बिहार के लाल झंडू कुमार ने ग्लासगो में रचा इतिहास, ई-रिक्शा बेचकर जुटाए थे डाइट के पैसे; अब देश को दिलाया कांस्य पदक

नालंदा/हरनौत: बिहार के नालंदा जिले के हरनौत प्रखंड के सबनहुआ डीह निवासी दिव्यांग पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने अपनी मेहनत, संघर्ष और जुनून के दम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन किया है। स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित राष्ट्रमंडल खेल 2026 में झंडू कुमार ने पैरा पावरलिफ्टिंग के हेवीवेट मुकाबले में कांस्य पदक जीतकर भारत के लिए पदकों का खाता खोला। उनकी इस उपलब्धि से न केवल उनका परिवार और नालंदा जिला गौरवान्वित है, बल्कि पूरे बिहार में खुशी की लहर है।

झंडू कुमार की सफलता की कहानी इसलिए भी खास है, क्योंकि उन्होंने बेहद सीमित आर्थिक संसाधनों के बीच अपने खेल करियर को आगे बढ़ाया। एक समय ऐसा भी आया जब अंतरराष्ट्रीय स्तर की तैयारी और पौष्टिक आहार के लिए पैसे जुटाना उनके लिए बड़ी चुनौती बन गया था। तब उन्होंने परिवार की सहमति से अपना ई-रिक्शा और ठेला तक बेच दिया। इसके बाद सब्जी का कारोबार चलाकर करीब ढाई लाख रुपये जुटाए और अपनी ट्रेनिंग व डाइट पर खर्च किया। आज उसी संघर्ष का परिणाम है कि झंडू कुमार अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और देश के लिए पदक जीत चुके हैं।

190 किलोग्राम वजन उठाकर जीता कांस्य

ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल में झंडू कुमार ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 190 किलोग्राम वजन उठाया और कांस्य पदक अपने नाम किया। उनकी जीत की खबर मिलते ही हरनौत स्थित उनके घर और परिवार के बीच जश्न का माहौल बन गया। उनके माता-पिता कमला देवी और रामानंद पासवान की आंखों में खुशी के आंसू आ गए।

झंडू की मां ने बताया कि उन्होंने हमेशा अपने बेटे को देश का नाम रोशन करने का आशीर्वाद दिया। ग्लासगो रवाना होने से पहले भी उन्होंने झंडू को तिरंगा लेकर वापस आने की शुभकामना दी थी। बेटे की सफलता के बाद परिवार को अपने संघर्ष और त्याग का फल मिलने की खुशी है।

झंडू के माता-पिता हरनौत बाजार में सब्जी बेचकर परिवार का गुजारा करते हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं होने के बावजूद उन्होंने अपने बेटे के सपने को पूरा करने में हरसंभव सहयोग किया। झंडू भी परिवार की जिम्मेदारियों में हाथ बंटाते थे और जरूरत पड़ने पर सब्जी की दुकान संभालने के साथ ई-रिक्शा और ठेला भी चलाते थे।

डाइट के लिए बेच दिया ई-रिक्शा और ठेला

झंडू कुमार की खेल यात्रा आसान नहीं रही। जब उन्होंने भारोत्तोलन में गंभीरता से प्रशिक्षण शुरू किया, तब उनके कोच ने उन्हें बताया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहतर प्रदर्शन के लिए मजबूत शरीर और पौष्टिक आहार बेहद जरूरी है। लेकिन आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह नियमित रूप से महंगा पौष्टिक भोजन और प्रशिक्षण का खर्च उठा सकें।

ऐसे समय में झंडू ने हार मानने के बजाय रास्ता तलाशा। उन्होंने परिवार की सहमति से ई-रिक्शा और ठेला बेच दिया। इसके बाद सब्जी की दुकान से होने वाली आय और अन्य साधनों से करीब ढाई लाख रुपये का प्रबंध किया। इस पैसे का इस्तेमाल उन्होंने अपनी ट्रेनिंग और डाइट को बेहतर बनाने में किया।

उनका संघर्ष बताता है कि खेल प्रतिभा केवल बड़े शहरों या संपन्न परिवारों से नहीं आती। अगर किसी खिलाड़ी में मेहनत और लक्ष्य के प्रति समर्पण हो, तो वह सीमित संसाधनों के बावजूद दुनिया के बड़े मंच पर अपनी पहचान बना सकता है।

जिम के शौक से शुरू हुआ खेल का सफर

झंडू कुमार ने शुरुआत में शौक के तौर पर हरनौत में जिम जाना शुरू किया था। जिम में अभ्यास के दौरान उनकी शारीरिक क्षमता और वजन उठाने की प्रतिभा को प्रशिक्षक गौतम सिंह ने पहचाना। उन्होंने झंडू को पैरा पावरलिफ्टिंग में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

इसके बाद वर्ष 2019 में झंडू कुमार नालंदा पैरा स्पोर्ट्स एसोसिएशन से जुड़े। यहां से उनके खेल करियर को नई दिशा मिली। संगठन के सचिव और उनके कोच कुंदन कुमार पांडेय ने लगातार उनका मार्गदर्शन किया और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए तैयार किया।

बाद में झंडू का चयन स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र, गांधीनगर में हुआ। वहां उन्होंने पैरा पावरलिफ्टिंग के अनुभवी प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन में उच्च स्तर का प्रशिक्षण प्राप्त किया। उनके प्रशिक्षण और प्रदर्शन को बेहतर बनाने में कोचों तथा बिहार पैरा स्पोर्ट्स एसोसिएशन से जुड़े लोगों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा।

