जहानाबाद।यह कहानी सिर्फ एक गिफ्ट की नहीं, बल्कि उस सपने की है जो सालों तक दिल में दबा रहा—और बेटे की कामयाबी ने उसे पंख दे दिए। बिहार के जहानाबाद जिले के मोदनगंज प्रखंड के अरहीट गांव के 55 वर्षीय अवधेश प्रसाद बचपन से ही घुड़सवारी के शौकीन थे, लेकिन गरीबी के चलते कभी अपना घोड़ा नहीं खरीद सके।
नौकरी मिली, तो पिता का सपना याद आया
अवधेश के बेटे ने हाल ही में बिहार पुलिस में दारोगा के पद पर सफलता हासिल की। पहली सैलरी के साथ ही उसने तय किया कि वह अपने पिता का अधूरा सपना पूरा करेगा।
कुछ ही दिनों में वह राजस्थान से 16 महीने का घोड़ा खरीदकर लाया—कीमत 75,000 रुपये—और पिता को सरप्राइज गिफ्ट दे दिया।
‘बादल’ पर सवार होकर गांव में शान से घूमते हैं अवधेश
घोड़े का नाम रखा गया है ‘बादल’। आज अवधेश रोज सुबह-शाम ‘बादल’ पर सवार होकर गांव और आसपास के इलाकों में निकलते हैं।
मूंछों पर ताव, सीधी पीठ और चेहरे पर सुकून—55 साल की उम्र में भी उनका जोश किसी जवान से कम नहीं।
हर दिन 500 रुपये का खर्च, फिर भी शौक बरकरार
अवधेश बताते हैं कि ‘बादल’ की देखभाल, चारा, दवा और साफ-सफाई पर रोज करीब 500 रुपये खर्च होते हैं, लेकिन यह खर्च उन्हें बोझ नहीं, खुशी देता है।
वे अब स्थानीय घुड़सवारी प्रतियोगिताओं में भी भाग लेते हैं।
“किसी को कार पसंद है, मुझे घोड़ा”
अवधेश मुस्कराते हुए कहते हैं—
“आजकल लोग कार का शौक रखते हैं, लेकिन मुझे तो घोड़ा ही सबसे प्यारा है। बेटे ने मेरे बचपन का सपना सच कर दिया।”
यह कहानी बताती है कि जब सपनों में अपनों का साथ मिल जाए, तो उम्र और हालात मायने नहीं रखते।


