
बिहार की सियासत इन दिनों एक बड़े सवाल के इर्द-गिर्द घूम रही है—आखिर मुख्यमंत्री की कुर्सी कब खाली होगी? राज्य के सियासी दिग्गज नीतीश कुमार राज्यसभा के लिए निर्वाचित हो चुके हैं, लेकिन अब तक उन्होंने मुख्यमंत्री पद नहीं छोड़ा है। यही स्थिति राजनीतिक गलियारों में चर्चा और अटकलों को तेज कर रही है।
कानूनी पेच: गजट नोटिफिकेशन बना मुख्य कारण
संविधान के अनुच्छेद 101(2) और Prohibition of Simultaneous Membership Rules, 1950 के अनुसार कोई भी व्यक्ति एक साथ संसद और राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं रह सकता।
हालांकि, यहां मामला गजट नोटिफिकेशन में अटका हुआ है।
कानून के मुताबिक, राज्यसभा चुनाव का परिणाम जब तक सरकारी गजट में प्रकाशित नहीं होता, तब तक 14 दिन की इस्तीफा अवधि शुरू नहीं होती। यानी गजट जारी होने तक तकनीकी रूप से दो पदों पर बने रहना संभव है।
16 मार्च को जीत के बावजूद अब तक इस्तीफा नहीं आने से सस्पेंस और गहरा गया है।
खरमास भी बना देरी की वजह?
राजनीति के साथ-साथ परंपराएं भी भूमिका निभा रही हैं। माना जा रहा है कि 13 अप्रैल तक खरमास होने के कारण नई शुरुआत से बचा जाता है। ऐसे में सत्ता परिवर्तन 14 अप्रैल के बाद होने की संभावना जताई जा रही है।
डेडलाइन और संभावित जोखिम
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि 30 मार्च तक गजट जारी हो जाता है और उसके 14 दिन के भीतर इस्तीफा नहीं दिया जाता, तो राज्यसभा सदस्यता पर संकट आ सकता है।
इसी बीच, 4 अप्रैल तक के आधिकारिक कार्यक्रमों को उनकी “विदाई पारी” के रूप में भी देखा जा रहा है।
दो चरणों में हो सकता है फैसला
सूत्रों के अनुसार, Nitish Kumar एक चरणबद्ध रणनीति अपना सकते हैं—
- पहला चरण: विधान परिषद (MLC) से इस्तीफा देकर राज्यसभा सदस्यता को औपचारिक रूप देना
- दूसरा चरण: मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा, जब उत्तराधिकारी का नाम तय हो जाए और खरमास समाप्त हो जाए
विरासत और संतुलन पर फोकस
नीतीश कुमार यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि दिल्ली जाने से पहले बिहार में उनकी राजनीतिक विरासत और गठबंधन की स्थिरता बनी रहे।
निष्कर्ष: वेट एंड वॉच की स्थिति
फिलहाल बिहार की राजनीति “वेट एंड वॉच” मोड में है। संविधान, गजट नोटिफिकेशन और शुभ मुहूर्त—तीनों मिलकर तय करेंगे कि आखिरकार मुख्यमंत्री की कुर्सी कब खाली होगी।


