​बिहार के कबाड़ से विदेश पहुँच रहा आपका ‘डिजिटल राज’: एसटीएफ का बड़ा खुलासा, कटिहार से पकड़ा गया मदर बोर्ड तस्करी का मास्टरमाइंड

कटिहार/पटना। डिजिटल इंडिया के इस दौर में जहाँ डेटा को ‘नया सोना’ और ‘भविष्य का ईंधन’ कहा जा रहा है, वहीं बिहार के कबाड़खानों से एक ऐसी सनसनीखेज सच्चाई सामने आई है जिसने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। आपका वह पुराना मोबाइल फोन, जिसे आपने बेकार समझकर किसी फेरीवाले या कबाड़ी को चंद रुपयों में बेच दिया था, वह अब अंतरराष्ट्रीय जासूसी और डेटा चोरी का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है। बिहार एसटीएफ और उत्तर प्रदेश पुलिस की एक संयुक्त कार्रवाई ने ‘स्क्रैप टू सर्वर’ (Scrap to Server) के एक ऐसे वैश्विक नेटवर्क का भंडाफोड़ किया है, जिसके तार बिहार की तंग गलियों से निकलकर विदेशों में बैठे बड़े डेटा सेंटरों तक जुड़ रहे हैं। इस खुलासे ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भंगार के कारोबार की आड़ में लाखों भारतीयों का निजी डेटा—फोटो, बैंकिंग विवरण और पासवर्ड—विदेशी धरती पर नीलाम हो चुका है।

कटिहार में ‘सर्जिकल स्ट्राइक’: इस्तार आलम की गिरफ्तारी और यूपी कनेक्शन

​पूरे मामले का पटाक्षेप तब हुआ जब बिहार एसटीएफ ने उत्तर प्रदेश पुलिस के साथ मिलकर कटिहार जिले के रौतारा थाना क्षेत्र में एक गुप्त ऑपरेशन चलाया। 1 अप्रैल 2026 को हुई इस संयुक्त कार्रवाई में पुलिस ने हथिया दियरा निवासी इस्तार आलम को उसकी मोबाइल भंगार की दुकान से गिरफ्तार किया। इस्तार आलम कोई मामूली कबाड़ी नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के लालगंज थाना कांड संख्या 95/26 का वांछित अभियुक्त है।

​रायबरेली पुलिस लंबे समय से एक ऐसे गिरोह की तलाश में थी जो पुराने मोबाइल फोन के मदर बोर्ड की थोक में तस्करी कर रहा था। इस्तार आलम की गिरफ्तारी के बाद जब उससे कड़ाई से पूछताछ की गई, तो उसने ‘डिजिटल स्मगलिंग’ के उस काले साम्राज्य का कच्चा चिट्ठा खोल दिया, जो अब तक पुलिस की नज़रों से ओझल था। इस्तार केवल बिहार ही नहीं, बल्कि अंतरराज्यीय स्तर पर पुराने मोबाइल और उनके पार्ट्स की खरीद-बिक्री का एक संगठित रैकेट चला रहा था।

मदर बोर्ड का खेल: क्यों कबाड़ की कीमत है करोड़ों में? (विशेष विश्लेषण)

​एक आम नागरिक के लिए पुराना और टूटा हुआ मोबाइल केवल प्लास्टिक और कांच का टुकड़ा हो सकता है, लेकिन डेटा चोरों के लिए इसका ‘मदर बोर्ड’ किसी खजाने की चाबी से कम नहीं है। इस्तार आलम ने पुलिस को बताया कि वह फेरीवाले सहयोगियों के माध्यम से गाँव-गाँव से पुराने मोबाइल इकट्ठा करता है।

द वॉयस ऑफ बिहार के विशेष विश्लेषण के अनुसार, इस तस्करी के पीछे तीन मुख्य कारण हैं:

  1. डेटा रिटेंशन (Data Retention): मोबाइल का स्क्रीन भले ही टूट जाए या वह ऑन न हो, लेकिन उसके मदर बोर्ड पर लगी ‘फ्लैश मेमोरी’ चिप में डेटा सालों तक सुरक्षित रहता है। विदेशी डेटा सेंटर इन चिप्स से डेटा रिकवर करने के लिए आधुनिक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करते हैं।
  2. कीमती धातुएँ: मदर बोर्ड में सोने, चांदी और तांबे के सूक्ष्म अंश होते हैं, लेकिन डेटा चोरी का मुनाफा इन धातुओं की कीमत से कहीं अधिक है।
  3. पहचान की चोरी: इन मदर बोर्ड्स से प्राप्त डेटा का उपयोग करके विदेशी हैकर्स ‘डिजिटल क्लोनिंग’ करते हैं, जिससे वित्तीय धोखाधड़ी और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा पैदा किया जा सकता है।

हैदराबाद से दिल्ली तक फैला जाल: ‘फेरीवाला’ नेटवर्क की असलियत

​इस्तार आलम की स्वीकारोक्ति ने यह साफ कर दिया है कि यह रैकेट बिहार की सीमाओं तक सीमित नहीं है। उसके सहयोगी हैदराबाद, तमिलनाडु और दिल्ली जैसे बड़े महानगरों में सक्रिय हैं। ये लोग वहां के कबाड़ बाजारों से थोक भाव में पुराने मोबाइल खरीदते हैं। इन मोबाइलों को तोड़ने के बाद उनके डिस्प्ले, बैटरी और प्लास्टिक बॉडी को अलग कर स्थानीय बाजारों में खपा दिया जाता है, जबकि ‘मदर बोर्ड’ को सुरक्षित निकालकर दूसरे स्तर के बिचौलियों या फेरीवालों को बेच दिया जाता है।

​यह मदर बोर्ड अंततः बड़े शहरों के उन एजेंटों तक पहुँचते हैं जिनका सीधा संपर्क विदेशी डेटा सेंटरों से होता है। एसटीएफ को संदेह है कि इन मदर बोर्ड्स की खेप समुद्री रास्तों या कूरियर के जरिए उन देशों में भेजी जा रही है जहाँ डेटा प्रोटेक्शन कानून कमजोर हैं या जो भारत के खिलाफ साइबर युद्ध में सक्रिय हैं। लाखों भारतीयों का डेटा—जिनमें निजी बातचीत और संवेदनशील दस्तावेज शामिल हैं—अब विदेशी सर्वरों की संपत्ति बन चुका है।

राष्ट्रीय सुरक्षा पर संकट: भंगार के हाथों बिक रहा ‘डिजिटल संप्रभुता’

​बिहार एसटीएफ के मुताबिक, इस्तार आलम जैसे लोग इस बात से पूरी तरह अनजान हो सकते हैं कि वे किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन उनके द्वारा किया जा रहा यह ‘छोटा सा धंधा’ देश की डिजिटल संप्रभुता के लिए बड़ा खतरा है। जब किसी व्यक्ति का पुराना फोन किसी विदेशी लैब में पहुँचता है, तो वहां के विशेषज्ञ पुराने डिलीट किए गए डेटा को भी वापस ला सकते हैं।

​सोचिए, अगर किसी सुरक्षाकर्मी या सरकारी अधिकारी का पुराना फोन इसी तरह कबाड़ के रास्ते विदेश पहुँच जाए, तो वहां की खुफिया एजेंसियां उस व्यक्ति के संपर्कों, उसके स्थान (Location history) और महत्वपूर्ण ईमेल तक पहुँच बना सकती हैं। इस्तार आलम ने पूछताछ में बताया कि उसने अब तक लाखों मदर बोर्ड आगे सप्लाई किए हैं, जिसका मतलब है कि लाखों लोगों की गोपनीयता अब खतरे में है।

