
किशनगंज/पटना। बिहार पुलिस के इतिहास में भ्रष्टाचार का एक ऐसा अध्याय सामने आया है जिसने न केवल महकमे को शर्मसार किया है, बल्कि सरकारी तंत्र के भीतर छिपे सफेदपोश अपराधियों के वास्तविक चेहरे को भी बेनकाब कर दिया है। किशनगंज के अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी (SDPO) गौतम कुमार के ठिकानों पर आर्थिक अपराध इकाई (EOU) की छापेमारी ने एक ऐसे साम्राज्य का खुलासा किया है जिसकी कल्पना करना भी किसी आम इंसान के लिए मुश्किल है। 1994 बैच के एक दारोगा से सफर शुरू कर डीएसपी के पद तक पहुँचे गौतम कुमार ने खाकी की आड़ में अरबों की बेनामी संपत्ति का जो पहाड़ खड़ा किया, उसकी परतें अब एक-एक कर खुल रही हैं। यह मामला केवल आय से अधिक संपत्ति का नहीं है, बल्कि यह रिश्तों के जाल, बेनामी निवेश और सीमांचल के माफिया तंत्र के साथ पुलिस के गहरे गठजोड़ की एक डरावनी दास्तान है।
’पारो’ की कहानी: नौकरानी से करोड़पति बनने का सफर
इस पूरे भ्रष्टाचार कांड में सबसे चौंकाने वाला और चर्चा का विषय बना पात्र है ‘पारो’। सूत्रों और जांच में सामने आई जानकारियों के अनुसार, पारो कभी गौतम कुमार के घर में एक साधारण घरेलू नौकरानी के तौर पर काम करती थी। लेकिन वक्त बदला और साहब की मेहरबानी ऐसी बरसी कि आज पारो की जीवनशैली किसी रसूखदार राजनेता या उद्योगपति से कम नहीं है।
जांच दल तब हैरान रह गया जब उन्हें पता चला कि पारो के नाम पर न केवल महंगी जमीनें हैं, बल्कि वह थार और बुलेट जैसी लग्जरी गाड़ियों की सवारी करती है। एक साधारण पृष्ठभूमि वाली महिला के पास करोड़ों की संपत्ति और आलीशान गाड़ियाँ कहाँ से आईं, इसका जवाब साफ तौर पर गौतम कुमार के भ्रष्टाचार की तिजोरी से जुड़ा है। पारो के नाम पर संपत्तियों का निवेश करना दरअसल काली कमाई को सफेद करने और जांच एजेंसियों की नजरों से बचने का एक पुराना हथकंडा रहा है, लेकिन यहाँ ‘साहब’ और उनकी ‘खास’ का यह रिश्ता अब उनके गले की फांस बन चुका है।
सवा दो सौ किलोमीटर तक फैला बेनामी निवेश: नोएडा से सिलीगुड़ी तक
गौतम कुमार ने अपनी काली कमाई को केवल बिहार की सीमाओं तक सीमित नहीं रखा। उनकी संपत्ति का विस्तार देश के कई राज्यों और प्रमुख शहरों में है। आर्थिक अपराध इकाई की जांच में जो विवरण सामने आए हैं, वे किसी कॉर्पोरेट घराने के पोर्टफोलियो जैसे नजर आते हैं:
- चाय बागान का निवेश: पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में गौतम कुमार ने चाय बागानों में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। पहाड़ों की वादियों में फैला यह निवेश उनकी लंबी अवधि की आर्थिक योजना का हिस्सा था।
- दिल्ली-एनसीआर में फ्लैट: नोएडा और गुड़गांव जैसे हाई-प्रोफाइल इलाकों में गौतम कुमार ने कई फ्लैट खरीदे हैं। इन संपत्तियों की वर्तमान बाजार कीमत कई करोड़ों में आंकी जा रही है।
- पूर्णिया का आलीशान बंगला: पूर्णिया में करीब 3600 वर्गफीट में फैला चार मंजिला मकान उनकी ठाठ-बाट का गवाह है। लगभग 2.5 करोड़ रुपये की लागत से बने इस मकान में विलासिता की हर आधुनिक सुविधा मौजूद है।
- पटना का नर्सिंग होम: जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि गौतम कुमार राजधानी पटना में एक आधुनिक नर्सिंग होम खोलने की तैयारी में थे। इसके लिए जरूरी कागजात और निवेश के दस्तावेज ईओयू ने बरामद किए हैं।
रिश्तों का जाल: पत्नी, महिला मित्र और बेनामी नाम
भ्रष्टाचार की इस बिसात पर गौतम कुमार ने मोहरों की तरह अपने करीबियों का इस्तेमाल किया। जांच में करीब 25 जमीन के प्लॉट का पता चला है, जो उनके नाम पर न होकर उनकी पत्नी पूनम देवी और महिला मित्र शगुफ्ता शमीम के नाम पर हैं।
विशेष रूप से शगुफ्ता शमीम के ठिकानों से सात महत्वपूर्ण जमीनी दस्तावेज मिले हैं, जिनकी अनुमानित कीमत 60 लाख रुपये से अधिक है। ईओयू का मानना है कि इन महिलाओं के नाम पर संपत्तियां खरीदना केवल कानूनी सुरक्षा के लिए था। छापेमारी में न केवल जमीन के कागजात मिले हैं, बल्कि भारी मात्रा में सोने के गहने, निवेश के बॉन्ड और बीमा पॉलिसियों के दस्तावेज भी बरामद हुए हैं, जो उनकी कुल अघोषित संपत्ति को अरबों के पार ले जाते हैं।
