​मोतिहारी शराब कांड: मौत का आंकड़ा बढ़कर 5 हुआ, संपत साह ने भी तोड़ा दम, मातम और चीख-पुकार के बीच उजड़ते सुहाग

मोतिहारी/तुरकौलिया। बिहार में शराबबंदी के कड़े दावों के बीच मौत का तांडव थमने का नाम नहीं ले रहा है। पूर्वी चंपारण जिले के मोतिहारी में जहरीली शराब से होने वाली मौतों का सिलसिला शुक्रवार की दोपहर तक और भी भयावह हो गया है। अब तक इस त्रासदी में मरने वालों की संख्या बढ़कर 5 हो गई है। ताजा जानकारी के अनुसार, पांचवें व्यक्ति संपत साह ने भी इलाज के दौरान दम तोड़ दिया है। 3 अप्रैल 2026 की यह दोपहर मोतिहारी के उन गांवों के लिए किसी कयामत से कम नहीं है, जहां एक के बाद एक उठती अर्थियों ने पूरे इलाके की हवाओं में सिहरन पैदा कर दी है। यह घटना केवल आंकड़ों की बाजीगरी नहीं है, बल्कि उस खोखले तंत्र की पोल खोलती है जो शराब माफियाओं के सामने बार-बार घुटने टेकता नजर आता है।

संपत साह की मौत और गांवों में पसरा सन्नाटा

​मोतिहारी के तुरकौलिया प्रखंड अंतर्गत रघुनाथपुर और शंकर सरैया गांवों में कल से ही मौत का साया मंडरा रहा था। कल एक व्यक्ति की मौत हुई थी, जिसके बाद आज सुबह तीन और लोगों ने दम तोड़ा। अब पांचवें मृतक के रूप में संपत साह का नाम सामने आने के बाद हड़कंप मच गया है। संपत साह की स्थिति सुबह से ही नाजुक बनी हुई थी और उन्हें मोतिहारी के सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद उनके शरीर में फैले जहर ने उनके अंगों को काम करने से रोक दिया।

​जैसे ही संपत साह की मौत की खबर उनके गांव पहुंची, वहां कोहराम मच गया। मृतकों की सूची अब लंबी होती जा रही है—चंदू, प्रमोद, हीरालाल, परिछन मांझी और अब संपत साह। इन पांचों परिवारों की दुनिया उजड़ चुकी है। इनमें से अधिकांश लोग अपने घर के एकमात्र कमाऊ सदस्य थे। रघुनाथपुर की गलियों में अब केवल सिसकियां और प्रशासन के खिलाफ दबा हुआ आक्रोश सुनाई दे रहा है।

​मोतिहारी शराब कांड: मौत का आंकड़ा बढ़कर 5 हुआ, संपत साह ने भी तोड़ा दम, मातम और चीख-पुकार के बीच उजड़ते सुहाग

आंखों की रोशनी जाना और सदर अस्पताल की बेबसी

​मोतिहारी सदर अस्पताल इस समय किसी युद्ध क्षेत्र के अस्पताल जैसा नजर आ रहा है। आधा दर्जन से अधिक लोग अभी भी अलग-अलग वार्डों में भर्ती हैं, जिनमें से दो की स्थिति अत्यंत चिंताजनक बनी हुई है। इस शराब कांड का सबसे वीभत्स पहलू यह है कि अस्पताल में भर्ती कई मरीजों ने अपनी आंखों की रोशनी चले जाने की शिकायत की है। जहरीली शराब में मौजूद मिथाइल अल्कोहल ने सीधे उनके नसों पर हमला किया है, जिससे वे अब हमेशा के लिए अंधेरे की दुनिया में जा चुके हैं।

