कारीगरों के लिए तैयार किया सशक्त पारिस्थितिकी तंत्र; प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना में निभा रहा अग्रणी भूमिका
पटना, 28 मई 2025 —बिहार की पारंपरिक कला और हस्तशिल्प को संरक्षित एवं समृद्ध करने की दिशा में उपेन्द्र महारथी शिल्प अनुसंधान संस्थान (उमसास) आज राज्य का प्रमुख स्तंभ बन चुका है। यह संस्थान न केवल सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखे हुए है, बल्कि कारीगरों को प्रशिक्षण, नवाचार और बाज़ार से जुड़ाव के जरिये आर्थिक रूप से भी सशक्त बना रहा है।
शिल्प और कारीगरों के लिए समग्र पारिस्थितिकी तंत्र
उमसास का उद्देश्य केवल कला का संरक्षण नहीं, बल्कि कारीगरों के लिए एक सतत और सशक्त पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करना है। संस्थान की रणनीति में कौशल विकास, बाज़ार तक पहुंच और सांस्कृतिक पुनर्जीवन की पहल शामिल है, जिससे पारंपरिक शिल्प को आधुनिक समय के साथ जोड़ने में मदद मिल रही है।
18 शिल्पों में प्रतिवर्ष 400 प्रशिक्षार्थियों को प्रशिक्षण
संस्थान द्वारा संचालित छह महीने की कौशल विकास प्रशिक्षण योजना के तहत हर वर्ष दो सत्रों में लगभग 400 प्रशिक्षार्थियों को प्रशिक्षित किया जाता है। यह प्रशिक्षण 18 पारंपरिक शिल्पों जैसे मधुबनी चित्रकला, सिल्क बुनाई, टेराकोटा, लकड़ी शिल्प आदि में दिया जाता है, जिससे नई पीढ़ी में शिल्पकला के प्रति रुचि बढ़ रही है।
प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना में महत्वपूर्ण भागीदारी
उमसास ने प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के अंतर्गत कुम्हारी कला, मूर्तिकला, सिलाई-कढ़ाई जैसे क्षेत्रों में विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए हैं। योजना की प्रगति की बात करें तो अब तक बिहार से 1,24,000 से अधिक आवेदनों को स्टेज 2 से स्टेज 3 तक की सिफारिश मिल चुकी है। यह संस्थान की प्रभावी कार्यप्रणाली और तकनीकी सहयोग का स्पष्ट प्रमाण है।
संस्कृति और समृद्धि का संगम
उमसास एक ऐसा संस्थान बन चुका है जो अतीत और भविष्य के बीच सेतु का कार्य कर रहा है। यह बिहार की कला, संस्कृति और कारीगरों की जीवंत परंपरा को आधुनिक युग के साथ जोड़ रहा है।


