20 दिनों के संघर्ष के बाद मशाकचक पहुँचा देवनंदन सिंह का पार्थिव शरीर, आंसुओं के बीच बरारी तट पर पंचतत्व में विलीन हुए ‘चीफ इंजीनियर’

  • ​मिडिल ईस्ट में जारी खूनी संघर्ष के बीच इराक के बुसरा बंदरगाह पर हुए आत्मघाती हमले में जान गंवाने वाले भागलपुर के एडिशनल चीफ इंजीनियर देवनंदन प्रसाद सिंह का पार्थिव शरीर बुधवार की रात 8:30 बजे उनके आवास पहुँचा।
  • ​विगत 12 मार्च को एक ‘सुसाइडल बोट’ (आत्मघाती नाव) हमले ने बीआईटी मेसरा के इस मेधावी छात्र और कुशल इंजीनियर की जिंदगी छीन ली थी, जिसके बाद 20 दिनों तक शव को वतन लाने के लिए कूटनीतिक जद्दोजहद जारी रही।
  • ​इराक से तुर्की और फिर दिल्ली-पटना होते हुए जब देवनंदन का पार्थिव शरीर भागलपुर के पटल बाबू रोड स्थित उनके ससुराल पहुँचा, तो समूचा इलाका चीत्कारों और मातम से दहल उठा।
  • ​बरारी श्मशान घाट पर देर रात देवनंदन का अंतिम संस्कार किया गया, जहाँ उनके पुत्र डॉ. सीतिज ने मुखाग्नि देकर पिता को अंतिम विदाई दी, इस दौरान हजारों की संख्या में लोग नम आँखों से साक्षी बने।
  • ​परिवार ने आरोप लगाया है कि हमले के बाद देवनंदन ने बचने का भरपूर प्रयास किया था, लेकिन वैश्विक संघर्ष की भयावहता और रेस्क्यू में हुई देरी ने एक हंसते-खेलते परिवार का चिराग बुझा दिया।

भागलपुर (द वॉयस ऑफ बिहार)।

युद्ध की विभीषिका और एक बिहारी इंजीनियर का अंत

दुनिया के किसी एक कोने में जब मिसाइलें चलती हैं या आत्मघाती हमले होते हैं, तो उसका दर्द केवल सरहदों तक सीमित नहीं रहता। भागलपुर के मशाकचक और पटल बाबू रोड की गलियों में पसरा सन्नाटा आज इसी वैश्विक क्रूरता की गवाही दे रहा है। 12 मार्च की वह तारीख देवनंदन प्रसाद सिंह के परिवार के लिए काल बनकर आई, जब इराक के बुसरा बंदरगाह पर खड़े उनके जहाज को एक आत्मघाती नाव ने निशाना बनाया। देवनंदन वहां एक प्रतिष्ठित शिपिंग कंपनी में एडिशनल चीफ इंजीनियर के तौर पर तैनात थे। वे जहाज के उस तकनीकी हिस्से को संभाल रहे थे जिसे जहाज का ‘दिल’ कहा जाता है, लेकिन युद्ध की नफरत ने उसी दिल की धड़कनें हमेशा के लिए रोक दीं। यह खबर जब पहली बार भागलपुर पहुँची थी, तो किसी को यकीन नहीं हुआ कि समुद्र की लहरों पर राज करने वाला उनका अपना लाल अब कभी लौटकर नहीं आएगा।

बीस दिनों का ‘प्रशासनिक नर्क’ और कफन में लिपटा सफर

देवनंदन की मौत जितनी दर्दनाक थी, उनके पार्थिव शरीर को वतन वापस लाने की प्रक्रिया उतनी ही जटिल और थका देने वाली रही। 12 मार्च से लेकर 1 अप्रैल तक, यानी पूरे 20 दिन, देवनंदन का शरीर विभिन्न देशों के हवाई अड्डों और कानूनी कागजों के बीच भटकता रहा। उनके मामा ससुर और कांग्रेस के जिलाध्यक्ष प्रवीण सिंह कुशवाहा ने बताया कि इराक जैसे युद्धग्रस्त देश से ‘डेथ सर्टिफिकेट’ (मृत्यु प्रमाणपत्र) हासिल करने में ही दो सप्ताह का समय लग गया। इसके बाद तुर्की की राजधानी इस्तांबुल में कूटनीतिक क्लीयरेंस को लेकर लंबी बाधाएं आईं। अंततः, भारत सरकार और विदेश मंत्रालय के हस्तक्षेप के बाद बुधवार की सुबह 5 बजे उनका पार्थिव शरीर दिल्ली पहुँचा। वहां से विशेष विमान द्वारा पटना और फिर एम्बुलेंस के जरिए भागलपुर लाया गया। यह 20 दिन परिवार के लिए किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं थे, जहाँ हर पल वे अपने प्रियजन के अवशेषों का इंतजार कर रहे थे।