प्रशासनिक चुनौती और ई-वेस्ट नीति की नाकामी

​इस्तार आलम की गिरफ्तारी ने बिहार के पर्यावरण और सुरक्षा, दोनों विभागों को आइना दिखाया है। भारत में ‘ई-वेस्ट मैनेजमेंट’ (E-Waste Management) के कड़े नियम हैं, जिनके तहत पुराने इलेक्ट्रॉनिक कचरे को केवल प्रमाणित रिसाइकलर्स को ही बेचा जा सकता है। लेकिन धरातल पर इस्तार जैसे कबाड़ी बिना किसी लाइसेंस या निगरानी के यह धंधा कर रहे हैं।

  • निगरानी का अभाव: कबाड़ की दुकानों पर कोई यह नहीं पूछता कि ये पुराने फोन कहाँ से आए और इनका क्या होगा।
  • जनता में जागरूकता की कमी: लोग डेटा सुरक्षा को लेकर इतने बेपरवाह हैं कि वे फोन को फॉर्मेट किए बिना या उसे ‘फैक्ट्री रिसेट’ किए बिना ही कबाड़ी को थमा देते हैं।
  • संगठित सिंडिकेट: एसटीएफ मान रही है कि इस्तार केवल एक कड़ी है। इस चेन में बड़े निर्यातक और लॉजिस्टिक कंपनियां भी शामिल हो सकती हैं जो इन पार्ट्स को कस्टम की नज़रों से बचाकर बाहर भेजते हैं।

कबाड़ या जासूसी का उपकरण?

​एक तटस्थ दृष्टिकोण से देखें तो, कबाड़ का कारोबार हजारों लोगों की रोजी-रोटी का जरिया है। लेकिन जब यह कारोबार देश की सुरक्षा और व्यक्तिगत गोपनीयता में सेंध लगाने लगे, तो इसे केवल ‘भंगार व्यवसाय’ नहीं कहा जा सकता। एसटीएफ और यूपी पुलिस की यह संयुक्त कार्रवाई स्वागत योग्य है, लेकिन यह केवल एक शुरुआत है। इस्तार आलम के पकड़े जाने से एक छोटा रास्ता जरूर बंद हुआ है, लेकिन उन बड़े खिलाड़ियों का पकड़ा जाना अभी बाकी है जो विदेशी डॉलर के बदले भारत का डेटा बेच रहे हैं।

​पुलिस अब इस्तार के बैंक खातों और उसके सहयोगियों के मोबाइल फोन को खंगाल रही है। रायबरेली पुलिस उसे ट्रांजिट रिमांड पर लेने की तैयारी में है ताकि लालगंज थाना क्षेत्र के उस मुख्य मामले की तह तक पहुँचा जा सके जहाँ से इस तस्करी के पहले सुराग मिले थे।

आपके पुराने फोन का भविष्य आपकी जिम्मेदारी

​4 अप्रैल 2026 की यह रिपोर्ट हर उस व्यक्ति के लिए एक चेतावनी है जिसके पास एक पुराना और बेकार पड़ा मोबाइल फोन है। आपका एक छोटा सा लालच—पुराने फोन को कबाड़ी को बेच देना—आपको और आपके देश को बड़े संकट में डाल सकता है। इस्तार आलम की गिरफ्तारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अपराध की जड़ें अब केवल गलियों तक सीमित नहीं हैं, वे अब बादलों (Cloud) और सर्वरों तक फैल चुकी हैं।

द वॉयस ऑफ बिहार की टीम इस पूरी जांच पर अपनी नजर बनाए हुए है। हमारा मानना है कि जब तक ई-वेस्ट के निपटान के लिए मोहल्ला स्तर पर सुरक्षित केंद्र नहीं बनेंगे, तब तक इस्तार जैसे तस्कर फलते-फूलते रहेंगे। फिलहाल, इस्तार आलम पुलिस की गिरफ्त में है और उससे मिली जानकारियां देशव्यापी साइबर सुरक्षा को मजबूत करने में मददगार साबित हो सकती हैं।

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