विक्रमशिला सेतु टूटने से बढ़ी परेशानी, नाव के सहारे सफर; बाबूपुर घाट पर लगी लंबी कतार

भागलपुर: विक्रमशिला सेतु के पिलर संख्या 133 के पास सड़क का स्लैब टूटने के बाद भागलपुर और आसपास के इलाकों में जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। इस घटना के बाद प्रशासन ने एहतियातन पुल पर आवागमन पूरी तरह बंद कर दिया, जिससे अब लोगों के सामने आवागमन की गंभीर समस्या खड़ी हो गई है।

खासकर भागलपुर से कटिहार, पूर्णिया और सीमांचल के अन्य जिलों की ओर जाने वाले यात्रियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जहां पहले लोग कुछ ही मिनटों में पुल पार कर अपने गंतव्य तक पहुंच जाते थे, वहीं अब उन्हें घंटों का समय और अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ रही है।

बाबूपुर घाट बना नई ‘लाइफलाइन’

पुल बंद होने के बाद बाबूपुर गंगा घाट अब यात्रियों के लिए अस्थायी लाइफलाइन बन गया है। सुबह होते ही यहां यात्रियों की लंबी कतार लग जाती है।

कामकाजी लोग, छात्र, व्यापारी और मरीज—सभी अपने-अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए नाव का इंतजार करते नजर आते हैं। कई लोग सुबह 5 बजे से ही घाट पर पहुंच जाते हैं ताकि उन्हें जल्दी नाव मिल सके, लेकिन भीड़ इतनी ज्यादा होती है कि घंटों इंतजार करना पड़ता है।

घाट पर अफरा-तफरी और अव्यवस्था का माहौल देखने को मिल रहा है। लोग किसी तरह जल्दी पार जाने की कोशिश में धक्का-मुक्की तक कर रहे हैं।

नाव के सहारे जोखिम भरा सफर

नाव से गंगा पार करना लोगों के लिए मजबूरी बन गया है। हालांकि यह विकल्प उपलब्ध है, लेकिन इसमें कई तरह के खतरे भी जुड़े हुए हैं।

अक्सर देखा जा रहा है कि नावों में क्षमता से अधिक यात्रियों को बैठा लिया जाता है। साथ ही, लोग अपने साथ भारी सामान भी लेकर चलते हैं, जिससे नाव का संतुलन बिगड़ने का खतरा बढ़ जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया गया, तो यह स्थिति किसी बड़े हादसे को न्योता दे सकती है।

कई यात्रियों ने बताया कि उन्हें डर तो लगता है, लेकिन मजबूरी में यही रास्ता अपनाना पड़ रहा है।

रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ा गहरा असर

विक्रमशिला सेतु बंद होने का असर लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर साफ नजर आ रहा है।

  • कामकाजी लोग: समय पर ऑफिस नहीं पहुंच पा रहे हैं
  • छात्र: स्कूल और कॉलेज जाने में देरी हो रही है
  • व्यापारी: व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं
  • मरीज: अस्पताल पहुंचने में परेशानी का सामना कर रहे हैं

एक स्थानीय निवासी ने बताया कि पहले जहां 20-25 मिनट में शहर पहुंच जाते थे, अब वही दूरी तय करने में 2-3 घंटे लग रहे हैं।

वैकल्पिक मार्ग, लेकिन लंबा और थकाऊ

प्रशासन ने मुंगेर और अन्य मार्गों को वैकल्पिक रास्ते के रूप में सुझाया है, लेकिन यह रास्ता काफी लंबा है।

ज्यादातर लोगों के लिए यह विकल्प समय और खर्च दोनों के लिहाज से कठिन साबित हो रहा है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में लोग नाव से सफर करना ज्यादा सुविधाजनक मान रहे हैं, भले ही उसमें जोखिम क्यों न हो।

व्यापार और रोजगार पर असर

इस संकट का असर केवल यात्रियों तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय व्यापार और रोजगार पर भी पड़ा है।

छोटे व्यापारी समय पर माल नहीं पहुंचा पा रहे हैं, जिससे उनका कारोबार प्रभावित हो रहा है। दैनिक मजदूरी करने वाले लोग भी समय पर काम पर नहीं पहुंच पा रहे हैं, जिससे उनकी आय पर असर पड़ रहा है।

दूध, सब्जी और अन्य जरूरी सामान की आपूर्ति भी प्रभावित हो रही है, जिससे आने वाले दिनों में कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है।

प्रशासन की निगरानी और चुनौतियां

प्रशासन स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। घाटों पर पुलिस बल की तैनाती की गई है ताकि भीड़ को नियंत्रित किया जा सके और किसी तरह की अव्यवस्था न हो।

फिर भी, अचानक बढ़ी भीड़ और सीमित संसाधनों के कारण व्यवस्था बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन गई है।

अधिकारियों का कहना है कि लोगों की सुविधा के लिए अतिरिक्त नावों की व्यवस्था करने पर विचार किया जा रहा है।

लोगों की मांग: जल्द हो समाधान

स्थानीय लोगों ने सरकार और प्रशासन से जल्द से जल्द स्थायी समाधान निकालने की मांग की है।

लोगों का कहना है कि विक्रमशिला सेतु केवल एक पुल नहीं, बल्कि लाखों लोगों की जिंदगी से जुड़ा है। इसके बंद होने से पूरा क्षेत्र प्रभावित हो गया है।

कई लोगों ने अस्थायी पोंटून पुल (पीपा पुल) या अधिक संख्या में नाव सेवा शुरू करने की मांग भी उठाई है।

विक्रमशिला सेतु के क्षतिग्रस्त होने के बाद भागलपुर और आसपास के इलाकों में जो स्थिति बनी है, वह बेहद चिंताजनक है।

बाबूपुर घाट पर लगी लंबी कतारें इस बात का प्रमाण हैं कि लोग किस तरह अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को चलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

जब तक पुल की मरम्मत नहीं होती या कोई मजबूत वैकल्पिक व्यवस्था नहीं बनती, तब तक यह परेशानी जारी रहने की संभावना है।

फिलहाल, गंगा के इस पार और उस पार जाने के लिए नाव ही सहारा है—लेकिन यह सहारा कितना सुरक्षित और टिकाऊ है, यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है।

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