
समाचार के मुख्य बिंदु: सुरक्षा बलों की मुस्तैदी और नक्सलियों के छिपे हथियारों का जखीरा
- बड़ी सफलता: जमुई के नक्सल प्रभावित जंगली इलाकों में चलाए गए दो अलग-अलग सर्च ऑपरेशनों में भारी मात्रा में विस्फोटक और अत्याधुनिक हथियारों के कारतूस बरामद किए गए हैं।
- CRPF की कार्रवाई: मुंगेर-जमुई सीमा पर स्थित पैसरा और लडैयाटांड के जंगलों में CRPF की 215 बटालियन ने एके-47 राइफल के 44 जिंदा कारतूस बरामद किए।
- SSB का प्रहार: चरकापत्थर थाना क्षेत्र के बाराटांड जंगल में SSB और स्थानीय पुलिस ने एक शक्तिशाली केन बम, 9 डेटोनेटर और एक ‘थ्री नॉट थ्री’ (303) राइफल मैगजीन के साथ बरामद की।
- नक्सली ठिकाना: कठौतिया पहाड़ और बाराटांड के घने जंगलों को नक्सलियों ने अपने हथियारों के ‘सेफ हाउस’ के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की थी।
- अधिकारियों का बयान: SSB के डिप्टी कमांडेंट शैलेश कुमार सिंह ने पुष्टि की है कि यह कार्रवाई गुप्त सूचना के आधार पर की गई थी, जिससे एक बड़े संभावित खतरे को टाल दिया गया है।
- VOB इनसाइट: जमुई और मुंगेर की भौगोलिक सीमा नक्सलियों के लिए हमेशा से एक सुरक्षित गलियारा रही है। एके-47 जैसे हथियारों के कारतूसों की बरामदगी यह संकेत देती है कि नक्सली गुट इस क्षेत्र में फिर से पैर पसारने या किसी बड़े हमले की फिराक में थे। सुरक्षा बलों द्वारा केन बम को समय रहते बरामद करना एक बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि ऐसे IED (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) सुरक्षा बलों के गश्ती दल को निशाना बनाने के लिए उपयोग किए जाते हैं।
जमुई | 29 मार्च, 2026
बिहार के जमुई जिले के नक्सल प्रभावित बीहड़ों में शनिवार की सुबह बारूद की गंध और खाकी की गर्जना के साथ शुरू हुई। सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के उन मंसूबों पर पानी फेर दिया है, जो जंगलों की आड़ में बड़े रक्तपात की तैयारी कर रहे थे। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, CRPF और SSB के संयुक्त अभियानों ने जमुई-मुंगेर सीमावर्ती क्षेत्रों में नक्सलियों के गुप्त शस्त्रागारों का पर्दाफाश किया है। एके-47 के कारतूसों से लेकर शक्तिशाली केन बम तक की बरामदगी यह बताती है कि लाल गलियारे में अभी भी बारूद सुलग रहा है, जिसे बुझाने के लिए सुरक्षा एजेंसियां ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति पर काम कर रही हैं।
ऑपरेशन कठौतिया पहाड़: AK-47 के कारतूसों का मिलना खतरे की घंटी
जमुई और मुंगेर जिले की सीमा पर स्थित पैसरा और लडैयाटांड के जंगली इलाके अपनी दुर्गमता के लिए जाने जाते हैं। शनिवार को CRPF की 215 बटालियन को सूचना मिली थी कि नक्सलियों ने कठौतिया पहाड़ के पास किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने के लिए गोला-बारूद छिपा रखा है।
बटालियन के जवानों ने जब इलाके की सघन घेराबंदी कर सर्च ऑपरेशन चलाया, तो उन्हें पत्थर के नीचे छिपाकर रखे गए एके-47 राइफल के 44 जिंदा कारतूस मिले। विशेषज्ञों का मानना है कि एके-47 के कारतूसों की मौजूदगी यह सिद्ध करती है कि इस क्षेत्र में नक्सलियों का वह दस्ता सक्रिय है जो आधुनिक हथियारों से लैस है। पुलिस अब उन सुरागों की तलाश कर रही है जिससे यह पता चल सके कि ये कारतूस यहाँ कितने समय से थे और इन्हें किस विशेष दस्ते के लिए रखा गया था।
चरकापत्थर में प्रहार: बाराटांड जंगल से मिला ‘मौत का सामान’
सीआरपीएफ की कार्रवाई के साथ ही जमुई के ही चरकापत्थर थाना क्षेत्र में भी सुरक्षा बलों ने अपनी धमक दिखाई। शनिवार की अहले सुबह SSB और स्थानीय चरकापत्थर थाना पुलिस की एक संयुक्त टीम ने बाराटांड के घने जंगलों में दस्तक दी।
