“वोट के लिए आते हैं, मजदूरों की लाशों पर चुप रहते हैं”: गुजरात हादसे पर प्रशांत किशोर का मोदी-शाह और नीतीश सरकार पर तीखा हमला

रोहतास: जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर (PK) ने आज रोहतास में गुजरात की केमिकल फैक्ट्री में जान गंवाने वाले बिहारी मजदूरों के परिजनों से मुलाकात की। इस दौरान PK का बेहद आक्रामक तेवर देखने को मिला। उन्होंने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और बिहार के मुख्यमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि चुनाव खत्म होते ही दिल्ली और पटना में बैठे हुक्मरानों के लिए मजदूरों की जान की कोई कीमत नहीं रह गई है।

खबर की मुख्य बातें (Highlights):

  • संवेदना: प्रशांत किशोर ने रोहतास में पीड़ित परिवारों से मिलकर उन्हें ढांढस बंधाया।
  • बड़ा आरोप: चुनाव के बाद अब तक विभिन्न हादसों में करीब 50 बिहारी मजदूरों की मौत हो चुकी है।
  • चुनावी तंज: “मोदी जी और अमित शाह सिर्फ वोट मांगने बिहार आते हैं, दुख बांटने नहीं।”
  • सरकार की चुप्पी: मुख्यमंत्री और गृह मंत्री ने अब तक एक भी आधिकारिक शोक संदेश या बयान जारी नहीं किया।

“50 मौतें, लेकिन हुक्मरान खामोश”

​मीडिया से बात करते हुए प्रशांत किशोर ने एक चौंकाने वाला दावा किया। उन्होंने कहा कि हालिया चुनाव संपन्न होने के बाद से अब तक दूसरे राज्यों में हुए अलग-अलग हादसों में बिहार के लगभग 50 मजदूरों की जान जा चुकी है।

​प्रशांत किशोर ने आंकड़ों के साथ सरकार को घेरते हुए कहा:

“यह बेहद शर्मनाक है कि चुनाव के समय जो नेता बिहार की गलियों में घूम-घूमकर वोट मांगते हैं, आज वही नेता मजदूरों की लाशों पर मौन साधे हुए हैं। गुजरात में हमारे भाई जलकर मर गए, लेकिन न तो प्रधानमंत्री ने कुछ कहा और न ही देश के गृह मंत्री ने। क्या बिहारी मजदूरों का खून इतना सस्ता है?”

 

दिल्ली से पटना तक घेराबंदी

​PK ने बिहार सरकार की ‘मजबूरी’ और दिल्ली की ‘बेरुखी’ पर तंज कसते हुए कहा कि बिहार के मुख्यमंत्री को सिर्फ अपनी कुर्सी बचाने की चिंता है। उन्होंने कहा कि जब बिहार के लोग दूसरे राज्यों में मारे जाते हैं, तो राज्य सरकार इसे ‘हादसा’ बताकर पल्ला झाड़ लेती है, जबकि असल में यह बिहार में रोजगार न होने के कारण हुई ‘सिस्टम की हत्या’ है।

मोदी-शाह पर सीधा प्रहार

​प्रशांत किशोर ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को निशाने पर लेते हुए कहा:

“मोदी जी और अमित शाह जी को बिहार की याद सिर्फ चुनाव के समय आती है। जब रैलियां करनी होती हैं, तो वो बड़े-बड़े वादे करते हैं। लेकिन जब उसी बिहार के मजदूर गुजरात जैसे राज्यों में फैक्ट्रियों की आग में झुलसकर मर जाते हैं, तो उनके पास संवेदना व्यक्त करने के लिए दो शब्द भी नहीं होते।”

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