पटना, 20 जुलाई 2025:विधानसभा चुनाव की आहट के बीच बिहार भाजपा संगठनात्मक तैयारियों में जुट गई है, लेकिन इस कवायद में कई वरिष्ठ नेताओं की महत्वाकांक्षाओं पर विराम लगता दिख रहा है। पार्टी नेतृत्व द्वारा जिलों में नियुक्त किए गए प्रभारी पद से कई नेताओं में असंतोष देखा जा रहा है। खासकर वे नेता जो लंबे समय तक प्रदेश उपाध्यक्ष, प्रदेश मंत्री या मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष जैसे पदों पर रह चुके हैं, वे खुद को संगठनात्मक रूप से दरकिनार महसूस कर रहे हैं।
नीचे के कार्यकर्ताओं के अधीन कार्य करना पड़ा भारी
प्रभारी बनाए गए कई वरिष्ठ नेताओं की नाराज़गी की वजह यह है कि अब उन्हें उन्हीं कार्यकर्ताओं के अधीन कार्य करना पड़ रहा है जो पहले उनके अधीनस्थ रह चुके हैं। कुछ नेताओं ने तो सीधे तौर पर नेतृत्व को असहमति जताई है, वहीं कई ने परोक्ष माध्यमों से दायित्व ग्रहण न करने की सूचना भी दे दी है।
विधानसभा टिकट की उम्मीद अब भी कायम
इन नेताओं का कहना है कि उन्होंने पार्टी के लिए तीन से साढ़े तीन दशक तक सेवा की है और उन्हें उम्मीद है कि पार्टी नेतृत्व आगामी चुनावों में उनके नाम पर अवश्य विचार करेगा। तब तक वे संगठन के दायित्व का पूरी निष्ठा से निर्वहन करते रहेंगे।
कई जिला प्रभारी नेताओं ने यह भी कहा है कि वे पहले से अपने-अपने संभावित विधानसभा क्षेत्रों में सक्रिय हैं और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को भी इसकी जानकारी है। वे उचित समय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
पूर्व जिलाध्यक्षों को भी मिली ज़िम्मेदारी
भाजपा ने इस बार राज्य के 52 संगठनात्मक जिलों में कई पूर्व जिलाध्यक्षों को जिला प्रभारी की जिम्मेदारी दी है। हालांकि, इन नियुक्तियों में वरिष्ठता की उपेक्षा से कुछ पूर्व पदाधिकारी असंतुष्ट बताए जा रहे हैं।
आयोग, बोर्ड और निगम की नियुक्तियों से भी असहमति
पार्टी ने कई वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं को राज्य सरकार द्वारा गठित आयोगों, बोर्डों और निगमों में विभिन्न पद दिए हैं। लेकिन, इनमें से भी कई नेताओं ने दायित्व ग्रहण करने से इनकार कर दिया है। उनका तर्क है कि पद उनकी राजनीतिक और सांगठनिक हैसियत के अनुरूप नहीं हैं और यह सम्मानजनक नहीं माना जा सकता।


