खाकी के पीछे छिपा ‘जमीन माफिया’: किशनगंज एसडीपीओ गौतम कुमार की काली कमाई का ‘राष्ट्रीय’ साम्राज्य उजागर; पूर्णिया से पुणे और गुरुग्राम तक फैला भ्रष्टाचार का जाल, पुलिस मुख्यालय ने किया पदमुक्त

  • ​किशनगंज के अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी (SDPO) गौतम कुमार के विरुद्ध आर्थिक अपराध इकाई (EOU) की जांच ने पुलिस महकमे के भीतर भ्रष्टाचार की एक ऐसी गहरी सुरंग उजागर की है, जिसके सिरे कई राज्यों तक फैले हुए हैं।
  • ​आय से अधिक संपत्ति मामले में घिरे इस पुलिस अधिकारी ने अपने पद और रसूख का इस्तेमाल कर न केवल बिहार के पूर्णिया जिले में अकूत संपत्तियां बनाईं, बल्कि हरियाणा, महाराष्ट्र, सिक्किम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी भारी निवेश किया।
  • ​जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि गौतम कुमार ने अपनी ‘महिला मित्र’ शगुफ्ता शमीम के नाम पर राष्ट्रीय राजमार्ग (NH) के किनारे करोड़ों की जमीन खरीदी और सरकारी सेवा के दौरान अपने परिजनों के नाम पर भी संपत्तियों का अंबार लगा दिया।
  • ​भ्रष्टाचार की इस काली कमाई का आलम यह है कि महज दो वर्षों के भीतर 50 लाख रुपये से अधिक की लग्जरी गाड़ियां खरीदी गईं, जिनमें दो महिंद्रा थार और एक हुंडई क्रेटा शामिल है।
  • ​ईओयू की छापेमारी और शुरुआती साक्ष्यों के आधार पर पुलिस मुख्यालय ने कड़ा रुख अपनाते हुए गौतम कुमार को तत्काल प्रभाव से पद से हटा दिया है और उन्हें मुख्यालय में रिपोर्ट करने का निर्देश दिया है।

पटना/किशनगंज (द वॉयस ऑफ बिहार)।

भ्रष्टाचार की अंतहीन पटकथा: दारोगा से डीएसपी तक का सफर और काली कमाई का ग्राफ

बिहार पुलिस के इतिहास में ऐसे कई अध्याय रहे हैं जहाँ वर्दी की आड़ में निजी स्वार्थ सिद्ध किए गए, लेकिन किशनगंज के एसडीपीओ गौतम कुमार का मामला इन सबसे कहीं अधिक सुनियोजित और विस्तृत नजर आता है। साल 1994 में दारोगा के पद पर बहाल हुए गौतम कुमार ने शायद उसी समय से सत्ता और प्रभाव के समीकरणों को समझना शुरू कर दिया था। 2013 में इंस्पेक्टर और 2019 में डीएसपी के पद पर प्रोन्नति पाने के बाद उनकी ‘संपत्ति की भूख’ ने सीमाएं लांघ दीं। आर्थिक अपराध इकाई (ईओयू) की हालिया छापेमारी और दस्तावेजों की सघन जांच ने यह साफ कर दिया है कि गौतम कुमार ने कानून की रक्षा के बजाय अपनी निजी तिजोरी भरने को प्राथमिकता दी। उनकी काली कमाई का यह साम्राज्य केवल बिहार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके साक्ष्य देश के चार अलग-अलग कोनों में पाए गए हैं।

