वॉशिंगटन/तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच बने भीषण युद्ध जैसे हालात की जड़ें 11 साल पुराने परमाणु विवाद में छिपी हैं। साल 2015 में ईरान और विश्व शक्तियों के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ था, जिसे Joint Comprehensive Plan of Action (JCPOA) कहा जाता है। इस समझौते का उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना और बदले में उस पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों में राहत देना था।
समझौते के तहत ईरान ने यूरेनियम संवर्धन (एनरिचमेंट) की सीमा तय करने, उन्नत सेंट्रीफ्यूज के इस्तेमाल को सीमित करने और International Atomic Energy Agency (IAEA) को व्यापक निगरानी की अनुमति देने पर सहमति जताई थी। बदले में ईरान को वैश्विक बैंकिंग सिस्टम और तेल निर्यात बाजार में वापसी का अवसर मिला।
ट्रंप का फैसला और समझौते का बिखरना
साल 2018 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने इस समझौते को “अपर्याप्त” बताते हुए अमेरिका को इससे अलग कर लिया। इसके बाद ईरान पर फिर से कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए।
अमेरिका के हटने के बाद ईरान ने भी चरणबद्ध तरीके से समझौते की शर्तों का पालन कम करना शुरू कर दिया। उसने यूरेनियम संवर्धन का स्तर बढ़ाया और उन्नत सेंट्रीफ्यूज की संख्या में इजाफा किया।
इसी बीच Israel लगातार यह दावा करता रहा कि परमाणु क्षमता वाला ईरान उसके अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है, और उसे किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार हासिल करने से रोका जाना चाहिए।
ओमान वार्ता और ‘स्नैपबैक’ की चेतावनी
2026 की शुरुआत में यह विवाद फिर चरम पर पहुंच गया। फरवरी 2026 में अमेरिका और ईरान के बीच ओमान में नई वार्ता की कोशिश की पुष्टि हुई। वॉशिंगटन ने चेतावनी दी कि अगर तेहरान नए और सख्त समझौते पर सहमत नहीं होता, तो उसे गंभीर सैन्य परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
इधर फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन (E3) ने भी संकेत दिया कि यदि ईरान पीछे नहीं हटता, तो वे संयुक्त राष्ट्र के पुराने प्रतिबंधों को ‘स्नैपबैक’ प्रक्रिया के तहत दोबारा लागू कर सकते हैं।
परमाणु ठिकानों पर हमले और युद्ध जैसे हालात
बातचीत के रास्ते बंद होने और आरोप-प्रत्यारोप के बीच हालात सैन्य टकराव में बदल गए। United States और Israel ने ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर हमले शुरू किए, जिनका उद्देश्य उसकी परमाणु क्षमता को कमजोर करना बताया गया।
जवाब में ईरान ने इसे अपनी संप्रभुता पर हमला करार देते हुए क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया। इससे पूरा मध्य-पूर्व अस्थिरता की चपेट में आ गया है।
क्या परमाणु विवाद बनेगा वैश्विक संकट?
विशेषज्ञों का मानना है कि 2015 में जिस विवाद को कूटनीति के जरिये सुलझाने की कोशिश की गई थी, वह अब खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है। परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता और प्रतिबंधों की राजनीति ने हालात को और जटिल बना दिया है।
अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि क्या यह संकट कूटनीतिक समाधान की ओर लौटेगा या वैश्विक स्तर पर बड़े टकराव का रूप ले सकता है।


