
वॉशिंगटन/तेहरान। दुनिया के नक्शे पर मध्य पूर्व का इलाका इस समय बारूद के ऐसे ढेर पर बैठा है, जहाँ एक छोटी सी चिंगारी भी वैश्विक प्रलय का कारण बन सकती है। 4 अप्रैल 2026 की सुबह अंतरराष्ट्रीय राजनीति और सैन्य शक्ति के गलियारों में ऐसी हलचल लेकर आई है, जिसने महाशक्तियों के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी कर दी हैं। एक तरफ जहाँ ईरान और इजरायल के बीच सीधी जंग अब नियंत्रण से बाहर होती दिख रही है, वहीं दूसरी तरफ दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताकत कहे जाने वाले अमेरिका के भीतर एक बड़ी प्रशासनिक और रणनीतिक उथल-पुथल मच गई है। जंग के बीच में ही अमेरिकी सेना के सबसे बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों को हटाने की खबर ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन किसी बहुत बड़े सैन्य ऑपरेशन की तैयारी में है या फिर अमेरिकी रक्षा पंक्ति के भीतर कोई गहरी दरार पड़ चुकी है।
पेंटागन में ‘शुद्धिकरण’ या सैन्य तख्तापलट जैसी स्थिति?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने सेना के चीफ ऑफ स्टाफ जनरल रैंडी जॉर्ज को उनके पद से तत्काल प्रभाव से हटा दिया है। जनरल जॉर्ज, जो अगस्त 2023 से बाइडन प्रशासन के दौरान इस पद पर तैनात थे, उन्हें उनके चार साल के कार्यकाल के पूरा होने से पहले ही विदा कर दिया गया। पेंटागन के प्रवक्ता सीन पार्नेल के अनुसार, जनरल रैंडी जॉर्ज को सेवानिवृत्त कर दिया गया है और उनकी जगह जनरल क्रिस्टोफर लानेव को कार्यवाहक चीफ ऑफ स्टाफ नियुक्त किया गया है।
हैरानी की बात यह है कि इस बर्खास्तगी की कड़ी यहीं नहीं रुकी। रक्षा मंत्री हेगसेथ ने आर्मी जनरल डेविड होडने (प्रमुख, ट्रांसफॉर्मेशन एंड ट्रेनिंग कमांड) और मेजर जनरल विलियम ग्रीन (चीफ ऑफ चैपलेंस) को भी पदमुक्त कर दिया है। पिछले साल पद संभालने के बाद से हेगसेथ अब तक एक दर्जन से अधिक शीर्ष जनरलों और एडमिरलों को हटा चुके हैं। युद्ध के बीच में सैन्य नेतृत्व का इस तरह बदला जाना किसी भी देश के लिए जोखिम भरा कदम माना जाता है। विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन सेना के भीतर अपनी विचारधारा के प्रति वफादार लोगों को बैठाना चाहता है, ताकि भविष्य में होने वाले बड़े फैसलों में कोई आंतरिक बाधा न आए।
एफ-35 बनाम एफ-15: आसमान में श्रेष्ठता की जंग और लापता पायलट
रणभूमि की बात करें तो ईरान ने एक बहुत बड़ा दावा कर अमेरिका के सैन्य अभिमान को चुनौती दी है। ईरान का दावा है कि उसने अमेरिकी वायुसेना के सबसे आधुनिक और घातक माने जाने वाले ‘एफ-35’ (F-35) लड़ाकू विमान को मार गिराया है। दूसरी तरफ, अमेरिका ने इस दावे को सिरे से खारिज तो नहीं किया, लेकिन विमान की पहचान को लेकर अलग जानकारी दी है। अमेरिका का कहना है कि गिराया गया विमान एफ-35 नहीं, बल्कि ‘एफ-15’ (F-15) था।
इस विमान में दो पायलट सवार थे। पेंटागन ने पुष्टि की है कि एक पायलट को सुरक्षित बचा लिया गया है, लेकिन दूसरा पायलट अभी भी लापता है। ईरान ने इस मामले में मनोवैज्ञानिक युद्ध (Psychological Warfare) का सहारा लेते हुए दूसरे पायलट की सूचना देने वाले पर बड़े इनाम की घोषणा की है। यह घटना इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यदि ईरान वाकई एफ-35 जैसे ‘स्टील्थ’ विमान को गिराने में कामयाब रहा है, तो यह अमेरिकी तकनीक की दुनिया भर में साख गिराने जैसा होगा।
ईरान का पलटवार: कुवैत की रिफाइनरी पर हमला और आठ पुलों को उड़ाने की धमकी
ईरान की आक्रामकता अब केवल इजरायल तक सीमित नहीं रही है। शुक्रवार को ईरान ने कुवैत की ‘मीना अल अहमद’ रिफाइनरी पर बड़ा हमला बोलकर यह संकेत दे दिया है कि वह पूरे अरब क्षेत्र की ऊर्जा आपूर्ति को ठप कर सकता है। इतना ही नहीं, ईरान ने मध्य पूर्व के सबसे ऊँचे और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ‘बी-1’ पुल समेत कुल आठ पुलों को उड़ाने की खुली धमकी दी है। ईरान का कहना है कि यह धमकी उन देशों के लिए है जो इजरायल और अमेरिका को अपने हवाई क्षेत्र या जमीन का उपयोग करने दे रहे हैं।
