
वॉशिंगटन/तेहरान: पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने अपने कार्यकाल में ही ईरान के प्रति बेहद सख्त रुख अपनाया था। हाल ही में अमेरिका और Israel की संयुक्त सैन्य कार्रवाई में ईरान के सुप्रीम लीडर Ali Khamenei सहित कई शीर्ष नेता मारे गए और मिसाइल व ड्रोन हमलों से ईरान की सैन्य एवं राजनीतिक ढांचा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ।
लेकिन ट्रंप का मुख्य लक्ष्य अब तक अधूरा है। शुरू में उन्होंने दावा किया था कि युद्ध केवल चार दिनों में खत्म हो जाएगा, लेकिन अब इसे चार हफ्तों तक खिंचते देखा जा रहा है। इसका मतलब साफ है कि ईरान ने उम्मीद से कहीं ज्यादा मजबूत प्रतिरोध दिखाया है।
ट्रंप का अधूरा सपना
ट्रंप का उद्देश्य सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन नहीं था। उनका असली लक्ष्य था:
- ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करना,
- उसे आर्थिक रूप से इतना कमजोर बना देना कि वह ‘प्रॉक्सि वार’ न लड़ सके।
खामेनेई जीवित रहते ही यह संभव नहीं था, क्योंकि वे अमेरिका की किसी भी शर्त पर झुकने को तैयार नहीं थे। खामेनेई की मौत के बाद भी ट्रंप तब तक संतुष्ट नहीं होंगे, जब तक ईरान एक नए और अमेरिका-अनुकूल समझौते पर सहमति नहीं जताता।
अमेरिका ने पहले कूटनीति, धमकियां और प्रदर्शन भड़काने जैसी रणनीतियों का सहारा लिया, लेकिन जब कुछ असर नहीं हुआ तो खामेनेई को निशाना बनाकर उनके साथ ही ईरान की न्यूक्लियर महत्वाकांक्षाओं को कुचलने का प्लान बनाया गया।
खामेनेई की मौत के बावजूद ईरान का प्रतिरोध
खामेनेई और अन्य बड़े नेताओं की मौत के बावजूद ईरान की सत्ता उनके समर्थकों के हाथ में बनी हुई है। बड़े पैमाने पर रिजीम-विरोधी प्रदर्शन नहीं हुए। कुछ लोग खामेनेई की मौत पर जश्न मना रहे हैं, लेकिन सड़कों पर व्यापक आंदोलन नहीं दिख रहा।
इसके उलट, ईरान ने मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर जवाबी हमले किए। इन हमलों में 3 अमेरिकी सैनिक मारे गए और कई एयरबेस को नुकसान पहुंचा। ईरान ने खामेनेई की मौत का बदला लेने की कसम खाई है और लगातार पलटवार कर रहा है।
ट्रंप को उम्मीद थी कि खामेनेई की मौत से ईरान में सत्ता बदल जाएगी और अमेरिका समर्थक सरकार आएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरान अब भी मजबूती से डटा हुआ है, और युद्ध लंबा खिंचता दिख रहा है। अमेरिका के लिए यह बुरी खबर है, क्योंकि उसका असली लक्ष्य अभी अधूरा है।


