​मानवता को शर्मसार करने वाला ‘किडनी कांड’: आठ झोलाछापों ने मिलकर कर दिया समस्तीपुर के आयुष का ‘ऑपरेशन’, ओटी मैनेजर निकला मुख्य सरगना ‘डॉक्टर’ अली

पटना/समस्तीपुर। चिकित्सा जगत में ‘भगवान’ का दर्जा रखने वाले डॉक्टरों के लिबास में छिपे मौत के सौदागरों का एक ऐसा घिनौना चेहरा सामने आया है, जिसने पूरे बिहार और उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मचा दिया है। केशव नगर के आहूजा अस्पताल में पिछले शनिवार की रात जो कुछ भी हुआ, वह किसी डरावनी फिल्म की पटकथा से कम नहीं है। समस्तीपुर के रहने वाले मासूम आयुष की किडनी निकालने वाली टीम के बारे में शुक्रवार को जो खुलासे हुए, वे दिल दहला देने वाले हैं। जिस टीम ने आयुष के शरीर को चीरकर उसकी किडनी निकाली और उसे पारुल नामक महिला के शरीर में ट्रांसप्लांट करने का दावा किया, उस पूरी आठ सदस्यीय टीम में एक भी प्रमाणित सर्जन या डॉक्टर मौजूद नहीं था। 4 अप्रैल 2026 की यह रिपोर्ट उस ‘ब्लैक मार्केट’ की परतें खोलती है जहाँ इंसानी अंगों की कीमत चंद रुपयों में तय की जाती है और ऑपरेशन टेबल पर चाकू चलाने वाले पेशेवर अपराधी होते हैं।

‘डॉक्टर’ नहीं, ओटी मैनेजर है मुदस्सर अली: पत्नी ने ही खोली पोल

​इस पूरे किडनी गिरोह का मास्टरमाइंड, जिसे अब तक ‘डॉक्टर अली’ के नाम से जाना जा रहा था, दरअसल दिल्ली के उत्तम नगर का रहने वाला एक मामूली ओटी मैनेजर निकला। पुलिस की जांच में यह तथ्य उजागर हुआ है कि उसका पूरा नाम मुदस्सर अली सिद्दीकी है। वह खुद को डॉक्टर बताकर पिछले कई वर्षों से अस्पतालों में ‘ऑपरेशन’ का खेल खेल रहा था।

​शुक्रवार को जब पुलिस की एक विशेष टीम ने दिल्ली के उत्तम नगर स्थित उसके घर पर छापा मारा, तो मुदस्सर अली अपना मोबाइल बंद कर फरार हो चुका था। हालांकि, उसकी पत्नी ने पुलिस के सामने जो गवाही दी, उसने पूरे मामले की दिशा ही बदल दी। अली की पत्नी ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि उसका पति कोई डॉक्टर नहीं है, बल्कि उसने केवल अस्पतालों के ऑपरेशन थिएटर में काम करके कुछ बुनियादी चीजें सीखी थीं। इसी अल्प ज्ञान के आधार पर उसने ‘डॉक्टर अली’ का मुखौटा पहन लिया और मानव अंगों की तस्करी के इस गंदे धंधे में उतर गया। पुलिस अब उसके पुराने रिकॉर्ड खंगाल रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि उसने अब तक कितने और लोगों की जिंदगी को जोखिम में डाला है।

आठ झोलाछाप और एक बेबस मरीज: आहूजा अस्पताल की ‘कसाईखाना’ कार्यशैली

​किडनी कांड का सबसे भयावह पहलू यह है कि आयुष का ऑपरेशन करने वाली आठ लोगों की टीम में सभी के सभी ‘झोलाछाप’ थे। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, किडनी ट्रांसप्लांट एक अत्यंत जटिल प्रक्रिया है, जिसे करने के लिए वर्षों के अनुभव और विशेषज्ञों की एक पूरी टीम (जिसमें नेफ्रोलॉजिस्ट, यूरोलॉजिस्ट और एनेस्थेटिस्ट शामिल हों) की आवश्यकता होती है। लेकिन आहूजा अस्पताल के इस ऑपरेशन थिएटर में नियम-कानून और नैतिकता की बलि चढ़ा दी गई।

​गिरफ्तार किए गए आरोपियों में गाजियाबाद का ओटी मैनेजर राजेश कुमार और ओटी असिस्टेंट कुलदीप शामिल हैं। पुलिस ने इन दोनों को शुक्रवार को जेल भेज दिया है। इन दोनों ने पूछताछ में स्वीकार किया है कि वे केवल पैसों के लालच में इस गिरोह का हिस्सा बने थे। राजेश और कुलदीप का काम केवल ऑपरेशन में मदद करना था, लेकिन वे खुद ही सर्जन बनकर आयुष के शरीर पर चाकू चला रहे थे। यह घटना सीधे तौर पर ‘अंग प्रत्यारोपण अधिनियम’ (Transplantation of Human Organs Act) का खुला उल्लंघन है और इस मामले में अस्पताल प्रबंधन की भूमिका भी अब संदेह के घेरे में है।

समस्तीपुर से केशव नगर तक का ‘डेथ कॉरिडोर’ (विशेष विश्लेषण)

​द वॉयस ऑफ बिहार के विशेष विश्लेषण के अनुसार, इस किडनी कांड के तार बिहार के समस्तीपुर से जुड़े हुए हैं। समस्तीपुर जैसे इलाकों के गरीब और भोले-भाले युवाओं को अक्सर नौकरी या इलाज के नाम पर झांसा देकर बड़े शहरों के इन ‘फर्जी अस्पतालों’ तक लाया जाता है।