मशाकचक से बरारी तक: आंसुओं का सैलाब और टूटते सब्र का बांध

बुधवार की रात जब एम्बुलेंस पटल बाबू रोड स्थित देवनंदन के ससुराल पहुँची, तो वहां खामोशी अचानक चीखों में तब्दील हो गई। देवनंदन की पत्नी कुमकुम सिन्हा और उनकी बेटी कोमल अपने सुध-बुध खो चुकी थीं। जैसे ही ताबूत खुला, माँ गायत्री देवी और सास नंदा सिंह की करुण पुकार ने वहां मौजूद हर शख्स का कलेजा चीर दिया। देवनंदन के साले डॉ. चंदन और भाई कृष्णनंदन सिंह खुद को संभालने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन नियति के इस क्रूर प्रहार के सामने सब बेबस थे। प्रवीण सिंह कुशवाहा और दीपक सिंह पूरे परिवार को ढांढस बंधा रहे थे, लेकिन आँखों से बहते आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। रात के अंधेरे में ही देवनंदन की अंतिम यात्रा निकाली गई, जो सीधे बरारी श्मशान घाट पहुँची। गंगा की लहरों के किनारे, जहाँ कभी देवनंदन सुकून की तलाश करते थे, वहीं उनकी चिता सजी और उनके पुत्र डॉ. सीतिज ने कांपते हाथों से उन्हें मुखाग्नि दी।

BIT मेसरा का वह होनहार छात्र, जो समंदर का सितारा बना

देवनंदन प्रसाद सिंह केवल एक इंजीनियर नहीं थे, बल्कि वे भागलपुर की उस मेधा का प्रतीक थे जो अपनी मेहनत के बल पर वैश्विक मंच पर जगह बनाती है। उन्होंने 1990-94 के सत्र में देश के प्रतिष्ठित संस्थान बीआईटी मेसरा से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की थी। उनके सहपाठियों और शिक्षकों के बीच वे एक गंभीर और मेधावी छात्र के रूप में जाने जाते थे। इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद उन्होंने मरीन इंजीनियरिंग के क्षेत्र को चुना और कड़ी मेहनत के बाद एडिशनल चीफ इंजीनियर के पद तक पहुँचे। उनकी सफलता की कहानियाँ सन्हौला प्रखंड के उनके पैतृक गाँव रानी बमिया में युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत थीं। वे अक्सर गाँव के युवाओं को तकनीकी शिक्षा की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करते थे। आज रानी बमिया गाँव का हर घर शोक में है, क्योंकि उन्होंने अपना सबसे काबिल बेटा खो दिया है।

रेस्क्यू में देरी या मौत का बिछाया गया जाल?

प्रवीण सिंह कुशवाहा ने एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि जिस समय आत्मघाती हमला हुआ, देवनंदन ने अपनी जान बचाने की पूरी कोशिश की थी। उन्होंने सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन करते हुए खुद को सुरक्षित स्थान पर ले जाने का प्रयास किया, लेकिन हमले की तीव्रता और उसके बाद पैदा हुई अफरा-तफरी में उन्हें समय पर रेस्क्यू नहीं किया जा सका। जब तक बचाव दल उन तक पहुँचा, तब तक उनकी सांसें टूट चुकी थीं। यह सवाल अब भी हवा में तैर रहा है कि क्या उस शिपिंग कंपनी ने युद्धग्रस्त क्षेत्र में अपने कर्मियों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए थे? क्या इराक के बुसरा बंदरगाह जैसे संवेदनशील इलाके में जहाज को ले जाना एक जोखिम भरा फैसला नहीं था?

एक परिवार का उजड़ता संसार और पीछे छूटे सवाल

देवनंदन के चले जाने से केवल एक इंजीनियर का अंत नहीं हुआ है, बल्कि एक पूरे आर्थिक और भावनात्मक ढांचे का पतन हो गया है। वे अपने परिवार के मुख्य स्तंभ थे। बेटी कोमल और बेटे डॉ. सीतिज के भविष्य के लिए उन्होंने जो सपने बुने थे, वे अब अधूरे रह गए हैं। सन्हौला से लेकर भागलपुर तक के उनके तमाम रिश्तेदार आज इस गम में डूबे हैं कि एक साधारण बिहारी परिवार का बेटा वैश्विक सत्ता संघर्ष की भेंट चढ़ गया। भागलपुर की मिट्टी ने आज अपने एक और लाल को गंगा की गोद में सौंप दिया, लेकिन यह शहादत (एक श्रमिक योद्धा के रूप में) हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि मिडिल ईस्ट में चल रही जंग की कीमत भारत के सुदूर जिलों में बैठे परिवारों को क्यों चुकानी पड़ रही है?

सुरक्षित भविष्य की तलाश और असुरक्षित रास्ते

देवनंदन प्रसाद सिंह की यह दुःखद कहानी उन हजारों भारतीयों की व्यथा है जो बेहतर भविष्य की तलाश में खाड़ी देशों और युद्धग्रस्त क्षेत्रों में अपनी जान जोखिम में डालकर काम कर रहे हैं। भागलपुर के मशाकचक की गलियों में आज भले ही मातम है, लेकिन यह घटना सरकार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के लिए एक चेतावनी है। हमें अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए और भी कड़े कूटनीतिक कवच तैयार करने होंगे। देवनंदन तो अब यादों में शेष हैं, लेकिन उनकी मेधा, उनकी सादगी और उनका वह संघर्षपूर्ण सफर भागलपुर के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया है। द वॉयस ऑफ बिहार की टीम इस दुख की घड़ी में शोकाकुल परिवार के साथ खड़ी है और दिवंगत आत्मा की शांति की प्रार्थना करती है।

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