूसरे कोने यानी मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में उपजे युद्ध और तनाव के हालात ने सात समंदर पार भागलपुर की रसोई की तस्वीर बदल दी है। पेट्रोलियम पदार्थों और एलपीजी के आयात पर पड़े अंतरराष्ट्रीय असर ने स्थानीय बाजारों में गैस सिलेंडर की ऐसी किल्लत पैदा की है कि लोग अब विवश होकर अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं। शहर के पॉश इलाकों से लेकर सुदूर ग्रामीण अंचलों तक, अब रसोई गैस के चूल्हों की जगह मिट्टी के चूल्हों और कोयले की भट्टियों ने लेनी शुरू कर दी है। यह बदलाव केवल एक मजबूरी नहीं, बल्कि एक ऐसे संकट की आहट है जिसने साबित कर दिया है कि वैश्विक अस्थिरता कैसे एक आम नागरिक के चूल्हे तक पहुंच जाती है।

​भागलपुर के बाजारों में इन दिनों एक अजीब सा विरोधाभास देखने को मिल रहा है। जहां इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स और आधुनिक उपकरणों की दुकानों पर सन्नाटा है, वहीं कुम्हारों की गलियों और लोहारों की दुकानों पर ग्राहकों की लंबी कतारें लगी हैं। लोग पुराने दौर की यादों को ताजा करते हुए मिट्टी के चूल्हे और लोहे की सिगड़ी (भट्टी) खरीदने के लिए आपाधापी कर रहे हैं।

भागलपुर की रसोई में 'पुराने दौर' की वापसी: गैस संकट ने छीनी आधुनिकता की चमक, मिट्टी के चूल्हे और कोयले की भट्टी का बढ़ा क्रेज

​वैश्विक संकट का स्थानीय असर: क्यों ठप हुई गैस की सप्लाई?

​दरअसल, पिछले कुछ हफ्तों से मध्य पूर्व में बने युद्ध के हालातों ने कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मार्गों को बाधित कर दिया है। भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। जहाजों की आवाजाही में हो रही देरी और बढ़ते फ्रेट चार्जेस (माल ढुलाई शुल्क) के कारण भागलपुर जैसे जिलों में गैस की लोडिंग और अनलोडिंग की प्रक्रिया काफी धीमी हो गई है।

​स्थानीय गैस एजेंसियों के बाहर उपभोक्ताओं की भारी भीड़ देखी जा सकती है, लेकिन स्टॉक की कमी के कारण उन्हें बैरंग लौटना पड़ रहा है। कई इलाकों में तो गैस की प्रतीक्षा सूची (Backlog) हफ्तों से महीनों में बदल गई है। इसी अनिश्चितता ने आम आदमी को विकल्प तलाशने पर मजबूर कर दिया है। भागलपुर के उपभोक्ताओं का मानना है कि गैस के लिए हफ्तों इंतजार करने से बेहतर है कि पुराने तरीके अपनाकर कम से कम समय पर भोजन तो तैयार हो सके।

​कुम्हारों के आंगन में लौटी रौनक: 300 से 5 हजार तक बिक रहे चूल्हे

​भागलपुर के नाथनगर, हबीबपुर और सुल्तानगंज जैसे इलाकों में जहां कभी मिट्टी के चूल्हे बनाने वाले कलाकार गुमनामी में खो गए थे, वहां अब दिन-रात काम चल रहा है। बाजार में इन दिनों लाल मिट्टी से बने पारंपरिक चूल्हों की मांग में जबरदस्त उछाल आया है। दुकानों पर साधारण एक मुंह वाले चूल्हे से लेकर आधुनिक डिजाइन वाले दो मुंह के मिट्टी के चूल्हे उपलब्ध हैं।

​कीमतों की बात करें तो एक सामान्य मिट्टी का चूल्हा 300 रुपये से शुरू होकर, विशेष फिनिशिंग और डिजाइन वाले चूल्हे 5000 रुपये तक में बिक रहे हैं। कुछ चूल्हों में तो अब पोर्टेबल डिजाइन भी दिए जा रहे हैं ताकि उन्हें आसानी से कहीं भी रखा जा सके। दुकानदारों का कहना है कि उन्होंने पिछले दस वर्षों में चूल्हों की ऐसी मांग कभी नहीं देखी थी। लोग न केवल चूल्हे खरीद रहे हैं, बल्कि उन्हें जलाने के लिए जरूरी लकड़ी और उपलों (गोबर के कंडे) का स्टॉक भी जमा करने लगे हैं।