  1. पीड़ित का चयन: आयुष जैसे युवाओं को निशाना बनाना इसलिए आसान होता है क्योंकि वे आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं और उनके पास कानूनी प्रक्रियाओं की जानकारी नहीं होती।
  2. अस्पतालों की संलिप्तता: आहूजा अस्पताल जैसे छोटे और मध्यम स्तर के निजी अस्पतालों में अक्सर प्रशासन की नाक के नीचे ऐसे अवैध काम होते हैं। सवाल यह उठता है कि क्या अस्पताल प्रबंधन को यह नहीं पता था कि उनके ओटी में एक भी सर्जन मौजूद नहीं है?
  3. झोलाछापों का बढ़ता जाल: चिकित्सा के क्षेत्र में बढ़ती लागत और डॉक्टरों की कमी का फायदा उठाकर मुदस्सर अली जैसे अपराधी खुद को विशेषज्ञ बताकर क्लीनिक चलाने लगते हैं।

लापता ‘डॉक्टर’ की तलाश में खाकी की दबिश

​सिटी एसपी और संबंधित जांच टीम ने स्पष्ट किया है कि मुदस्सर अली सिद्दीकी उर्फ डॉक्टर अली इस पूरे रैकेट की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। उसकी गिरफ्तारी से यह पता चल पाएगा कि पारुल (किडनी प्राप्त करने वाली महिला) को यह किडनी कितने में बेची गई थी और इस गिरोह के तार और किन-किन शहरों से जुड़े हैं। पुलिस को अंदेशा है कि यह एक अंतरराज्यीय गिरोह है जिसका नेटवर्क दिल्ली, बिहार और उत्तर प्रदेश के कई निजी अस्पतालों में फैला हुआ है।

​दिल्ली पुलिस के सहयोग से पटना और स्थानीय पुलिस मुदस्सर के संभावित ठिकानों पर छापेमारी कर रही है। उसके कॉल डेटा रिकॉर्ड (CDR) से यह भी संकेत मिले हैं कि वह कई अन्य ‘पैथोलॉजी लैब्स’ और ‘ब्लड बैंकों’ के संपर्क में भी था, जो अवैध अंग व्यापार में सहायक की भूमिका निभाते हैं।

चिकित्सा जगत पर कलंक और सुधार की जरूरत

​एक तरफ जहाँ भारत दुनिया भर में ‘मेडिकल टूरिज्म’ के लिए अपनी पहचान बना रहा है, वहीं दूसरी ओर ऐसे किडनी कांड पूरी दुनिया में हमारी बदनामी का कारण बनते हैं। आयुष की किडनी निकालने के बाद उसे जिस स्थिति में छोड़ा गया, वह हत्या के प्रयास से कम नहीं है। झोलाछापों द्वारा की गई सर्जरी के कारण मरीज को संक्रमण (Sepsis) और मल्टी-ऑर्गन फेलियर का गंभीर खतरा होता है।

  • प्रशासनिक जिम्मेदारी: स्वास्थ्य विभाग को चाहिए कि वे निजी अस्पतालों के ओटी का नियमित और औचक निरीक्षण करें। केवल पंजीकरण (Registration) काफी नहीं है, बल्कि वहां तैनात डॉक्टरों की डिग्री का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) भी अनिवार्य होना चाहिए।
  • जनता की जागरूकता: समस्तीपुर और बिहार के अन्य जिलों के नागरिकों को यह समझना होगा कि बिना किसी सरकारी या प्रतिष्ठित अस्पताल के परामर्श के किसी भी ‘बिचौलिए’ के चक्कर में पड़कर अपनी या अपनों की जान जोखिम में न डालें।

न्याय की प्रतीक्षा और व्यवस्था को चुनौती

​केशव नगर का आहूजा अस्पताल अब सील होने की कगार पर है और वहां के कर्मचारी भूमिगत हो गए हैं। आयुष आज अस्पताल के बेड पर पड़ा इंसाफ मांग रहा है, जबकि उसकी किडनी लेकर एक दूसरी जिंदगी संवारी जा रही है—लेकिन क्या वह जिंदगी वाकई ‘नैतिक’ है? मुदस्सर अली का फरार होना यह बताता है कि यह सिंडिकेट अभी भी सक्रिय है और इसके संरक्षक काफी शक्तिशाली हो सकते हैं।

द वॉयस ऑफ बिहार की टीम इस पूरे किडनी कांड की हर बारीक अपडेट पर नजर बनाए हुए है। हमारा मानना है कि जब तक मुदस्सर अली जैसे ‘सफेदपोश अपराधी’ सलाखों के पीछे नहीं पहुँचते, तब तक कोई भी आयुष सुरक्षित नहीं है। राजेश और कुलदीप का जेल जाना केवल एक शुरुआत है, इस गिरोह की जड़ें बहुत गहरी हैं जिन्हें उखाड़ना पुलिस प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती है।

  • ये भी पढ़े..

    NIFT प्रवेश परीक्षा में भागलपुर के गौरव कुमार सिंह का शानदार प्रदर्शन, हासिल की ऑल इंडिया 577वीं रैंक

    Share Add as a preferred…

    “राबड़ी आवास पर घमासान: ‘हर हाल में बंगला खाली होगा’, सम्राट के ऐलान के बीच कोर्ट जाने की तैयारी में RJD?”

    Share Add as a preferred…