पूर्णिया का ‘डगरुआ’ कनेक्शन: थानाध्यक्ष रहते ही बिछाया था जमीन का जाल

गौतम कुमार की संपत्तियों की जांच जब शुरू हुई, तो सबसे पहले पूर्णिया जिले के डगरुआ इलाके का नाम उभरा। यहाँ वे कभी थानाध्यक्ष के पद पर तैनात थे। आरोप है कि अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने डगरुआ में एनएच के किनारे तीन बीघा कीमती जमीन खरीदी। यह जमीन सीधे अपने नाम पर न लेकर उन्होंने अपनी पत्नी, सास और अपनी एक महिला मित्र के नाम पर रजिस्टर्ड कराई। यह जमीन माफिया जैसी कार्यशैली का परिचायक है, जहाँ एक लोक सेवक अपने प्रभाव वाले क्षेत्र में ही अवैध संपत्तियों का अधिग्रहण करता है। ईओयू ने पाया कि इन भूखंडों की खरीद में निवेश की गई राशि उनके वैध आय स्रोतों से कहीं अधिक है। यह उस समय की गई ‘वसूली’ का परिणाम है जब वे क्षेत्र में कानून लागू करने के जिम्मेदार थे।

महिला मित्र ‘शगुफ्ता शमीम’ और करोड़ों का रियल एस्टेट निवेश

ईओयू की जांच में सबसे रहस्यमयी और अहम किरदार शगुफ्ता शमीम नामक महिला मित्र के रूप में सामने आया है। दस्तावेजों के अनुसार, 2019 से लेकर अब तक गौतम कुमार ने शगुफ्ता शमीम के नाम पर एनएच से सटे कुल सात आवासीय और कृषि भूखंडों की खरीद की है। इन संपत्तियों का बाजार मूल्य वर्तमान में कई करोड़ों में बताया जा रहा है। जांच एजेंसी का मानना है कि शगुफ्ता शमीम का इस्तेमाल गौतम कुमार ने अपनी अवैध कमाई को सुरक्षित करने के लिए एक ‘बेनामी’ फ्रंट के रूप में किया। यह केवल जमीन की खरीद तक सीमित नहीं था; संपत्तियों को घुमाने के लिए उन्होंने एक और शातिर तरीका अपनाया। दूसरों के नाम पर खरीदी गई कुछ संपत्तियों को बाद में उन्होंने अपने पुत्र को ‘उपहार’ (Gift) के रूप में प्राप्त करवा दिया, ताकि कागजी तौर पर उसे वैध दिखाया जा सके।

गुरुग्राम से पुणे तक: काली कमाई का ‘पैन इंडिया’ फुटप्रिंट

भ्रष्टाचार की यह दास्तान केवल बिहार की सीमाओं के भीतर नहीं सिमटी है। ईओयू की छापेमारी के दौरान जो साक्ष्य मिले हैं, वे बताते हैं कि गौतम कुमार ने भविष्य की सुरक्षा के लिए देश के कई विकसित और महंगे शहरों में निवेश किया था। हरियाणा के गुरुग्राम, महाराष्ट्र के पुणे, सिक्किम के गंगटोक और पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में भी उनकी संपत्तियों और निवेश के पुख्ता प्रमाण मिले हैं। गुरुग्राम और पुणे जैसे रियल एस्टेट हब में निवेश करना यह दर्शाता है कि यह महज कुछ लाख रुपयों का हेरफेर नहीं, बल्कि करोड़ों का संगठित भ्रष्टाचार है। एक राज्य के अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी के पास इतनी बड़ी पूंजी का होना, जिसका निवेश चार अलग-अलग राज्यों के मेट्रो शहरों और पर्यटन केंद्रों में हो, पुलिस महकमे के भीतर ‘चेक एंड बैलेंस’ की व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

लग्जरी का शौक: दो वर्षों में 50 लाख की गाड़ियां और शाही जीवन

गौतम कुमार के आय के स्रोतों और उनके खर्चों के बीच का अंतर उनके द्वारा खरीदी गई गाड़ियों से भी स्पष्ट होता है। ईओयू के अनुसार, 2022 से अब तक महज दो साल की अवधि में उन्होंने लगभग 50 लाख रुपये खर्च कर तीन नई लग्जरी गाड़ियां खरीदीं। इनमें दो ‘महिंद्रा थार’ और एक ‘हुंडई क्रेटा’ शामिल है। एक सरकारी अधिकारी, जिसके ऊपर तीन पुत्रों की जिम्मेदारी हो और जिसकी पत्नी स्वयं एक साधारण शिक्षिका हो, उसके द्वारा इतने कम समय में इतनी महंगी गाड़ियों का बेड़ा खड़ा करना भ्रष्टाचार की ओर सीधा इशारा करता है। थार और क्रेटा जैसी गाड़ियां न केवल उनकी विलासिता को दर्शाती हैं, बल्कि यह भी बताती हैं कि उन्हें अपनी अवैध कमाई को प्रदर्शित करने में कानून का कोई डर नहीं था।

