जमीन की जंग: सोनाली बेंद्रे और गोल्डी बहल पर किसान ने लगाया कब्जा करने का आरोप, कोर्ट पहुंची 80 साल पुरानी हक की लड़ाई

पुणे/मुंबई। महाराष्ट्र के पुणे जिले से एक ऐसा कानूनी विवाद सामने आया है जिसने बॉलीवुड के गलियारों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक में चर्चा छेड़ दी है। मशहूर अभिनेत्री सोनाली बेंद्रे और उनके पति, फिल्म निर्माता गोल्डी बहल पर पुणे के एक किसान परिवार ने अपनी पैतृक जमीन को गैर-कानूनी तरीके से हड़पने और डराने-धमकाने का गंभीर आरोप लगाया है। यह मामला पुणे की मावल तहसील के उकसन गांव की करीब 30 गुंठा (32,000 वर्ग फुट से अधिक) जमीन से जुड़ा है। 3 अप्रैल 2026 की यह खबर न केवल सेलिब्रिटी संस्कृति के प्रभाव पर सवाल उठाती है, बल्कि भारत के जटिल राजस्व रिकॉर्ड और भूमि कानूनों की पेचीदगियों को भी उजागर करती है।

क्या है पूरा विवाद? किसान परिवार का 1940 से जुड़ा दावा

​इस कानूनी लड़ाई की जड़ें आज से आठ दशक पहले 1940 के दशक में छिपी हैं। शिकायतकर्ता चंद्रकांत बालू शिंदे (50) और उनकी 75 वर्षीय मां कमलबाई शिंदे का दावा है कि उनका परिवार उकसन गांव की इस जमीन पर 1940 के दशक से ‘संरक्षित किराएदार’ (Protected Tenants) के रूप में खेती करता आ रहा है। महाराष्ट्र के भूमि कानून के तहत, संरक्षित किराएदारों के पास जमीन पर स्थायी अधिकार होते हैं जिन्हें बिना कानूनी प्रक्रिया के खत्म नहीं किया जा सकता।

​शिंदे परिवार का आरोप है कि 1980 के दशक में स्थानीय राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत से उनका नाम राजस्व रिकॉर्ड (7/12 उतारा) से चुपचाप हटा दिया गया था। किसान के अनुसार, इस बदलाव के बारे में उन्हें कोई नोटिस नहीं दिया गया और न ही कोई सुनवाई हुई। परिवार का कहना है कि वे इस जमीन पर पीढ़ी दर पीढ़ी खेती कर रहे हैं और उनका कब्जा आज भी बरकरार है। विवाद तब शुरू हुआ जब जमीन के मूल मालिकों ने कथित तौर पर इस दावे को नजरअंदाज करते हुए 2012 में एक स्थानीय व्यक्ति को जमीन बेच दी, जिसने बाद में मार्च 2021 में इस जमीन का एक हिस्सा गोल्डी बहल को बेच दिया।

‘माफिया स्टाइल’ डराने का आरोप: दिसंबर 2025 की वो घटना

​वडगांव मावल की दीवानी अदालत में दायर मुकदमे में शिंदे परिवार ने केवल जमीन के कागजों की बात नहीं की है, बल्कि सेलिब्रिटी दंपत्ति पर ‘माफिया शैली’ में धमकाने का भी आरोप लगाया है। शिकायत के अनुसार, 14 दिसंबर 2025 को सोनाली बेंद्रे और गोल्डी बहल अपने साथ भारी संख्या में मजदूर और बुलडोजर जैसी भारी मशीनें लेकर उकसन गांव पहुंचे थे। आरोप है कि वे वहां अवैध निर्माण शुरू करने की कोशिश कर रहे थे।

​कमलबाई शिंदे ने दावा किया कि जब उन्होंने निर्माण कार्य रोकने की कोशिश की, तो उन्हें और उनके बेटे को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी गई। किसान परिवार का यह भी आरोप है कि स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने भी सेलिब्रिटी दंपत्ति का पक्ष लिया और उन्हें डराया कि अगर उन्होंने काम में बाधा डाली, तो उन्हें चोरी के फर्जी मामलों में फंसा दिया जाएगा। अदालत में दायर मुकदमे में इन पुलिस अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की मांग की गई है।

सोनाली बेंद्रे का पलटवार: ‘यह केवल पैसा ऐंठने की कोशिश है’

​इन गंभीर आरोपों पर अभिनेत्री सोनाली बेंद्रे और उनके पति गोल्डी बहल ने अपना कड़ा रुख स्पष्ट किया है। सोनाली बेंद्रे ने इन तमाम आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे एक सोची-समझी साजिश बताया है। अभिनेत्री का तर्क है कि इस पूरे विवाद में उनका नाम केवल इसलिए घसीटा जा रहा है क्योंकि वे एक सार्वजनिक चेहरा हैं। उनके वकील राजू शिंदे ने अदालत में स्पष्ट किया कि जिस जमीन की खरीद-बिक्री की बात हो रही है, उसके किसी भी सरकारी दस्तावेज या राजस्व रिकॉर्ड में सोनाली बेंद्रे का नाम तक नहीं है।

