
बिहार के चर्चित आईएएस अधिकारी जी. कृष्णैया हत्याकांड में एक बार फिर बड़ा कानूनी मोड़ आ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सांसद आनंद मोहन की समय से पहले रिहाई को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।
सुनवाई के दौरान अदालत की ओर से की गई सख्त टिप्पणियों ने इस पूरे मामले को फिर सुर्खियों में ला दिया है। सर्वोच्च अदालत ने सवाल उठाया कि ड्यूटी पर तैनात किसी सरकारी अधिकारी की हत्या को आखिर “दुर्लभतम मामलों” की श्रेणी में क्यों नहीं माना जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने मृतक आईएएस अधिकारी जी. कृष्णैया की पत्नी उमा कृष्णैया, बिहार सरकार, आनंद मोहन और राज्य सजा माफी बोर्ड की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों की दलीलें विस्तार से सुनीं।
सुनवाई के दौरान पीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि ड्यूटी निभा रहे किसी सरकारी कर्मचारी की हत्या को भी गंभीर अपराध नहीं माना जाएगा, तो इससे समाज में गलत संदेश जा सकता है। अदालत ने कहा कि ऐसी सोच अपराधियों का मनोबल बढ़ा सकती है और वे यह मान सकते हैं कि सरकारी अधिकारियों पर हमला करने के बावजूद कानून से राहत मिल सकती है।
हालांकि, अदालत ने अभी इस मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है।
बिहार सरकार के किस फैसले को दी गई चुनौती?
दरअसल, बिहार सरकार ने अप्रैल 2023 में जेल नियमावली में संशोधन किया था। पहले ऐसे दोषियों को समय से पहले रिहा नहीं किया जा सकता था, जिन्हें ड्यूटी पर तैनात सरकारी कर्मचारियों की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया हो।
सरकार ने इस प्रावधान को हटाने के बाद आनंद मोहन की रिहाई का आदेश जारी किया था। इसके बाद 27 अप्रैल 2023 को उन्हें सहरसा मंडल कारा से रिहा कर दिया गया।
इस फैसले के खिलाफ जी. कृष्णैया की पत्नी उमा कृष्णैया और उनकी बेटी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में आरोप लगाया गया कि नियमों में बदलाव कर एक दोषी को अनुचित लाभ पहुंचाया गया है।
फांसी की सजा से उम्रकैद तक पहुंचा मामला
जी. कृष्णैया हत्याकांड में लंबी सुनवाई के बाद वर्ष 2007 में मुजफ्फरपुर की ट्रायल कोर्ट ने आनंद मोहन को दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई थी।
इसके बाद आनंद मोहन ने पटना हाईकोर्ट में अपील दायर की। दिसंबर 2008 में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में आंशिक बदलाव करते हुए फांसी की सजा को कठोर उम्रकैद में बदल दिया।
बाद में वर्ष 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद आनंद मोहन जेल में सजा काटते रहे, लेकिन वर्ष 2023 में जेल नियमों में बदलाव के बाद उन्हें समय से पहले रिहा कर दिया गया।
1994 में हुई थी आईएएस अधिकारी जी. कृष्णैया की हत्या
यह मामला वर्ष 1994 का है। उस समय गोपालगंज के तत्कालीन जिलाधिकारी जी. कृष्णैया आधिकारिक काम से पटना से लौट रहे थे।
इसी दौरान मुजफ्फरपुर जिले के खबरा गांव के पास गैंगस्टर छोटन शुक्ला की शवयात्रा निकाली जा रही थी। आरोप है कि छोटन शुक्ला की हत्या से नाराज भीड़ ने जी. कृष्णैया की सरकारी गाड़ी रोक ली और उन्हें वाहन से बाहर निकालकर पीट-पीटकर हत्या कर दी।
जांच के दौरान आरोप लगा था कि उस समय बिहार पीपुल्स पार्टी के नेता और तत्कालीन विधायक आनंद मोहन ने भीड़ को उकसाया था। इसी मामले में उन्हें दोषी ठहराया गया था।
रिहाई को लेकर पहले भी उठे थे राजनीतिक सवाल
आनंद मोहन की रिहाई केवल कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक विवाद का भी विषय बनी थी। बिहार सरकार द्वारा जेल नियमों में संशोधन किए जाने के बाद विपक्षी दलों के साथ-साथ कई पूर्व अधिकारियों और सामाजिक संगठनों ने भी इस फैसले पर सवाल उठाए थे।
हालांकि, राज्य सरकार का कहना था कि संशोधित नियमों के तहत सभी पात्र कैदियों को समान आधार पर राहत दी गई है और किसी एक व्यक्ति को विशेष लाभ नहीं पहुंचाया गया।
अब सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी निगाहें
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब अदालत यह तय करेगी कि बिहार सरकार द्वारा जेल नियमों में किया गया संशोधन और उसके आधार पर आनंद मोहन की समय पूर्व रिहाई कानून के अनुरूप थी या नहीं।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का असर केवल आनंद मोहन के मामले तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में समय पूर्व रिहाई और सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।