​पीड़ितों के परिजनों का कहना है कि शराब पीने के कुछ ही घंटों बाद ही उन्हें धुंधला दिखाई देने लगा था और असहनीय सिरदर्द शुरू हो गया था। अस्पताल प्रशासन के पास सीमित संसाधन हैं, जिसके कारण गंभीर रूप से बीमार लोगों को उच्च चिकित्सा केंद्रों में रेफर करने की प्रक्रिया भी चल रही है। डॉक्टरों का कहना है कि यह जहर इतना तीव्र है कि यह किडनी और लिवर को कुछ ही घंटों में निष्क्रिय कर रहा है।

पुलिसिया कार्रवाई: सप्लायरों का सिंडिकेट और गिरफ्तारियां

​इस भीषण कांड के बाद जिला पुलिस प्रशासन की नींद टूटी है। सदर डीएसपी दिलीप कुमार ने स्वयं कमान संभालते हुए छापेमारी का नेतृत्व किया है। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए इस मौत के व्यापार के मुख्य किरदारों—हीरालाल राय और जम्बू बैठा—को गिरफ्तार कर लिया है। इन दोनों पर आरोप है कि इन्होंने ही इलाके में ‘लोकल’ यानी कच्ची शराब की सप्लाई की थी।

​पुलिस ने अब तक लगभग एक दर्जन लोगों को हिरासत में लिया है और उनसे गुप्त ठिकानों पर पूछताछ की जा रही है। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इस कच्ची शराब को बनाने के लिए ‘स्पिरिट’ या रासायनिक तत्व कहां से लाए गए थे। डीएसपी दिलीप कुमार ने स्पष्ट किया है कि इस कांड में शामिल पूरी चेन को बेनकाब किया जाएगा। शुरुआती जांच में यह बात सामने आई है कि यह शराब स्थानीय स्तर पर ही निर्मित की गई थी और इसमें घातक रसायनों का मिश्रण किया गया था ताकि नशा ‘तेज’ हो सके।

चौकीदार पर गिरी गाज: जवाबदेही या केवल खानापूर्ति? (विशेष विश्लेषण)

​किसी भी शराब कांड के बाद बिहार में एक तय प्रक्रिया देखने को मिलती है—निचले स्तर के कर्मियों पर कार्रवाई। मोतिहारी मामले में भी स्थानीय चौकीदार को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या केवल एक चौकीदार को निलंबित कर देने से व्यवस्था सुधर जाएगी?

  1. खुफिया तंत्र की विफलता: जब गांव में सरेआम शराब की सप्लाई हो रही थी, तो इसकी भनक स्थानीय थाने को क्यों नहीं लगी? क्या हीरालाल राय और जम्बू बैठा जैसे लोग बिना किसी संरक्षण के इतना बड़ा नेटवर्क चला रहे थे?
  2. समानांतर अर्थव्यवस्था: शराबबंदी के बाद बिहार में कच्ची शराब का एक समानांतर बाजार खड़ा हो गया है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ की पड़ताल के अनुसार, ब्रांडेड शराब की कमी ने गरीब तबके को इस जानलेवा जहर की ओर धकेला है, जो सस्ता और सुलभ है।
  3. चौकीदार बनाम माफिया: एक निहत्था चौकीदार उन बाहुबली शराब माफियाओं का मुकाबला कैसे कर सकता है जिन्हें अक्सर राजनीतिक या प्रशासनिक वरदहस्त प्राप्त होता है? निलंबन केवल ऊपरी जख्म पर पट्टी बांधने जैसा है, जबकि कैंसर पूरे तंत्र में फैला हुआ है।

रघुनाथपुर और शंकर सरैया: गरीबी और जहर का कॉकटेल

​जिन गांवों में यह घटना हुई है, वहां की सामाजिक-आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय है। मृतकों में शामिल परिछन मांझी और संपत साह जैसे लोग दिहाड़ी मजदूरी कर अपने परिवार का पेट पालते थे। शाम की थकान मिटाने के चक्कर में उन्होंने जो ‘घूँट’ भरी, वह उनके जीवन की आखिरी घूँट साबित हुई।