​वकील के अनुसार, गोल्डी बहल ने यह जमीन सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए खरीदी थी। अभिनेत्री का कहना है कि यह मामला केवल उनकी छवि खराब करने और उनसे मोटी रकम ऐंठने (Extortion) के इरादे से दायर किया गया है। उनके पक्ष का यह भी कहना है कि किसान परिवार ने इससे पहले तहसीलदार और उप-मंडलीय अधिकारी (SDO) के पास भी इसी तरह की शिकायतें की थीं, जिन्हें प्रशासन ने साक्ष्यों के अभाव में खारिज कर दिया था।

कानूनी पेचीदगियां: राजस्व रिकॉर्ड बनाम कब्जा (विशेष विश्लेषण)

​महाराष्ट्र में जमीन के मामलों में अक्सर ‘कुल’ (Tenancy) के अधिकार सबसे विवादित होते हैं। अगर कोई परिवार दशकों से जमीन पर काबिज है, तो भले ही राजस्व रिकॉर्ड में नाम बदल जाए, लेकिन उनका भौतिक कब्जा (Physical Possession) एक मजबूत कानूनी आधार बनाता है।

  1. राजस्व रिकॉर्ड की विश्वसनीयता: 1980 के दशक में नाम हटाया जाना इस केस का सबसे कमजोर या मजबूत कड़ी हो सकता है। अगर किसान यह साबित कर देता है कि नाम हटाने की प्रक्रिया अवैध थी, तो बाद की सभी सेल डीड (2012 और 2021) कानूनी रूप से शून्य घोषित की जा सकती हैं।
  2. सेलिब्रिटी और पुलिस का प्रभाव: सेलिब्रिटी मामलों में अक्सर पुलिस पर पक्षपात के आरोप लगते हैं। इस मामले में भी पुलिस की मौजूदगी और किसान को धमकाने के आरोपों ने इसे एक सामाजिक मुद्दा बना दिया है।
  3. अगली सुनवाई: वडगांव मावल कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 24 अप्रैल 2026 की तारीख तय की है। अदालत अब इस बात की जांच करेगी कि क्या 2021 की खरीद के समय गोल्डी बहल को पुराने किराएदारी अधिकारों की जानकारी थी या नहीं।

उकसन गांव में तनाव का माहौल

​मावल तहसील का उकसन गांव अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है, जिसके कारण कई सेलिब्रिटीज ने वहां फार्महाउस के लिए जमीनें खरीदी हैं। लेकिन सोनाली बेंद्रे से जुड़े इस विवाद ने स्थानीय किसानों और बाहरी निवेशकों के बीच एक अविश्वास की खाई पैदा कर दी है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि कई बार बिल्डर और रसूखदार लोग पुराने अनपढ़ किसानों की जमीनों के कागजों में हेरफेर कर देते हैं, जिसका पता उन्हें सालों बाद चलता है।

​शिंदे परिवार के वकील वनराज शिंदे ने कहा कि वे केवल न्याय चाहते हैं और उनका मकसद किसी को बदनाम करना नहीं, बल्कि अपनी मां के हक की जमीन को बचाना है। दूसरी ओर, गोल्डी बहल के करीबियों का कहना है कि वे एक पारदर्शी सौदे के शिकार हुए हैं और उन्होंने पूरी कीमत चुकाकर जमीन ली है।

संतुलित नजरिया: किसकी है चूक?

​इस मामले को संतुलित नजरिए से देखें तो यह स्पष्ट है कि कहीं न कहीं सरकारी तंत्र और जमीन के हस्तांतरण की प्रक्रिया में चूक हुई है। अगर 1940 से एक परिवार वहां खेती कर रहा था, तो 2021 में रजिस्ट्री के समय ‘टाइटस सर्च रिपोर्ट’ में इस बात का जिक्र क्यों नहीं आया?

  • किसानों का पक्ष: वे अपनी जमीन बचाने के लिए कोर्ट पहुंचे हैं, जो उनका संवैधानिक अधिकार है।
  • बॉलीवुड दंपत्ति का पक्ष: उन्होंने बाजार भाव पर जमीन खरीदी है और उनका कहना है कि वे किसी पुराने विवाद का हिस्सा नहीं बनना चाहते।

​न्यायालय को अब यह तय करना है कि क्या यह ‘संरक्षित किराएदार’ बनाम ‘नया मालिक’ का कानूनी विवाद है या फिर वाकई यह सेलिब्रिटी प्रभाव का दुरुपयोग है।

न्याय की तराजू पर भविष्य

​सोनाली बेंद्रे और गोल्डी बहल के खिलाफ पुणे की अदालत में चल रहा यह मुकदमा अब एक मिसाल बनेगा। 24 अप्रैल को होने वाली सुनवाई में कई अहम दस्तावेज पेश किए जाएंगे। तब तक यह मामला ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ के पाठकों के लिए एक सबक है कि जमीन की रजिस्ट्री से पहले उसके 80 साल पुराने इतिहास की जांच करना कितना आवश्यक है।

​अदालत का फैसला चाहे जो भी हो, लेकिन इस विवाद ने यह साफ कर दिया है कि रसूख और शोहरत के बीच भी एक छोटे किसान की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। न्याय की इस प्रक्रिया पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं, क्योंकि यह सीधे तौर पर किसानों के अधिकारों और सेलिब्रिटीज की सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा है।

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