
कटिहार। न्याय की तराजू अक्सर सबूतों के बोझ से झुकती है, लेकिन जब सबूत ही काल्पनिक हों और तफ्तीश किसी बंद कमरे में बैठकर लिखी गई पटकथा जैसी हो, तो नतीजे कटिहार जैसे होते हैं। बिहार के कटिहार जिले के आजमनगर थाना क्षेत्र से निकलकर आई यह कहानी किसी फिल्मी थ्रिलर से कम नहीं है, लेकिन इसके पीछे की कड़वी हकीकत प्रशासनिक संवेदनहीनता और पुलिसिया लापरवाही का एक ऐसा दस्तावेज है जिसे पढ़कर किसी भी सभ्य समाज का सिर शर्म से झुक जाए। जिस महिला की ‘हत्या’ के जुर्म में उसका चचेरा देवर पिछले 10 महीनों से सलाखों के पीछे अपनी बेगुनाही की भीख मांग रहा था, वह महिला अचानक सुधानी के एक आंगन में जिंदा मिली। यह मामला केवल एक गलत गिरफ्तारी का नहीं है, बल्कि यह उस न्याय प्रणाली पर करारा तमाचा है जिसने बिना ‘शव’ मिले एक जीवित इंसान को कातिल मानकर जेल की कालकोठरी में सड़ने के लिए छोड़ दिया।
लक्खी देवी की ‘वापसी’ ने पुलिस के उस दावे की धज्जियां उड़ा दी हैं जिसमें महानंदा नदी की लहरों को गवाह बनाकर यह कहानी बुनी गई थी कि उसकी हत्या कर लाश को पानी में बहा दिया गया है। 10 महीने बाद जब वह अपने दूसरे पति प्रेम राय के घर से बरामद हुई, तो पुलिस के पास अपने बचाव में कहने को कुछ नहीं था, सिवाय इसके कि ‘जांच की जा रही है’।
खौफनाक साजिश: जब भाई ही बन गया अपनी बहन की ‘मौत’ का लेखक
इस त्रासदी की शुरुआत साल 2025 के उन दिनों में हुई थी जब लक्खी देवी के पति दुलाल यादव की करंट लगने से मौत हो गई। पति की मौत के बाद चार बच्चों की जिम्मेदारी लक्खी के कंधों पर थी, लेकिन वह अचानक गायब हो गई। यहीं से शुरू हुआ वह खेल जिसे लक्खी के सगे भाई भीम यादव ने रचा था। भीम ने आजमनगर थाने में एक ऐसी प्राथमिकी दर्ज कराई जिसमें उसने न केवल अपनी बहन के गायब होने का दुख जताया, बल्कि उसके चचेरे देवर राजेश यादव को एक क्रूर हत्यारे के तौर पर पेश किया।
भीम यादव ने आरोप लगाया कि राजेश यादव उसकी बहन को शादी का झांसा देकर ले गया और बाद में उसकी हत्या कर दी। इस कहानी में मिर्च-मसाला लगाने के लिए ‘गर्भपात’ और ‘षड्यंत्र’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया। भीम ने राजेश के बूढ़े पिता, उसकी पत्नी और यहाँ तक कि दूर ब्याही गई बहन और बहनोई को भी इस फर्जी मर्डर केस में लपेट लिया। पुलिस ने बिना किसी फॉरेंसिक साक्ष्य के, बिना किसी चश्मदीद के, केवल एक भाई के आंसुओं और उसकी लिखित शिकायत को पत्थर की लकीर मान लिया। नतीजा यह हुआ कि राजेश यादव को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, जबकि उसका पूरा परिवार ‘फरारी’ की जिंदगी काटने को मजबूर हो गया।
महानंदा में ‘लाश’ की खोज और पुलिसिया ढोंग की पराकाष्ठा
जब पुलिस ने राजेश को जेल भेजा, तो सवाल उठा कि लाश कहां है? इस पर भीम यादव ने एक और मनगढ़ंत थ्योरी दी कि शव को महानंदा नदी में फेंक दिया गया है। फिर क्या था, कटिहार पुलिस ने अपनी कार्यकुशलता दिखाने के लिए सरकारी संसाधनों का जमकर प्रदर्शन किया। गोताखोरों की टीम बुलाई गई, जाल फेंके गए और 10 दिनों तक नदी के गहरे पानी में उस ‘रूह’ को तलाशा गया जो असल में 50 किलोमीटर दूर अपने नए घर में दाल-चावल पका रही थी।
पुलिस की यह कैसी तफ्तीश थी कि वे एक जिंदा महिला का लोकेशन ट्रेस नहीं कर पाए, लेकिन नदी के पानी में उसकी लाश ढूंढने का ड्रामा करते रहे? तत्कालीन अनुसंधानकर्ता (IO) दीपक कुमार की भूमिका यहाँ सबसे बड़े संदेह के घेरे में है। एक पुलिस अधिकारी के तौर पर उनकी जिम्मेदारी थी कि वे तकनीकी साक्ष्यों जैसे कॉल डिटेल्स रिकॉर्ड (CDR) और टावर लोकेशन की जांच करते। लेकिन उन्होंने शायद फाइलों को रंगने और ‘आरोपी’ को जेल भेजने की कागजी प्रक्रिया को ही अपना धर्म मान लिया। यह तफ्तीश की वह पराकाष्ठा थी जहाँ एक निर्दोष की चीखें पुलिस डायरी के बोझ के नीचे दब गई थीं।
दो उजड़े परिवार और नौ मासूमों का सिसकता बचपन
इस गलतफहमी और लापरवाही की सबसे बड़ी कीमत राजेश यादव और लक्खी देवी के बच्चों ने चुकाई है। राजेश के पांच बच्चे और लक्खी के चार बच्चे, यानी कुल नौ जिंदगियां इस पुलिसिया विफलता की भेंट चढ़ गईं। राजेश जब जेल गया, तो उसके घर की माली हालत खराब हो गई। बच्चों की पढ़ाई छूट गई और वे समाज में ‘हत्यारे के बच्चे’ का कलंक झेलने लगे। राजेश की पत्नी को दर-दर की ठोकरें खानी पड़ीं ताकि वह अपने पति की बेगुनाही साबित कर सके।
वहीं, लक्खी के चार बच्चे अपने ननिहाल में लावारिसों की तरह रहने को मजबूर हुए। उन्हें बताया गया कि उनके चाचा ने उनकी मां को मार दिया है। सोचिए, उन बच्चों के कोमल मन पर क्या बीती होगी जब उन्हें अपनों के खिलाफ नफरत का पाठ पढ़ाया गया होगा? राजेश यादव ने जेल की सलाखों के पीछे जो 10 महीने बिताए हैं, वे उसकी जिंदगी के वो पन्ने हैं जिन्हें अब कोई मुआवजा नहीं भर सकता। उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा धूल में मिल गई और उसका परिवार बिखर गया। क्या कटिहार पुलिस के पास इन नौ बच्चों के भविष्य और राजेश के बर्बाद हुए सम्मान का कोई हिसाब है?