पारिवारिक पृष्ठभूमि और घोषित आय का विरोधाभास

गौतम कुमार की पत्नी रूबी कश्यप 1999 से शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं और वर्तमान में पूर्णिया के मधुबनी कॉलोनी स्थित मध्य विद्यालय में पदस्थापित हैं। उनके तीन पुत्र हैं जो पूरी तरह से माता-पिता पर आश्रित हैं। एक मध्यमवर्गीय कामकाजी परिवार, जहाँ दोनों पति-पत्नी सरकारी सेवा में हों, उनकी कुल वैध आय और उनके द्वारा अर्जित की गई करोड़ों की संपत्ति के बीच का फासला इतना बड़ा है कि इसे किसी भी तर्क से न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। ईओयू ने उनके बैंक खातों, बीमा पॉलिसियों और अन्य वित्तीय निवेशों की भी सूची तैयार की है, जो जल्द ही कोर्ट के सामने पेश की जाएगी। यह स्पष्ट है कि शिक्षक और पुलिस अधिकारी के वेतन से सिलीगुड़ी से पुणे तक जमीन खरीदना असंभव है।

पुलिस मुख्यालय का कड़ा एक्शन: पद से हटाए गए गौतम कुमार

आय से अधिक संपत्ति मामले में ईओयू की कार्रवाई और भ्रष्टाचार के पुख्ता सबूतों के बाद बिहार पुलिस मुख्यालय ने मंगलवार को बड़ी प्रशासनिक सर्जरी की। किशनगंज एसडीपीओ के पद से गौतम कुमार को तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया है। उन्हें प्रशासनिक दृष्टिकोण से पुलिस मुख्यालय में योगदान देने का आदेश दिया गया है, जिसका सीधा अर्थ है कि अब वे किसी भी सक्रिय फील्ड पोस्टिंग में नहीं रहेंगे और जांच का सामना करेंगे। उनकी अनुपस्थिति में किशनगंज के एसडीपीओ-2 मंगलेश कुमार सिंह को एसडीपीओ-1 का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। मुख्यालय के इस फैसले ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि खाकी की आड़ में काला धंधा करने वालों के लिए महकमे में कोई जगह नहीं है।

निष्कर्ष: व्यवस्था की सफाई की जरूरत

गौतम कुमार का मामला बिहार पुलिस के लिए एक आईना है। एक दारोगा जो डीएसपी के पद तक पहुँचते-पहुँचते चार राज्यों का ‘जमीन मालिक’ बन जाता है, वह व्यवस्था की खामियों का लाभ उठाकर ही ऐसा कर पाता है। ईओयू की यह छापेमारी सराहनीय है, लेकिन सवाल यह भी है कि इतने वर्षों तक उनका यह काला साम्राज्य प्रशासन की नजरों से ओझल कैसे रहा? क्या प्रोन्नति और पोस्टिंग के समय अधिकारियों की संपत्ति का नियमित ऑडिट नहीं होना चाहिए? फिलहाल, गौतम कुमार मुख्यालय बुलाए गए हैं और उनके खिलाफ कानूनी शिकंजा कसता जा रहा है। उम्मीद है कि यह मामला एक मिसाल बनेगा ताकि कोई अन्य लोक सेवक जनता की सेवा के लिए मिली वर्दी का उपयोग बेनामी संपत्तियों की रजिस्ट्री कराने के लिए न करे।

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