“जो कभी गंगा में कूदकर जान देना चाहते थे, वही बने भारत की आवाज़ – कैलाश खेर की प्रेरणादायक कहानी”

कैलाश खेर: संघर्ष, साधना और संगीत की कहानी

7 जुलाई 1973 को उत्तर प्रदेश के मेरठ में जन्मे कैलाश खेर आज भारतीय संगीत जगत का एक जाना-पहचाना नाम हैं। अपनी अनोखी आवाज़ और सूफियाना अंदाज़ के लिए पहचाने जाने वाले कैलाश खेर को वर्ष 2017 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया। लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने का उनका सफर आसान नहीं था। यह यात्रा त्याग, आत्म-संघर्ष और कई बार असफलताओं से लड़ने की मिसाल है।

गायकी की शुरुआत और शुरुआती झटके

कैलाश खेर के पिता लोक गायकी से जुड़े थे। घर में संगीत का माहौल था, जिसने किशोर कैलाश के मन में भी संगीत के प्रति रुझान जगाया। मात्र 14 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने सपनों के पीछे भागने का साहसिक फैसला लिया और घर छोड़ दिया।

वे एक अच्छे संगीत गुरु की तलाश में निकले, लेकिन उन्हें वह मार्गदर्शन नहीं मिला जिसकी उन्हें उम्मीद थी। इससे निराश होकर उन्होंने संगीत को कुछ समय के लिए पीछे छोड़ दिया और खुद का एक्सपोर्ट बिजनेस शुरू किया, जो जल्द ही असफल हो गया।

अवसाद और आत्महत्या की कोशिश

बिजनेस में असफलता के बाद कैलाश गहरे मानसिक तनाव में चले गए। वे ऋषिकेश पहुंचे जहां वे कुछ समय साधुओं के बीच भी रहे, लेकिन वहां भी वे खुद को मानसिक रूप से फिट नहीं पा सके। अवसाद के दौर में एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने गंगा नदी में कूदकर आत्महत्या का प्रयास किया। सौभाग्य से, वे बच गए और यहीं से उनकी ज़िंदगी ने एक नया मोड़ लिया।

संगीत की वापसी और पहचान

मुंबई आकर कैलाश खेर ने फिर से संगीत को अपनाया। उन्होंने विज्ञापनों और जिंगल्स में अपनी आवाज़ दी। धीरे-धीरे फिल्मी संगीत जगत में उन्हें पहचान मिलने लगी। “अल्ला के बंदे” (फिल्म: वकत, 2004) और “तेरी दीवानी”, “सैय्यां” जैसे गीतों ने उन्हें देशभर में प्रसिद्ध कर दिया।

उनका बैंड ‘कैलाशा’ भी खासा लोकप्रिय हुआ, जो भारतीय लोक, सूफी और रॉक संगीत का एक बेहतरीन मिश्रण पेश करता है।

सम्मान और योगदान

  • पद्म श्री (2017)
  • कई फिल्मफेयर और आइफा अवॉर्ड
  • सामाजिक अभियानों में सक्रिय भागीदारी
  • युवा कलाकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत

कैलाश खेर की कहानी केवल एक गायक के संघर्ष की नहीं है, बल्कि यह आत्म-खोज, मानसिक जटिलताओं से उबरने और सपनों के पीछे डटे रहने की मिसाल भी है। उनकी आवाज़ सिर्फ संगीत नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है — जो बताती है कि हार से भागने के बजाय, हार को सुनिए, समझिए और फिर उसे सुरों में ढाल दीजिए।


 

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