सुधानी का वह ‘प्रेम’ और ग्यारहवें घंटे का खुलासा
झूठ का यह गुब्बारा तब फूटा जब राजेश यादव के परिवार के एक सदस्य को भनक लगी कि लक्खी देवी मरी नहीं है। सूचना मिली कि वह सुधानी थाना क्षेत्र के दोगज गांव में प्रेम राय के साथ रह रही है। सोमवार की रात जब पुलिस ने वहां दबिश दी, तो लक्खी देवी सकुशल पाई गई। उसने खुलासा किया कि वह पिछले नौ सालों से प्रेम राय के संपर्क में थी और अपनी मर्जी से उसके साथ भागकर शादी की थी।
लक्खी के इस बयान ने पुलिस के उस ‘मर्डर केस’ को एक मजाक बनाकर रख दिया जिसे सुलझाने का दावा आजमनगर पुलिस कर रही थी। सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब लक्खी ने पुलिस को बताया कि वह राजेश से नहीं, बल्कि अपने सगे भाई भीम यादव की प्रताड़ना से तंग आकर भागी थी। उसने कहा कि भीम उसे परेशान करता था और उसी के डर से वह बिना बताए चली गई। अब सवाल यह है कि भीम यादव ने अपनी बहन के लापता होने का इस्तेमाल राजेश यादव से अपनी निजी दुश्मनी निकालने के लिए क्यों किया? और पुलिस ने इस ‘पर्सनल रंजिश’ को ‘सरकारी अपराध’ बनाने में भीम का साथ क्यों दिया?
जांच अधिकारी की विफलता: वर्दी पर लगा वह गहरा दाग
इस पूरे प्रकरण में पुलिस अवर निरीक्षक दीपक कुमार की जांच प्रणाली पर उंगली उठना लाजमी है। कानून का एक बुनियादी सिद्धांत है— ‘No Corpus Delicti, No Murder’ यानी बिना शव के हत्या का मुकदमा नहीं। हालांकि कुछ दुर्लभ मामलों में बिना शव के भी सजा होती है, लेकिन वहां परिस्थितिजन्य साक्ष्य पहाड़ जैसे मजबूत होने चाहिए। यहाँ तो कुछ भी नहीं था।
दीपक कुमार ने राजेश यादव की बेगुनाही की दलीलों को क्यों नजरअंदाज किया? क्यों नहीं लक्खी देवी के मायके और ससुराल के बीच के विवादों की गहराई से जांच की गई? क्या पुलिस पर भीम यादव का कोई दबाव था या फिर यह केवल एक ‘आलसी पुलिसिंग’ का मामला है? एसपी शिखर चौधरी ने अब इस मामले में जांच की बात कही है, लेकिन जो नुकसान होना था, वह हो चुका है। पुलिस की इस चूक ने यह साबित कर दिया है कि अगर आपके पास कोई प्रभाव नहीं है, तो आप बिहार में किसी भी झूठे केस की बलि चढ़ सकते हैं।

न्याय की मांग और जवाबदेही की दरकार
लक्खी देवी अब कोर्ट में अपना बयान दर्ज कराएगी, राजेश यादव जेल से बाहर आएगा, लेकिन क्या कहानी यहीं खत्म हो जाती है? बिल्कुल नहीं। यह मामला एक बड़े सुधार की मांग करता है। भीम यादव के खिलाफ जालसाजी और पुलिस को गुमराह करने का कड़ा मुकदमा चलना चाहिए ताकि भविष्य में कोई दूसरा भाई अपनी बहन की ‘लाश’ का झूठा व्यापार न कर सके। साथ ही, उन पुलिस अधिकारियों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए जिन्होंने एक बेगुनाह के 10 महीने बर्बाद किए।
राजेश यादव को अपनी बेगुनाही का प्रमाणपत्र तो मिल जाएगा, लेकिन उसके सीने पर लगा वह घाव ताउम्र रहेगा। यह मामला याद दिलाता रहेगा कि जब रक्षक ही भक्षक की थ्योरी पर काम करने लगे, तो आम आदमी के लिए घर और जेल के बीच का फासला महज एक ‘झूठी एफआईआर’ जितना रह जाता है। अब देखना यह है कि कटिहार पुलिस अपनी इस जग-हंसाई के बाद राजेश यादव को उसका खोया हुआ सम्मान लौटाने के लिए क्या कदम उठाती है।


