80 बरस के ‘शेर’ की शौर्यगाथा! पटना के प्रेमचंद रंगशाला में गूँजा “अधूरा सपना”; जब वीर कुँवर सिंह ने काट दी अपनी भुजा, रो पड़ा पूरा हॉल

खबर के मुख्य बिंदु:

  • ऐतिहासिक मंचन: पद्मश्री डॉ. जगदीश प्रसाद सिंह लिखित नाटक “अधूरा सपना” का सफल प्रदर्शन।
  • महानायक की गाथा: 1857 के क्रांतिवीर बाबू वीर कुँवर सिंह के बलिदान और अदम्य साहस की कहानी।
  • भावुक पल: घायल हाथ को काटकर माँ गंगा को अर्पित करने वाले दृश्य ने दर्शकों को किया स्तब्ध।
  • दिग्गजों की मौजूदगी: विधान परिषद सभापति अवधेश नारायण सिंह और विकास आयुक्त सहित कई आला अधिकारी रहे मौजूद।

पटना: राजधानी के सांस्कृतिक गलियारे राजेंद्र नगर स्थित प्रेमचंद रंगशाला में आज शाम इतिहास जीवंत हो उठा। मौका था नाटक “अधूरा सपना” के मंचन का, जहाँ 1857 के गदर के उस महानायक की कहानी दिखाई गई, जिसने 80 साल की उम्र में अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे। कला एवं संस्कृति विभाग और बिहार संगीत नाटक अकादमी के इस साझा प्रयास ने दर्शकों को उस दौर में पहुँचा दिया जब ‘आजादी’ सिर्फ एक सपना थी, जिसे पूरा करने के लिए बाबू वीर कुँवर सिंह ने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया।

वो दृश्य जिसने रोंगटे खड़े कर दिए

​वरिष्ठ रंगकर्मी अभय सिन्हा के निर्देशन में कलाकारों ने ऐसा समां बांधा कि हॉल तालियों की गूँज से भर गया। नाटक का सबसे प्रभावशाली और मार्मिक क्षण वह था, जब गंगा पार करते समय अंग्रेजों की गोली लगने के बाद बाबू वीर कुँवर सिंह ने बिना हिचकिचाए अपनी ही तलवार से अपनी घायल भुजा काट दी और उसे माँ गंगा की लहरों को समर्पित कर दिया। यह दृश्य देशभक्ति की पराकाष्ठा था, जिसे देख दर्शक अपनी कुर्सियों से खड़े हो गए।

“80 बरस की उमर में जागा जोश पुराना था…”

​मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित बिहार विधान परिषद के सभापति श्री अवधेश नारायण सिंह ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का आगाज किया। उन्होंने अपने संबोधन में प्रसिद्ध पंक्तियाँ पढ़ीं— “सब कहते हैं बाबू कुँवर सिंह बड़ा वीर मर्दाना था।” उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐसी कहानियाँ आज की युवा पीढ़ी के रगों में जोश भरने के लिए जरूरी हैं।

एकता और शौर्य का प्रतीक: विकास आयुक्त

​विशिष्ट अतिथि और विकास आयुक्त श्री मिहिर कुमार सिंह ने इस नाट्य प्रस्तुति की सराहना करते हुए कहा कि बाबू वीर कुँवर सिंह ने अंतिम सांस तक हार नहीं मानी। उन्होंने याद दिलाया कि 1857 की इस लड़ाई में हर जाति और धर्म के लोगों ने मिलकर हिस्सा लिया था, जो आज के भारत के लिए एकता का सबसे बड़ा सबक है।

समारोह की खास बातें

  • लेखन: पद्मश्री डॉ. जगदीश प्रसाद सिंह।
  • निर्देशन: अभय सिन्हा (वरिष्ठ रंगकर्मी)।
  • विशिष्ट उपस्थिति: सचिव प्रणव कुमार, निदेशक रूबी, निदेशक कृष्ण कुमार और सचिव महमूद आलम।
  • मंच संचालन: श्रीमती सोमा चक्रवर्ती ने अपनी आवाज से कार्यक्रम में चार चांद लगाए।

​अंत में मुख्य अतिथि द्वारा कलाकारों को सम्मानित किया गया। दर्शकों का कहना था कि ऐसे नाटक केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि इतिहास को याद रखने का जरिया हैं।

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