विक्रमशिला केंद्रीय विश्वविद्यालय परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण का विरोध, किसानों ने उचित मुआवजे की मांग को लेकर किया प्रदर्शन

भागलपुर: भागलपुर जिले के कहलगांव प्रखंड अंतर्गत अंतिचक पंचायत में प्रस्तावित विक्रमशिला केंद्रीय विश्वविद्यालय और उससे जुड़ी विकास परियोजनाओं के लिए किए जा रहे भूमि अधिग्रहण को लेकर किसानों का विरोध तेज हो गया है। स्थानीय किसानों ने अपनी कृषि भूमि के बदले उचित मुआवजा नहीं मिलने का आरोप लगाते हुए प्रदर्शन किया और प्रशासन से पुनर्विचार की मांग की। किसानों का कहना है कि विकास कार्यों का वे स्वागत करते हैं, लेकिन उनकी जमीन का मूल्य वर्तमान बाजार दर के अनुरूप निर्धारित किया जाना चाहिए।

प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीण और किसान एकत्र हुए। उन्होंने प्रशासन के खिलाफ नाराजगी जताते हुए कहा कि प्रस्तावित मुआवजा राशि उनकी भूमि के वास्तविक मूल्य से काफी कम है। किसानों का दावा है कि यदि इसी दर पर जमीन अधिग्रहित की जाती है तो उनके परिवारों के सामने आर्थिक और सामाजिक संकट खड़ा हो सकता है।

भूमि अधिग्रहण को लेकर बढ़ा असंतोष

विक्रमशिला केंद्रीय विश्वविद्यालय परियोजना को बिहार की महत्वपूर्ण शैक्षणिक योजनाओं में से एक माना जा रहा है। सरकार का उद्देश्य इस परियोजना के माध्यम से उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नए अवसर पैदा करना और क्षेत्र को राष्ट्रीय स्तर पर शैक्षणिक पहचान दिलाना है।

हालांकि, परियोजना के लिए आवश्यक भूमि अधिग्रहण को लेकर प्रभावित गांवों में असंतोष देखने को मिल रहा है। किसानों का कहना है कि उनकी वर्षों पुरानी कृषि भूमि को अधिग्रहित किया जा रहा है, लेकिन उसके बदले जो मुआवजा प्रस्तावित किया गया है, वह संतोषजनक नहीं है।

प्रदर्शन कर रहे किसानों का कहना है कि जमीन केवल संपत्ति नहीं बल्कि उनकी आजीविका का मुख्य आधार है। खेती से ही उनके परिवार का भरण-पोषण होता है और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी इसी पर निर्भर है।

बाजार मूल्य के अनुसार मुआवजा देने की मांग

प्रदर्शन के दौरान किसानों ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे किसी भी विकास परियोजना के विरोध में नहीं हैं। उनका विरोध केवल मुआवजे की राशि को लेकर है।

किसानों का कहना है कि सरकार द्वारा तय की गई दर वर्तमान बाजार मूल्य से काफी कम है। उनका आरोप है कि जिस क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण किया जा रहा है, वहां जमीन की वास्तविक कीमत सरकारी मूल्यांकन से कहीं अधिक है।

प्रदर्शनकारियों का कहना था कि यदि उनकी जमीन विकास कार्यों के लिए ली जा रही है तो उन्हें भी न्यायसंगत और सम्मानजनक मुआवजा मिलना चाहिए। किसानों ने प्रशासन से बाजार दर के अनुसार भूमि का पुनर्मूल्यांकन कराने की मांग की।

उनका कहना है कि उचित मुआवजा मिलने पर वे विकास कार्यों में सहयोग करने को तैयार हैं, लेकिन कम मूल्य पर अपनी जमीन छोड़ना उनके लिए संभव नहीं होगा।

खेती पर निर्भर हैं सैकड़ों परिवार

अंतिचक पंचायत और आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में किसान कृषि पर निर्भर हैं। यहां अधिकांश परिवारों की आय का प्रमुख स्रोत खेती ही है।

किसानों का कहना है कि यदि उनकी जमीन अधिग्रहित कर ली जाती है और बदले में पर्याप्त मुआवजा नहीं मिलता तो उनके सामने रोजगार और आजीविका का संकट खड़ा हो जाएगा। कई किसानों ने चिंता जताई कि जमीन चले जाने के बाद उनके पास आय का कोई स्थायी साधन नहीं बचेगा।