इधर इजरायल भी चुप नहीं बैठा है। इजरायली वायुसेना ने ईरान के भीतर घुसकर राजधानी तेहरान और इस्फहान जैसे महत्वपूर्ण शहरों में हवाई हमले किए हैं। इस्फहान में ईरान के परमाणु केंद्र और मिसाइल डिपो होने के कारण इन हमलों को बहुत संवेदनशील माना जा रहा है। रमतगन के इलाकों में ईरान द्वारा किए गए मिसाइल और ड्रोन हमलों के बाद मलबे में तब्दील हुए फ्लैटों की तस्वीरें यह गवाही दे रही हैं कि आम नागरिक अब इस सत्ता के संघर्ष में सीधे तौर पर पिस रहे हैं।
1.5 ट्रिलियन डॉलर का रक्षा बजट: अमेरिका की युद्धक तैयारी
इन तमाम उथल-पुथल के बीच, अमेरिका ने वर्ष 2027 के लिए अब तक के सबसे बड़े रक्षा बजट का प्रस्ताव भेजा है। रिकॉर्ड 1.5 ट्रिलियन डॉलर का यह बजट प्रस्ताव यदि पास होता है, तो यह अमेरिकी इतिहास में रक्षा पर किया जाने वाला सबसे बड़ा खर्च होगा। इस बजट का एक बड़ा हिस्सा आधुनिक हथियारों, मिसाइल डिफेंस सिस्टम और एआई (AI) आधारित युद्धक तकनीक पर खर्च किया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इतना भारी-भरकम बजट इस बात का संकेत है कि अमेरिका अब केवल छोटे संघर्षों के लिए नहीं, बल्कि रूस, चीन और ईरान जैसे गठजोड़ के खिलाफ एक ‘पूर्ण युद्ध’ (Full Scale War) की तैयारी कर रहा है।
अमेरिकी आंतरिक राजनीति: बॉन्डी, पटेल और गबार्ड पर गिर सकती है गाज
अमेरिका के भीतर केवल सैन्य ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक सफाई भी जारी है। अटॉर्नी जनरल पाम बॉन्डी को पद से हटा दिया गया है। वहीं, वॉशिंगटन के गलियारों में चर्चा तेज है कि एफबीआई (FBI) चीफ काश पटेल और नेशनल इंटेलिजेंस चीफ तुलसी गबार्ड का नंबर भी अगला हो सकता है। काश पटेल पर सरकारी जेट का उपयोग अपने निजी कामों के लिए करने के आरोप लग रहे हैं। ‘द अटलांटिक’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन अपने करीबियों पर लग रहे इन आरोपों और उनकी कार्यशैली से नाराज है और जल्द ही बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
शांति की तलाश या विनाश की ओर बढ़ते कदम?
यदि हम पूरी स्थिति को संतुलित नजरिये से देखें, तो यह साफ है कि संवाद की जगह अब हथियारों ने ले ली है। ईरान का यह मानना कि वह इजरायल को नक्शे से मिटा देगा और अमेरिका का यह सोचना कि वह केवल सैन्य नेतृत्व बदलकर या बजट बढ़ाकर दुनिया को नियंत्रित कर लेगा, दोनों ही स्थितियां खतरनाक हैं।
जहाँ एक ओर इजरायल के रमतगन में आम लोग अपने तबाह हुए घरों का मुआयना कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पेंटागन के बंद कमरों में जनरलों की बर्खास्तगी का खेल चल रहा है। इस खींचतान में जीत किसी की भी हो, हार मानवता की ही हो रही है। भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति और भी चिंताजनक है क्योंकि खाड़ी क्षेत्र में होने वाली कोई भी हलचल सीधे तौर पर तेल की कीमतों और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है।
द वॉयस ऑफ बिहार का विश्लेषण
3 अप्रैल और 4 अप्रैल 2026 की ये घटनाएं यह स्पष्ट कर रही हैं कि आने वाले दिन दुनिया के लिए बेहद कठिन होने वाले हैं। अमेरिका के भीतर की राजनीतिक अस्थिरता और मध्य पूर्व का युद्ध एक-दूसरे को और अधिक जटिल बना रहे हैं। लापता पायलट की खोज और ईरान की पुलों को उड़ाने की धमकी यह दिखाती है कि अब युद्ध केवल मोर्चों पर नहीं, बल्कि बुनियादी ढांचे पर भी लड़ा जाएगा। 1.5 ट्रिलियन डॉलर का बजट हथियारों की नई दौड़ शुरू करेगा, जिसका अंत शायद किसी परमाणु त्रासदी पर ही हो।