उपलब्धियों की लंबी सूची

झंडू कुमार ने पिछले कुछ वर्षों में लगातार शानदार प्रदर्शन किया है। वर्ष 2021 में कोलकाता में आयोजित 19वीं सीनियर राष्ट्रीय पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में उन्होंने 65 किलोग्राम वर्ग में कांस्य पदक जीता।

वर्ष 2025 में ग्रेटर नोएडा में आयोजित 22वीं सीनियर राष्ट्रीय पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में उन्होंने 72 किलोग्राम वर्ग में 205 किलोग्राम वजन उठाकर स्वर्ण पदक हासिल किया। इसके बाद नई दिल्ली में आयोजित खेलो इंडिया पैरा गेम्स 2025 में भी उन्होंने 72 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण पदक जीता।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी झंडू ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। चीन के बीजिंग में आयोजित वर्ल्ड पैरा पावरलिफ्टिंग वर्ल्ड कप 2025 में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए 192 किलोग्राम वजन उठाकर कांस्य पदक हासिल किया। इसके अलावा मिस्र के काहिरा में आयोजित वर्ल्ड पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में भी उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया।

वर्ष 2026 में रुड़की में आयोजित 23वीं सीनियर राष्ट्रीय पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में उन्होंने 72 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण पदक जीता। बैंकॉक में आयोजित एशिया-ओशिनिया ओपन पारा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में भी उन्होंने एशिया इवेंट और ओपन इवेंट, दोनों में कांस्य पदक अपने नाम किया। अब ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल में कांस्य पदक जीतकर उन्होंने अपनी उपलब्धियों की सूची में एक और बड़ी सफलता जोड़ दी है।

सरकारी नौकरी की उम्मीद

झंडू कुमार की अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों को देखते हुए वर्ष 2024 से उनके खेल संबंधी कई खर्च भारत सरकार की ओर से उठाए जा रहे हैं। बिहार सरकार की ओर से भी उन्हें कई अवसरों पर सम्मान और सहायता मिली है।

उनके कोच कुंदन कुमार पांडेय के अनुसार, झंडू को बिहार सरकार की ओर से तीन बार बिहार खेल सम्मान मिल चुका है। उन्हें प्रशस्ति पत्र के साथ दो-दो लाख रुपये की पुरस्कार राशि भी मिली। इसके अलावा उन्हें खेलवृत्ति का भी लाभ मिलता रहा है।

अब उनके उच्च स्तरीय स्कॉलरशिप के लिए चयनित होने की संभावना जताई जा रही है। वहीं, बिहार सरकार की ‘मेडल लाओ, नौकरी पाओ’ योजना के तहत लेवल-9 की सरकारी नौकरी की प्रक्रिया भी आगे बढ़ने की बात कही गई है। परिवार और उनके समर्थकों को उम्मीद है कि झंडू की अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों को देखते हुए उन्हें जल्द सरकारी नौकरी मिलेगी।

संघर्ष से मिली सफलता ने बदली पहचान

झंडू कुमार चार भाइयों में सबसे छोटे हैं और उनकी तीन बहनें हैं। परिवार का जीवन लंबे समय से आर्थिक संघर्षों से गुजरता रहा है। उनके माता-पिता आज भी हरनौत बाजार में सब्जी बेचकर परिवार का पालन-पोषण करते हैं। उनके भाई भी इसी काम में सहयोग करते हैं।

परिवार के अनुसार, झंडू ने अपनी दिव्यांगता को कभी कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने हमेशा अपनी मेहनत और खेल पर ध्यान केंद्रित किया। यही वजह है कि जब परिवार में उनकी शादी की बात होती थी, तब उन्होंने अपने खेल करियर को प्राथमिकता देते हुए शादी से इनकार कर दिया। अब उनकी अंतरराष्ट्रीय सफलता के बाद परिवार और कोच का कहना है कि उनके जीवन में आगे नई शुरुआत का समय भी आ सकता है।

प्रधानमंत्री ने भी दी बधाई

झंडू कुमार की शानदार उपलब्धि पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उन्हें बधाई दी। उन्होंने कहा कि झंडू ने पुरुषों के हेवीवेट पैरा पावरलिफ्टिंग इवेंट में कांस्य पदक जीतकर राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के लिए पदक का खाता खोला। प्रधानमंत्री ने उनकी उपलब्धि को उनकी ताकत, अटूट संकल्प और वर्षों की अनुशासित मेहनत का परिणाम बताया।

झंडू कुमार की कहानी केवल एक खिलाड़ी के पदक जीतने की कहानी नहीं है। यह उस संघर्ष की कहानी है जिसमें एक छोटे से गांव और सीमित संसाधनों से निकलकर एक युवा ने अंतरराष्ट्रीय मंच तक का सफर तय किया। ई-रिक्शा और ठेला बेचकर अपनी डाइट का इंतजाम करने से लेकर भारत के लिए राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीतने तक का उनका सफर उन हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो संसाधनों की कमी के कारण अपने सपनों को अधूरा छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं।

झंडू की सफलता यह संदेश देती है कि प्रतिभा को अगर मेहनत, सही मार्गदर्शन और अवसर मिल जाए, तो कोई भी बाधा मंजिल तक पहुंचने से रोक नहीं सकती। नालंदा के इस लाल ने ग्लासगो में तिरंगा लहराकर न केवल अपने माता-पिता का सपना पूरा किया, बल्कि पूरे बिहार और देश का मान भी बढ़ाया है।

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