ग्रामीणों का कहना है कि कृषि भूमि केवल वर्तमान पीढ़ी के लिए ही नहीं बल्कि उनके बच्चों के भविष्य के लिए भी महत्वपूर्ण है। इसलिए भूमि अधिग्रहण के दौरान किसानों के हितों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

विकास और विस्थापन के बीच संतुलन की मांग

प्रदर्शन कर रहे किसानों ने कहा कि वे शिक्षा और विकास के महत्व को समझते हैं। विक्रमशिला केंद्रीय विश्वविद्यालय जैसी परियोजना से क्षेत्र को लाभ मिलने की संभावना है, लेकिन विकास के नाम पर किसानों की समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

कई किसानों का कहना था कि सरकार को विकास और विस्थापन के बीच संतुलन बनाना होगा। यदि किसी परियोजना के लिए लोगों की जमीन ली जाती है तो उन्हें आर्थिक रूप से सुरक्षित करने की भी जिम्मेदारी सरकार की होनी चाहिए।

प्रदर्शन में शामिल लोगों ने मांग की कि प्रभावित परिवारों को केवल मुआवजा ही नहीं बल्कि पुनर्वास, रोजगार और अन्य सुविधाओं पर भी विचार किया जाए।

प्रदर्शन के दौरान प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी

किसानों ने प्रदर्शन के दौरान अपनी मांगों के समर्थन में नारेबाजी भी की। उनका कहना था कि जब तक उनकी बातों को गंभीरता से नहीं सुना जाएगा, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।

प्रदर्शनकारियों ने प्रशासनिक अधिकारियों से वार्ता कर समाधान निकालने की अपील की। कई किसानों ने कहा कि वे शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना चाहते हैं और उम्मीद करते हैं कि प्रशासन उनकी चिंताओं को समझेगा।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया तो आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है।

जमीन नहीं देने की चेतावनी

प्रदर्शन के दौरान किसानों ने स्पष्ट चेतावनी दी कि जब तक उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक वे अपनी जमीन अधिग्रहण के लिए उपलब्ध नहीं कराएंगे।

उनका कहना है कि वे किसी टकराव की स्थिति नहीं चाहते, लेकिन अपने अधिकारों और भविष्य की सुरक्षा के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं। किसानों ने कहा कि प्रशासन को उनकी आर्थिक स्थिति और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेना चाहिए।

किसानों का यह भी कहना है कि यदि उचित मुआवजा सुनिश्चित किया जाता है तो परियोजना को लेकर उनकी आपत्तियां काफी हद तक समाप्त हो सकती हैं।

क्षेत्र में बना चर्चा का माहौल

भूमि अधिग्रहण और किसानों के विरोध को लेकर पूरे क्षेत्र में चर्चा का माहौल बना हुआ है। स्थानीय लोग इस मामले को ध्यान से देख रहे हैं क्योंकि इसका प्रभाव बड़ी संख्या में परिवारों पर पड़ सकता है।

कई ग्रामीणों का मानना है कि विक्रमशिला केंद्रीय विश्वविद्यालय जैसी परियोजनाएं क्षेत्र के विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इसके साथ-साथ किसानों के हितों की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है।

स्थानीय सामाजिक संगठनों और बुद्धिजीवियों ने भी इस मामले में संवाद और सहमति के आधार पर समाधान निकालने की आवश्यकता पर बल दिया है।

प्रशासन से समाधान की उम्मीद

फिलहाल किसान प्रशासन से सकारात्मक पहल की उम्मीद लगाए बैठे हैं। उनका मानना है कि यदि अधिकारियों और किसानों के बीच सार्थक बातचीत होती है तो विवाद का समाधान निकाला जा सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भूमि अधिग्रहण से जुड़े मामलों में पारदर्शिता और संवाद बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। यदि प्रभावित लोगों को उनकी जमीन का उचित मूल्य और भविष्य की सुरक्षा का भरोसा दिया जाए तो अधिकांश विवादों का समाधान संभव है।

वर्तमान में अंतिचक पंचायत के किसान अपनी मांगों को लेकर एकजुट दिखाई दे रहे हैं। आने वाले दिनों में प्रशासन और किसानों के बीच होने वाली बातचीत इस पूरे विवाद की दिशा तय करेगी। फिलहाल किसानों का रुख साफ है कि वे विकास कार्यों के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन अपनी जमीन का उचित मूल्य मिलने तक संघर्ष जारी रखेंगे।

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