बरामदगी की सूची और प्रभाव:
- शक्तिशाली केन बम: सुरक्षा बलों ने एक अत्यंत शक्तिशाली केन बम बरामद किया है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे बम जमीन के नीचे दबाकर रखे जाते हैं ताकि गश्ती वाहनों को उड़ाया जा सके।
- 9 डेटोनेटर: ये डेटोनेटर बम को सक्रिय करने और विस्फोट की तीव्रता को नियंत्रित करने के लिए उपयोग किए जाते हैं। इनकी संख्या बताती है कि नक्सली कई छोटे-बड़े IED बनाने की योजना पर काम कर रहे थे।
- थ्री नॉट थ्री (303) राइफल: पुलिस ने मैगजीन के साथ एक 303 राइफल भी बरामद की है। हालांकि, राइफल का लकड़ी वाला हिस्सा गायब था, जिससे इसके काफी पुराने होने की संभावना जताई जा रही है। जानकारों का मानना है कि नक्सली पुराने हथियारों को भी मरम्मत कर उपयोग में लाने की कोशिश करते रहते हैं।
सुरक्षा ग्रिड का ‘कोऑर्डिनेशन’: SSB और स्थानीय पुलिस की जुगलबंदी
SSB के डिप्टी कमांडेंट शैलेश कुमार सिंह ने बताया कि चरकापत्थर इलाके में हथियार छिपाकर रखे जाने की सूचना काफी सटीक थी। यही कारण रहा कि सुरक्षा बलों ने बिना किसी देरी के सटीक स्थान पर प्रहार किया। चरकापत्थर के थाना प्रभारी (एसएचओ) ने केन बम की शक्ति पर चिंता जताते हुए कहा कि यदि यह किसी सार्वजनिक स्थल या गश्ती दल के पास फटता, तो भारी क्षति हो सकती थी। बम निरोधक दस्ते की मदद से इस विस्फोटक को निष्क्रिय करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
जमुई-मुंगेर बॉर्डर: नक्सलियों का ‘ट्रांजिट पॉइंट’ और सुरक्षा चुनौतियां
’द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) का विश्लेषण कहता है कि जमुई का यह जंगली इलाका केवल एक जिला नहीं, बल्कि बिहार और झारखंड को जोड़ने वाली एक रणनीतिक कड़ी है।
- रणनीतिक महत्व: जमुई-मुंगेर की सीमा नक्सलियों के लिए एक सुरक्षित ‘एग्जिट और एंट्री’ पॉइंट का काम करती है। एक जिले में दबाव बढ़ने पर वे दूसरे जिले के जंगलों में शरण ले लेते हैं।
- हथियारों का डंप: सुरक्षा बलों की लगातार गश्त के कारण नक्सली अब हथियारों को अपने साथ लेकर चलने के बजाय जंगलों के भीतर गुप्त ठिकानों (Dumps) में छिपा रहे हैं। शनिवार की बरामदगी इसी रणनीति का एक हिस्सा है।
- IED का खतरा: घने जंगलों में केन बम और डेटोनेटर का मिलना यह बताता है कि नक्सली अब आमने-सामने की लड़ाई के बजाय ‘अदृश्य वार’ यानी IED ब्लास्ट पर अधिक भरोसा कर रहे हैं।
VOB का नजरिया: क्या नक्सलियों की ‘आर्थिक और तकनीकी’ कमर टूट रही है?
सुरक्षा बलों की हालिया कार्रवाइयों से यह स्पष्ट है कि नक्सलियों का सूचना तंत्र अब कमजोर पड़ रहा है।
- इंटेलिजेंस नेटवर्क: SSB और CRPF को मिलने वाली सटीक सूचनाएं यह दर्शाती हैं कि अब स्थानीय ग्रामीण भी नक्सलियों के डर से बाहर आकर सुरक्षा बलों का साथ दे रहे हैं।
- पुराने हथियारों की मजबूरी: 303 जैसी पुरानी राइफल का मिलना यह संकेत देता है कि नए हथियारों की सप्लाई चेन में भारी बाधा आई है।
- निरंतर सर्च ऑपरेशन: जमुई पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा चलाया जा रहा ‘सर्च और डिस्ट्रॉय’ अभियान नक्सलियों को स्थिर होने का मौका नहीं दे रहा है।
निष्कर्ष: शांति और सुरक्षा का संकल्प
जमुई के जंगलों से हुई यह बरामदगी न केवल सुरक्षा बलों की जीत है, बल्कि उन हजारों नागरिकों के लिए भी राहत की खबर है जो लाल आतंक के साये में जीने को मजबूर थे। एके-47 के कारतूसों और केन बम का मिलना यह याद दिलाता है कि सतर्कता में कमी बड़ी भारी पड़ सकती है। जमुई के पुलिस कप्तान और अर्धसैनिक बलों के कमांडेंट ने स्पष्ट किया है कि जब तक जंगलों से नक्सलियों का नामोनिशान नहीं मिट जाता, तब तक यह ‘ऑपरेशन क्लीन’ जारी रहेगा


