
- मिडिल ईस्ट में चल रहे भीषण युद्ध की तपिश अब सात समंदर पार बिहार के भागलपुर तक पहुँच गई है, जहाँ एक होनहार मरीन इंजीनियर की जान वैश्विक संघर्ष की भेंट चढ़ गई।
- भागलपुर के मशाकचक निवासी देवनंदन प्रसाद सिंह का पार्थिव शरीर बुधवार को उनके पैतृक आवास पहुँचा, जिसके बाद पूरे इलाके में चीख-पुकार और मातम का सन्नाटा पसर गया।
- देवनंदन जहाज पर एडिशनल चीफ इंजीनियर के पद पर तैनात थे और ईरान ने उनके जहाज को मिसाइल से निशाना बनाया गया था।
- करीब 20 दिनों की लंबी और थका देने वाली कूटनीतिक प्रक्रियाओं के बाद उनके अवशेषों को वतन वापस लाया जा सका है, जहाँ उनके अंतिम दर्शन के लिए हजारों की भीड़ उमड़ पड़ी।
- परिवार के लिए यह वज्रपात की तरह है, क्योंकि देवनंदन न केवल घर के मुख्य आधार थे, बल्कि मशाकचक के युवाओं के लिए सफलता की एक बड़ी मिसाल भी थे।
भागलपुर (द वॉयस ऑफ बिहार)।
बीस दिनों का अंतहीन इंतजार और एक खामोश वापसी
भागलपुर के मशाकचक की तंग गलियों में बुधवार को एक ऐसी खामोशी पसरी थी, जो किसी बड़े तूफान के बाद की वीरानी जैसी थी। बीते 20 दिनों से जिस घर की आँखें आसमान में उड़ते जहाजों और सरकारी दफ्तरों से आने वाली चिट्ठियों पर टिकी थीं, वहाँ आज एम्बुलेंस के सायरन ने सब कुछ खत्म होने का ऐलान कर दिया। देवनंदन प्रसाद सिंह, जो अपनी मेधा के बल पर समुद्री लहरों को चीरते हुए दुनिया के नक्शे पर भागलपुर का नाम रोशन कर रहे थे, आज एक लकड़ी के बक्से में सिमटकर वापस लौटे हैं। यह उन परिजनों के लिए किसी डरावने सपने जैसा है, जिन्होंने 20 दिन पहले अपनी आँखों में उम्मीद की चमक के साथ उनके सुरक्षित लौटने की मन्नतें मांगी थीं। मशाकचक की सड़कों पर आज फूल नहीं, बल्कि आंसुओं का सैलाब था, क्योंकि वहाँ का एक ‘चीफ इंजीनियर’ अब हमेशा के लिए खामोश हो चुका था।
वह रणक्षेत्र जहाँ छिनी देवनंदन की सांसें
घटना उस वक्त की है जब देवनंदन प्रसाद सिंह कंपनी के एक विशाल जहाज पर अपनी ड्यूटी निभा रहे थे। वे एडिशनल चीफ इंजीनियर जैसे महत्वपूर्ण पद पर तैनात थे, जिस पर जहाज की तकनीकी सुरक्षा और इंजन की पूरी जिम्मेदारी होती है। जहाज ईरान से माल लेकर भारत की ओर बढ़ रहा था। जैसे ही जहाज होर्मुज की खाड़ी के पास पहुँचा, मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध के उन्माद ने इसे अपनी चपेट में ले लिया। एक भटकती हुई या जानबूझकर छोड़ी गई मिसाइल ने सीधे जहाज को निशाना बनाया। वह धमाका इतना जोरदार था कि जहाज का एक बड़ा हिस्सा मलबे में तब्दील हो गया और इंजन रूम के पास तैनात देवनंदन को संभलने का मौका तक नहीं मिला। एक पेशेवर इंजीनियर, जिसका किसी देश की राजनीति या युद्ध से कोई लेना-देना नहीं था, वह दो देशों की नफरत की आग में झुलस गया।
परिजनों की जुबानी: एक घर का चिराग बुझने की दास्तान
देवनंदन के पार्थिव शरीर के पास खड़े उनके मामा प्रवीण सिंह कुशवाहा की आँखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उन्होंने भारी मन से बताया कि देवनंदन केवल एक भांजा नहीं, बल्कि पूरे खानदान की उम्मीद था। वह बहुत ही साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर इतनी ऊँचाई तक पहुँचा था। कंपनी में उसकी साख एक ईमानदार और काबिल अफसर की थी। प्रवीण सिंह कुशवाहा के अनुसार, घटना के बाद के 20 दिन उनके परिवार ने कैसे काटे हैं, यह सिर्फ वही जानते हैं। कभी कंपनी से बात करना, कभी विदेश मंत्रालय के चक्कर काटना—हर दिन एक नई उम्मीद टूटती थी। आज जब शव पहुँचा है, तो कलेजा फट रहा है कि हमारा बच्चा इस हाल में लौटेगा, यह कभी सोचा नहीं था।
