बिहार पंचायत चुनाव पर संशय! तैयारी की धीमी रफ्तार से समय पर चुनाव कराने की चुनौती

पटना: बिहार में प्रस्तावित पंचायत आम चुनाव 2026 समय पर होंगे या नहीं, इसको लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। चुनाव की तैयारियों की धीमी रफ्तार के कारण दिसंबर 2026 तक पूरी चुनाव प्रक्रिया संपन्न होने पर संशय गहराता दिख रहा है। अब तक न तो नई मतदाता सूची प्रकाशित हुई है, न ही मतदान केंद्रों के निर्धारण की प्रक्रिया पूरी हो सकी है। इसके अलावा तीसरे चरण के पदवार आरक्षण का कार्य भी शुरू नहीं हुआ है।

राज्य निर्वाचन आयोग में नेतृत्व परिवर्तन की संभावना

चुनाव तैयारियों के बीच राज्य निर्वाचन आयोग में नेतृत्व परिवर्तन की संभावना भी स्थिति को प्रभावित कर सकती है। वर्तमान राज्य निर्वाचन आयुक्त डॉ. दीपक प्रसाद का कार्यकाल 27 जुलाई 2026 को समाप्त हो रहा है।

यदि समय पर नए आयुक्त की नियुक्ति नहीं होती है तो चुनाव संबंधी लंबित कार्यों में और देरी हो सकती है। वहीं, नए आयुक्त की नियुक्ति होने की स्थिति में भी उन्हें आयोग की कार्यप्रणाली समझने और प्रक्रियाओं को गति देने में कुछ समय लगना स्वाभाविक माना जा रहा है।

अब तक केवल आबादी निर्धारण का काम पूरा

चुनाव से जुड़ा अब तक केवल एक महत्वपूर्ण कार्य पूरा हुआ है। वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर पंचायत पदों की आबादी का निर्धारण और प्रकाशन किया गया है।

इसके अलावा चुनाव की दृष्टि से आवश्यक अधिकांश प्रक्रियाएं अभी प्रारंभिक चरण तक भी नहीं पहुंची हैं, जिससे समय पर चुनाव कार्यक्रम घोषित करना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।

तीसरे चरण के आरक्षण का इंतजार

बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2006 के अनुसार पंचायत चुनाव से पहले प्रत्येक पद के लिए आरक्षण का निर्धारण राज्य निर्वाचन आयोग की निगरानी में जिला स्तर पर किया जाना अनिवार्य है।

पहली बार यह प्रक्रिया वर्ष 2006 में लागू हुई थी, जबकि दूसरी बार 2016 में आरक्षण का पुनर्निर्धारण किया गया था। अब तीसरे चक्र के तहत सभी पंचायत पदों के लिए फिर से आरक्षण तय किया जाना है।

जानकारी के अनुसार राज्यभर में करीब ढाई लाख पंचायत पदों के लिए आरक्षण निर्धारित किया जाना है, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई औपचारिक प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का भी रहेगा असर

विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार आरक्षण निर्धारण की प्रक्रिया और अधिक महत्वपूर्ण होगी क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार अति पिछड़ा वर्ग के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े मानकों का पालन करना आवश्यक है।

वर्ष 2022 में नगर निकाय चुनाव भी इसी तरह की कानूनी जटिलताओं के कारण निर्धारित समय से लगभग दो महीने बाद कराए गए थे। ऐसे में पंचायत चुनाव में भी कानूनी प्रक्रियाओं को समय पर पूरा करना बड़ी चुनौती माना जा रहा है।

नगर निकाय चुनाव भी बढ़ा सकते हैं दबाव

राज्य निर्वाचन आयोग के सामने केवल पंचायत चुनाव ही नहीं, बल्कि नए नगर निकायों में चुनाव कराने की जिम्मेदारी भी है। यदि दोनों चुनावों की तैयारियां समानांतर चलती हैं, तो आयोग और प्रशासन पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

देश की सबसे बड़ी पंचायती व्यवस्थाओं में शामिल बिहार

बिहार की पंचायती राज व्यवस्था देश की सबसे बड़ी स्थानीय स्वशासन व्यवस्थाओं में गिनी जाती है। राज्य में कुल—

  • 8,053 मुखिया
  • 8,053 सरपंच
  • 1,09,635 वार्ड सदस्य
  • 1,09,635 पंच
  • 11,085 पंचायत समिति सदस्य
  • 1,160 जिला परिषद सदस्य

इन सभी पदों के लिए चुनाव कराने से पहले मतदाता सूची का अद्यतन, मतदान केंद्रों का निर्धारण, आरक्षण प्रक्रिया और अन्य प्रशासनिक तैयारियां समय पर पूरी करना आवश्यक है।

समय-सीमा पर बढ़ता संशय

मौजूदा स्थिति को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लंबित प्रक्रियाओं में जल्द तेजी नहीं लाई गई, तो दिसंबर 2026 तक पंचायत चुनाव कराना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

अब सबकी नजर राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग के अगले कदम पर टिकी है, क्योंकि आने वाले कुछ सप्ताह चुनाव की समय-सीमा तय करने में निर्णायक साबित हो सकते हैं।

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