​व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की मजबूरी: कोयले की भट्टी बनी सहारा

​गैस संकट का सबसे भयावह असर भागलपुर के होटल और रेस्टोरेंट उद्योग पर पड़ा है। व्यावसायिक गैस सिलेंडरों की कीमतें न केवल आसमान छू रही हैं, बल्कि उनकी उपलब्धता भी ना के बराबर हो गई है। शहर के नामी रेस्टोरेंट से लेकर सड़क किनारे के ढाबों तक, अब शेफ और रसोइए गैस के नॉब घुमाने के बजाय कोयले को धधकाने में लगे हैं।

​होटल संचालकों का कहना है कि कोयले की भट्टी पर खाना बनाने में समय और मेहनत तो ज्यादा लगती है, लेकिन इसके अलावा उनके पास कोई रास्ता नहीं बचा है। कोयले की भारी मांग के कारण बाजार में कोयले के दाम भी बढ़ गए हैं, लेकिन गैस की तुलना में यह अब भी एक सुलभ विकल्प नजर आ रहा है। कई बड़े होटलों ने तो अपने मेन्यू में ‘तंदूरी’ और ‘देसी’ फ्लेवर वाले व्यंजनों की संख्या बढ़ा दी है ताकि कोयले के उपयोग को ग्राहकों के सामने एक ‘विशेषता’ के रूप में पेश किया जा सके।

​कैटरिंग व्यवसाय पर ‘दोहरी मार’: शादियों के सीजन में साख पर संकट

​भागलपुर में इस समय लगन (शादी-विवाह) का सीजन अपने चरम पर है। ऐसे में कैटरिंग व्यवसाय से जुड़े लोगों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। बड़े आयोजनों में जहां सैकड़ों लोगों का खाना कम समय में तैयार करना होता है, वहां एलपीजी गैस की भूमिका अनिवार्य होती है। सिलेंडरों की किल्लत के कारण कई कैटरर्स ने अपने ऑर्डर तक रद्द करने शुरू कर दिए हैं।

​कैटरिंग व्यवसायी बताते हैं कि कोयले या लकड़ी पर बड़े पैमाने पर खाना बनाना न केवल कठिन है, बल्कि इससे समय का प्रबंधन करना भी मुश्किल हो जाता है। इसके बावजूद, मजबूरी में वे भारी-भरकम कोयले के चूल्हे और भट्टियां खरीद रहे हैं। कुछ कैटरर्स ने तो अब शादियों के मेन्यू में बदलाव करना शुरू कर दिया है ताकि कम गैस की खपत वाले पकवान बनाए जा सकें। इस संकट ने न केवल उनके मुनाफे को प्रभावित किया है, बल्कि ग्राहकों के साथ उनके संबंधों और व्यावसायिक साख पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

​आधुनिकता बनाम परंपरा: संकट ने सिखाया जीवन का सबक

​भागलपुर की सड़कों पर सुबह-शाम उठने वाला धुआं अब केवल प्रदूषण का संकेत नहीं, बल्कि एक सामाजिक बदलाव और मजबूरी का प्रतीक बन गया है। जिन घरों में मॉड्यूलर किचन और चिमनी लगी थीं, वहां अब बालकनी या आंगन के कोने में मिट्टी का चूल्हा सुलग रहा है। यह स्थिति एक बड़े जीवन दर्शन की ओर भी इशारा करती है कि जब वैश्विक संकट दस्तक देते हैं, तो हमारी आधुनिक और निर्भर रहने वाली सुविधाएं ताश के पत्तों की तरह ढह जाती हैं।

​बुजुर्गों का कहना है कि पुराने दौर में जब गैस नहीं थी, तब भी जीवन चलता था और भोजन का स्वाद भी बेहतर होता था। हालांकि, आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में इस बदलाव को अपनाना आसान नहीं है, लेकिन भागलपुर के लोगों ने साबित कर दिया है कि वे परिस्थितियों के साथ समझौता करने और वैकल्पिक रास्ते तलाशने में माहिर हैं। गैस एजेंसियों के चक्कर काटने से बेहतर अब लोगों को कोयले की आंच में अपनी रसोई का भविष्य नजर आ रहा है। फिलहाल, जब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार और आपूर्ति श्रृंखला सामान्य नहीं होती, भागलपुर की रसोई में धुएं और राख का यह दौर जारी रहने की संभावना है।

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