​ग्रामीणों का कहना है कि शराबबंदी के बावजूद शराब की उपलब्धता में कोई कमी नहीं आई है, बस उसके दाम बढ़ गए हैं और उसकी गुणवत्ता ‘कातिल’ हो गई है। रघुनाथपुर की महिलाओं में इस बात को लेकर भारी गुस्सा है। उनका कहना है कि पुलिस केवल तभी आती है जब कोई मर जाता है, उससे पहले शराब के अड्डों की जानकारी देने पर भी कोई सुनवाई नहीं होती।

कानूनी शिकंजा और स्पीडी ट्रायल की तैयारी

​सदर डीएसपी ने बताया कि गिरफ्तार अभियुक्तों के पास से कुछ आपत्तिजनक सामग्री भी मिली है, जिसे जांच के लिए लैब भेजा गया है। पुलिस इस मामले में ‘स्पीडी ट्रायल’ (त्वरित सुनवाई) की तैयारी कर रही है ताकि दोषियों को जल्द से जल्द सजा दिलाई जा सके। इस कांड में उन लोगों को भी तलाशा जा रहा है जो इस शराब को बनाने के लिए कच्चे माल की आपूर्ति करते थे।

​प्रशासन अब घर-घर जाकर यह सर्वे कर रहा है कि क्या और भी कोई व्यक्ति है जिसने उस दिन शराब का सेवन किया था और उसे अस्पताल ले जाने की जरूरत है। कई लोग डर के मारे अपनी बीमारी की बात नहीं बता रहे हैं, जिससे मौत का आंकड़ा और बढ़ने की आशंका बनी हुई है। पुलिस ने अपील की है कि लोग डरें नहीं और इलाज के लिए सामने आएं।

संतुलित नजरिया: शराबबंदी की सफलता और विफलता का द्वंद्व

​इस घटना को लेकर बिहार की राजनीति भी गरमा गई है। एक तरफ सरकार शराबबंदी को अपनी सबसे बड़ी सामाजिक उपलब्धि बताती है, वहीं दूसरी तरफ ऐसी घटनाएं बार-बार सुशासन के दावों पर सवालिया निशान लगाती हैं। यह संतुलित रूप से समझने की जरूरत है कि कानून केवल कागजों पर कड़ा होने से प्रभावी नहीं होता। जब तक जमीन पर पुलिस और माफिया के बीच का अपवित्र गठबंधन नहीं टूटेगा, मोतिहारी जैसी त्रासदियां होती रहेंगी।

​शराबबंदी ने घरेलू हिंसा में कमी तो लाई है, लेकिन जहरीली शराब के रूप में एक नया दानव पैदा कर दिया है। सरकार को अब अपनी रणनीति बदलनी होगी—केवल जप्ती और गिरफ्तारी काफी नहीं है, बल्कि उस ‘रूट’ को बंद करना होगा जहां से जहरीले रसायन गांवों तक पहुंच रहे हैं।

निष्कर्ष: संपत साह की मौत और न्याय की पुकार

​संपत साह की मौत ने मोतिहारी के घावों को और गहरा कर दिया है। 5 मौतों ने यह साबित कर दिया है कि शराब माफिया अब प्रशासन से निडर हो चुके हैं। हीरालाल राय और जम्बू बैठा की गिरफ्तारी केवल शुरुआत है; असली न्याय तब होगा जब इन पांचों परिवारों को उचित सहायता मिलेगी और भविष्य में किसी और ‘संपत’ या ‘परिछन’ को इस तरह अपनी जान नहीं गंवानी पड़ेगी।

द वॉयस ऑफ बिहार की टीम मृतकों के परिजनों के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करती है। हम प्रशासन से मांग करते हैं कि इस कांड के पीछे के सफेदपोश चेहरों को भी बेनकाब किया जाए। मोतिहारी का यह मातम बिहार के लिए एक चेतावनी है कि अगर अब भी तंत्र नहीं सुधरा, तो ‘शराबबंदी’ केवल एक राजनीतिक नारा बनकर रह जाएगी और मासूमों की बलि चढ़ती रहेगी।

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