भागलपुर की ‘रोजगार देने वाली दीदी’ रेखा:मजदूरी के अंधेरे से उद्यम की रौशनी तक, 30 महिलाओं की बदली किस्मत

पटना, 02 फरवरी।कभी गुजरात में पति की मजदूरी पर आश्रित, पक्की छत से दूर और दो वक्त की रोटी के लिए जद्दोजहद—भागलपुर जिले के आकांक्षी प्रखंड पीरपैंती की प्यालपुर पंचायत (गोकुल मथुरा) की रेखा देवी ने हालात से हार नहीं मानी। आज वही रेखा पूरे इलाके में ‘रोजगार देने वाली दीदी’ के नाम से जानी जाती हैं—जिनके साथ जुड़कर 30 से अधिक महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी हो चुकी हैं।

जीविका ने दी उड़ान, रेखा बनी नेतृत्वकर्ता

रेखा दीदी ने नीतीश सरकार की जीविका योजना से प्रेरित होकर गांव में स्वयं सहायता समूह बनाया, उसकी नेतृत्वकर्ता बनीं और एक-एक कर महिलाओं को जोड़ा। प्रशिक्षण, लोन और बाजार से जोड़ने का काम उन्होंने खुद संभाला। आज उनका मॉडल गांव के लिए मिसाल बन चुका है।

चाय से मशरूम तक—रोजगार के कई रास्ते

रेखा दीदी ने महिलाओं को PMFME, कृषि विश्वविद्यालय सबौर के प्रशिक्षण से जोड़कर चाय स्टॉल, मशरूम उत्पादन, पकोड़े-सत्तू की दुकान, आटा-चक्की जैसे छोटे उद्यम शुरू कराए।
मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना से मिली सहायता से बकरी पालन को भी बढ़ावा मिला—कई दीदियों ने बकरियां खरीदीं और आज अपनी आमदनी खुद संभाल रही हैं।

आज गोकुल मथुरा में रेखा दीदी की मशरूम यूनिट चल रही है, जहां 10–12 महिलाएं काम करती हैं। बिक्री कम होने पर मशरूम से अचार बनाकर बाजार में उतार देती हैं—नुकसान को मौके में बदलने की सीख भी देती हैं।

‘कमजोर को पहले’—रेखा का नियम

रेखा दीदी आर्थिक रूप से कमजोर और विधवा महिलाओं को प्राथमिकता देती हैं। वे जीविका से लोन दिलवाती हैं, प्रशिक्षण कराती हैं और बाजार से जोड़ती हैं—ताकि कोई पीछे न छूटे।

बदली ज़िंदगी, बदला नजरिया

  • पूजा: “पहले कोई पूछता नहीं था। सास ताने देती थीं। रेखा दीदी ने जीविका से जोड़ा, 10 हजार से सिलाई मशीन खरीदी। अब मशरूम यूनिट में भी काम कर रही हूं।”
  • शिल्पी: “दो वक्त का खाना मुश्किल था। जीविका लोन से आटा-चक्की लगाई, फिर 1 लाख से चना-सत्तू उत्पादन शुरू किया।”

योजना की ताकत

जीविका के BPM दीपक कुमार कहते हैं, “समूहों में प्रशिक्षण और लोन देकर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है। समय पर लोन वापसी बताती है कि मॉडल सफल है।”

सम्मान के साथ आत्मनिर्भरता

रेखा दीदी की कहानी बताती है—सरकारी योजनाएं जब जमीन पर उतरती हैं, तो रोजगार के साथ सम्मान भी मिलता है। आज उनकी मशरूम सप्लाई दूसरे शहरों तक जा रही है और पीरपैंती की कई महिलाएं आत्मनिर्भर बन चुकी हैं।

रेखा दीदी सिर्फ एक नाम नहीं—एक बदलाव हैं।

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