वहीं, मृतक के एक अन्य परिजन दीपक सिंह ने बताया कि देवनंदन की मौत ने न केवल एक परिवार को उजाड़ा है, बल्कि मशाकचक के गौरव को भी ठेस पहुँचाई है। दीपक के अनुसार, देवनंदन जब भी गाँव आते थे, तो युवाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा देते थे। वे हमेशा कहते थे कि समुद्र की लहरों में रोमांच है, लेकिन आज उन्हीं लहरों ने उन्हें लील लिया। परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है। देवनंदन की पत्नी और बच्चों की स्थिति ऐसी है कि वे कुछ भी बोलने या समझने की स्थिति में नहीं हैं। घर की दीवारें अब उनकी उन यादों की गवाह हैं जो वे अपनी पिछली छुट्टियों में छोड़कर गए थे।
मिडिल ईस्ट का युद्ध: अब बिहार की चौखट तक पहुँची विभीषिका
यह घटना इस कड़वे सच को उजागर करती है कि आधुनिक युग के युद्ध अब केवल सीमाओं तक सीमित नहीं हैं। जब मिडिल ईस्ट में मिसाइलें चलती हैं, तो उसका असर भागलपुर की एक रसोई पर भी पड़ता है। देवनंदन प्रसाद सिंह जैसे हजारों भारतीय नाविक आज उन खतरनाक जलमार्गों पर काम कर रहे हैं, जो युद्ध के कारण ‘हॉट जोन’ बन चुके हैं। होर्मुज की खाड़ी और लाल सागर में जहाजों पर हो रहे हमले अब वैश्विक व्यापार के साथ-साथ इंसानी जिंदगियों के लिए भी काल बन रहे हैं। देवनंदन की शहादत (एक पेशेवर के रूप में) यह सवाल खड़ा करती है कि अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा? क्या बिश्नोई कंपनी या भारत सरकार ऐसे क्षेत्रों में काम करने वाले अपने नागरिकों के लिए कोई विशेष सुरक्षा घेरा तैयार कर पाएगी?
मशाकचक में उमड़ा जनसैलाब: नम आँखों से आखिरी विदाई
जैसे ही यह खबर फैली कि देवनंदन का शव घर पहुँच गया है, मशाकचक ही नहीं बल्कि आसपास के मोहल्लों से भी लोग खिंचे चले आए। प्रशासन की ओर से सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे क्योंकि भीड़ अनियंत्रित हो रही थी। हर कोई उस जांबाज इंजीनियर की एक झलक पाना चाहता था जिसने सात समंदर पार वतन का नाम ऊँचा किया था। अंतिम दर्शन के दौरान ‘देवनंदन प्रसाद सिंह अमर रहें’ के नारों से मशाकचक की गलियाँ गूँज उठीं। लोगों के मन में दुख के साथ-साथ उस व्यवस्था के प्रति आक्रोश भी था, जिसकी वजह से एक मासूम इंजीनियर की जान चली गई। स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी मौके पर पहुँचकर शोक संवेदना व्यक्त की और परिवार को ढांढस बंधाया।
एक अपूरणीय क्षति और भविष्य के सवाल
देवनंदन प्रसाद सिंह अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी मृत्यु ने कई गंभीर सवाल छोड़ दिए हैं। एक मिडिल क्लास परिवार का बेटा जो अपनी मेहनत से चीफ इंजीनियर बनता है, उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? क्या युद्धग्रस्त क्षेत्रों में व्यापारिक जहाजों का संचालन बंद नहीं होना चाहिए? भागलपुर के मशाकचक का यह घर अब कभी पहले जैसा नहीं होगा। गंगा के तट पर जब उनकी चिता को मुखाग्नि दी गई, तो उठते धुएं के साथ एक और बिहारी मेधा का अंत हो गया। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ देवनंदन प्रसाद सिंह को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है और केंद्र व राज्य सरकार से मांग करता है कि पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा और बच्चों की शिक्षा की पूरी जिम्मेदारी सुनिश्चित की जाए।


