
भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामले में न्याय की मांग को लेकर खुलकर आवाज उठाने वाले बिहार पुलिस के सिपाही आशीष कुमार तिवारी के खिलाफ अब विभागीय कार्रवाई शुरू हो गई है। पूर्वी चंपारण पुलिस अधीक्षक कार्यालय की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार आशीष तिवारी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। उनके खिलाफ बिहार सरकारी सेवक आचार (संशोधन) नियमावली 2026 के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है। इस कार्रवाई के बाद मामला एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है।
भरत तिवारी एनकाउंटर मामले को लेकर पिछले कुछ दिनों से पूरे बिहार में बहस तेज है। मृतक के परिजन लगातार निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। इसी बीच भरत तिवारी के ग्रामीण और बिहार पुलिस में कार्यरत सिपाही आशीष कुमार तिवारी ने सोशल मीडिया और मीडिया प्लेटफॉर्म पर न्याय की मांग करते हुए भावुक बयान दिया था। उनके बयान ने व्यापक चर्चा पैदा कर दी थी।
आशीष तिवारी ने अपने बयान में कहा था कि यदि एक सप्ताह के भीतर उन्हें न्याय नहीं मिला, तो वह अपनी नौकरी छोड़ देंगे। उन्होंने कहा था कि भरत तिवारी मामले में सच्चाई सामने आनी चाहिए और दोषियों को सजा मिलनी चाहिए। उनका यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ और लोगों के बीच समर्थन तथा बहस दोनों देखने को मिले।
मोतिहारी पुलिस का कहना है कि आशीष तिवारी ने अपनी सेवा शर्तों और आचार नियमों का उल्लंघन किया है। पुलिस के अनुसार ग्राम बिलौटी, थाना शाहपुर, जिला भोजपुर में हुई घटना को लेकर उन्होंने बिहार सरकार और बिहार पुलिस के खिलाफ विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आपत्तिजनक बयान दिए। विभाग का आरोप है कि इससे पुलिस विभाग की छवि प्रभावित हुई और अनुशासनहीनता का परिचय मिला।
पुलिस अधीक्षक कार्यालय द्वारा जारी बयान में कहा गया कि सिपाही आशीष कुमार तिवारी ने पदेन कर्तव्य से इतर जाकर अनुशासनहीनता, मनमानी, स्वच्छाचारिता और उग्र व्यवहार का प्रदर्शन किया। विभागीय जांच में यह पाया गया कि उनका आचरण सरकारी सेवक आचार नियमावली के अनुरूप नहीं है। इसी आधार पर निलंबन की कार्रवाई की गई और विभागीय कार्यवाही प्रारंभ कर दी गई।
मामले को और गंभीर बनाता है आशीष तिवारी का विभागीय चरित्र इतिहास। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार उनके खिलाफ पहले भी कई गंभीर आरोप लग चुके हैं। वर्ष 2023 में हरपुर थाना क्षेत्र के रिजर्व गार्ड में प्रतिनियुक्ति के दौरान उन पर पुलिस पदाधिकारियों और कर्मियों के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग करने का आरोप लगा था। आरोप यह भी था कि उन्होंने गुस्से में रायफल खोजी और हथियार न मिलने पर चाकू से हमला कर एक गृहरक्षक को घायल कर दिया था।
उस मामले में विभागीय जांच के बाद उनके खिलाफ कार्रवाई की गई थी और छह महीने की वेतन वृद्धि रोक दी गई थी। विभाग का कहना है कि यह घटना उनके अनुशासनहीन व्यवहार का पहला बड़ा उदाहरण थी।
इसके बाद वर्ष 2024 में पिपराकोठी थाना में भी उनके खिलाफ गंभीर आरोप सामने आए। पुलिस के अनुसार 16 अगस्त 2024 की रात वह थाना पहुंचे और वहां मौजूद कर्मियों के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग करने लगे। जब एक चौकीदार ने आपत्ति जताई तो आरोप है कि उन्होंने सरकारी पिस्टल निकालकर उस पर तान दी और फायर भी किया।
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक बाद में जब एक अधिकारी ने उन्हें शांत कराने की कोशिश की, तो उन्होंने अधिकारी पर भी हथियार तान दिया। सौभाग्य से गोली फंस गई और कोई बड़ी जनहानि नहीं हुई। इस घटना के बाद उनके खिलाफ पिपराकोठी थाना में गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। यह मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन बताया जा रहा है।
मोतिहारी पुलिस का कहना है कि सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और बयान के आधार पर पुलिस उपाधीक्षक (रक्षित) द्वारा जांच कराई गई। जांच में आशीष तिवारी को प्रथम दृष्टया दोषी पाया गया। विभाग ने उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर भी दिया, लेकिन आरोप है कि उन्होंने संतोषजनक जवाब नहीं दिया। इसके बाद निलंबन का निर्णय लिया गया।
हालांकि आशीष तिवारी के समर्थकों का कहना है कि उन्होंने केवल न्याय की मांग की थी और इसे अनुशासनहीनता बताना उचित नहीं है। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने सवाल उठाया कि यदि कोई पुलिसकर्मी निष्पक्ष जांच की मांग करता है तो क्या उसे अपनी बात रखने का अधिकार नहीं होना चाहिए। दूसरी ओर विभाग का कहना है कि सेवा में रहते हुए सार्वजनिक मंचों पर विभाग और सरकार के खिलाफ बयान देना नियमों के विरुद्ध है।
इस पूरे विवाद के बीच एक और तथ्य सामने आया है। पुलिस के अनुसार आशीष तिवारी ने नौकरी छोड़ने का दावा तो किया, लेकिन उन्होंने औपचारिक रूप से इस्तीफा नहीं दिया। न तो कोई लिखित आवेदन विभाग को सौंपा गया और न ही वरीय अधिकारियों को इसकी आधिकारिक सूचना दी गई। इससे उनके बयान की गंभीरता और उद्देश्य पर भी सवाल उठ रहे हैं।
भरत तिवारी एनकाउंटर मामले ने पहले ही बिहार की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में हलचल पैदा कर रखी है। अब आशीष तिवारी के निलंबन ने इस विवाद को और हवा दे दी है। एक पक्ष इसे अनुशासन बनाए रखने के लिए जरूरी कदम बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे आवाज दबाने की कोशिश मान रहा है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल एक विभागीय कार्रवाई तक सीमित नहीं है। इसमें अभिव्यक्ति की सीमा, सरकारी सेवा नियम और संवेदनशील मामलों में सार्वजनिक प्रतिक्रिया जैसे कई पहलू जुड़े हुए हैं। आने वाले दिनों में विभागीय जांच और भरत तिवारी मामले की प्रगति पर सभी की नजर बनी रहेगी।
कुल मिलाकर भरत तिवारी प्रकरण में न्याय की मांग उठाने वाले सिपाही आशीष तिवारी का निलंबन इस पूरे विवाद में नया मोड़ लेकर आया है। अब देखना होगा कि विभागीय जांच किस निष्कर्ष तक पहुंचती है और भरत तिवारी मामले में न्याय की मांग को लेकर चल रही बहस किस दिशा में आगे बढ़ती है।