सीमांचल का ‘पुराना रिश्ता’ और सियासी ख्वाब
गौतम कुमार का पुलिसिया करियर और उनकी काली कमाई का ग्राफ सीमांचल के जिलों से अभिन्न रूप से जुड़ा है। 1994 में दारोगा के रूप में बहाल होने के बाद उनकी पहली पोस्टिंग 1996 में किशनगंज में ही हुई थी। उन्होंने अपने सेवाकाल का एक बड़ा हिस्सा किशनगंज, अररिया, पूर्णिया और कटिहार जैसे जिलों में बिताया।
जानकारों का कहना है कि सीमांचल के भौगोलिक और सामाजिक ढांचे का उन्होंने भरपूर फायदा उठाया। यहाँ के माफिया तंत्र से उनके रिश्ते इतने गहरे हो गए थे कि वे कानून लागू करने वाले के बजाय सिंडिकेट के संरक्षक के रूप में देखे जाने लगे थे। यही कारण है कि वे 2023 में दोबारा एसडीपीओ बनकर किशनगंज पहुँचे। चर्चा तो यह भी है कि इस अरबों की संपत्ति के दम पर गौतम कुमार भविष्य में चुनावी मैदान में उतरने और सियासी पारी शुरू करने की योजना बना रहे थे, जिसके लिए उन्होंने पहले से ही एक मजबूत वित्तीय आधार तैयार कर लिया था।
आठ ‘खास’ माफिया और ईओयू का अगला प्रहार
गौतम कुमार की गिरफ्तारी और छापेमारी के बाद अब उन लोगों की नींद उड़ गई है जो कल तक साहब के साये में रहकर गैर-कानूनी धंधे संचालित करते थे। आर्थिक अपराध इकाई ने ऐसे आठ प्रमुख माफियाओं की सूची तैयार की है, जो गौतम कुमार के ‘फाइनांसर’ और ‘मैनेजर’ के रूप में काम कर रहे थे। इस सूची में निम्नलिखित क्षेत्रों के माफिया शामिल हैं:
- शराब माफिया: बिहार में शराबबंदी के बावजूद सीमावर्ती जिलों से शराब की तस्करी करवाने वाले बड़े सिंडिकेट।
- लॉटरी और जुआ माफिया: पश्चिम बंगाल की सीमा से सटे इलाकों में लॉटरी का अवैध धंधा चलाने वाले।
- पशु और सुपारी माफिया: नेपाल सीमा के जरिए पशुओं और सुपारी की तस्करी करने वाले गिरोह।
ये आठ लोग न केवल गौतम कुमार के संपर्क में थे, बल्कि उनकी काली कमाई को ठिकाने लगाने में भी मदद करते थे। ईओयू अब इन लोगों के बैंक खातों और संपत्तियों की जांच कर रही है, और माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में सीमांचल में गिरफ्तारियों का एक बड़ा दौर शुरू होगा।
कानून का शिकंजा: 1.94 करोड़ से शुरू हुई जांच और अरबों का खुलासा
शुरुआत में गौतम कुमार के खिलाफ 1 करोड़ 94 लाख रुपये की आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज किया गया था। लेकिन जब ईओयू ने न्यायालय से अनुमति लेकर उनके आधा दर्जन ठिकानों पर एक साथ धावा बोला, तो बरामदगी ने सरकारी अनुमानों को बौना साबित कर दिया। महंगी घड़ियाँ, क्रेटा और थार जैसी लग्जरी गाड़ियाँ, और बैग भर-भरकर मिले जमीनी दस्तावेज यह बताते हैं कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी थीं।
मंगलवार को गौतम कुमार पटना स्थित ईओयू कार्यालय में पेश हुए, जहाँ उनसे घंटों पूछताछ की गई। अधिकारियों ने उनके सामने बरामद दस्तावेजों का पुलिंदा रख दिया, जिसका जवाब देने में साहब के पसीने छूट गए। उनके द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण और वास्तविक संपत्तियों के बीच का अंतर इतना बड़ा है कि अब उनकी सेवा समाप्ति और जेल यात्रा लगभग तय मानी जा रही है।
निष्कर्ष: खाकी की सफाई का समय
गौतम कुमार का मामला बिहार पुलिस के लिए एक चेतावनी है। एक अधिकारी जो दारोगा से डीएसपी बनता है और रास्ते में न्याय की बलि चढ़ाकर अरबों का मालिक बन जाता है, वह व्यवस्था की खामियों को उजागर करता है। ‘पारो’ जैसी घरेलू नौकरानी का करोड़पति बन जाना यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार ने किस तरह मानवीय रिश्तों को भी ढाल बना लिया है।
आर्थिक अपराध इकाई की यह कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन चुनौती अब इस साम्राज्य को पूरी तरह ध्वस्त करने और उन तमाम माफियाओं को सलाखों के पीछे भेजने की है जिन्होंने एक पुलिस अधिकारी को ‘सुल्तान’ बना दिया था। किशनगंज से लेकर सिलीगुड़ी और नोएडा तक फैली इस लूट की दास्तान का अंत अब कानून की चौखट पर होना चाहिए, ताकि आम जनता का विश्वास वर्दी और व्यवस्था पर बना रहे। बिहार अब देख रहा है कि 100 करोड़ के इस डीएसपी का सियासी ख्वाब किस तरह सलाखों के पीछे दम तोड़ता है।


