
भागलपुर, 2 अगस्त 2025 — बिहार की पारंपरिक बुनाई कला को राष्ट्रीय मंच पर ऐतिहासिक पहचान मिली है। नालंदा जिले के सिलाव, नेपुरा गाँव के बुनकर कमलेश कुमार को वर्ष 2025 के राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार के लिए चयनित किया गया है। यह पुरस्कार भारत सरकार के हथकरघा विकास आयुक्त कार्यालय द्वारा स्थापित है, जो उत्कृष्ट शिल्प कौशल एवं स्वदेशी हथकरघा परंपराओं के संरक्षण के लिए दिया जाता है।
कमलेश कुमार को यह सम्मान उनकी “बावन बूटी साड़ी बुनाई” की अनूठी तकनीक और तसर पर राजगीर के शांति स्तूप की कलाकृति उकेरने के लिए दिया जा रहा है। यह कला न केवल अत्यंत कठिन और तकनीकी है, बल्कि अब विलुप्तप्राय भी मानी जाती है। इस शिल्प को जीवंत बनाए रखने में कमलेश कुमार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।
11वां राष्ट्रीय हथकरघा दिवस समारोह: मिलेगा सम्मान
यह पुरस्कार 7 अगस्त 2025 को भारत मंडपम, नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय हथकरघा दिवस समारोह में भारत के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया जाएगा। यह अवसर बिहार और पूरे हथकरघा समुदाय के लिए गौरवपूर्ण क्षण होगा।
बिहार के लिए पहली बार: इतिहास में दर्ज उपलब्धि
बुनकर सेवा केंद्र, भागलपुर द्वारा अनुशंसित कमलेश कुमार बिहार के पहले ऐसे बुनकर हैं जिन्हें यह प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हो रहा है। उपनिदेशक राजेश चटर्जी ने बताया कि इससे न केवल राज्य की बावन बूटी बुनाई जैसी विशिष्ट कला को मान्यता मिली है, बल्कि पूरे बुनकर समाज को एक नई पहचान भी प्राप्त हो रही है।
तकनीकी पर्यवेक्षक प्रभात कुमार सिंह ने बताया कि इस सम्मान के माध्यम से हथकरघा उद्योग को संरक्षित करने की दिशा में और भी योजनाएँ बनाई जा रही हैं। वस्त्र डिज़ाइनर अनिरुद्ध रंजन ने कहा कि बावन बूटी बुनाई में सूक्ष्म डिज़ाइन, संरेखण और रंग संयोजन की अत्यंत जटिलता होती है, जिसे बहुत कम कारीगर ही निष्पादित कर सकते हैं।
समर्पित जीवन, विरासत में मिली कला
कमलेश कुमार ने बातचीत में बताया कि यह कला उन्हें पीढ़ियों से विरासत में मिली है और उन्होंने इसे न सिर्फ जीवित रखा, बल्कि आधुनिक तकनीकों और प्रशिक्षण के ज़रिए इसे युवा पीढ़ी तक पहुँचाया है। वे निफ्ट पटना सहित कई संस्थानों में बावन बूटी कला के प्रशिक्षण से भी जुड़े हुए हैं।
उन्होंने भारत सरकार और बुनकर सेवा केंद्र, भागलपुर का विशेष धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि यह पुरस्कार न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि समस्त बिहार के हथकरघा बुनकरों की सामूहिक जीत है।
यह पुरस्कार राज्य की हथकरघा परंपराओं को राष्ट्रीय पहचान दिलाने और स्वदेशी कला के संरक्षण हेतु उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है।


