
भागलपुर, 28 जुलाई:गंगा की बाढ़ इस बार सिर्फ खेत-खलिहान या मकानों तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने सपनों, उम्मीदों और इंसानी गरिमा को भी अपने साथ बहा दिया है। भागलपुर जिले के सैकड़ों गांवों में बाढ़ ने लोगों को इस कदर बेघर किया है कि अब सड़कें ही उनका ठिकाना बन चुकी हैं।

सड़कों पर जीवन का अस्थायी संसार
ऊंचे स्थलों पर शरण लेने को मजबूर ग्रामीण अब सड़कों के किनारे टीन की छत और प्लास्टिक की चादरों के नीचे दिन गुजार रहे हैं। बरसात में भीगी लकड़ियों से रोटियां सेंकती महिलाएं, गोद में भूखे बच्चों को सुलाने की कोशिश करतीं माताएं, और चूल्हे के धुएं के बीच भविष्य को तकतीं आंखें – यही इस बाढ़ की असल तस्वीर है।
मवेशी, मासूम और मजबूरी
घर उजड़ने के बाद अब लोगों को अपने मवेशियों की फिक्र है – जिनके सहारे कभी गुजर-बसर होती थी, वे भी अब बेघर हैं। कहीं चारा नहीं, कहीं पानी नहीं। वहीं बच्चे, जो कभी स्कूल की ओर भागते थे, आज कीचड़ में गुमसुम बैठे हैं। ना किताबें हैं, ना खेल, और ना कोई बचपन की मुस्कान।
प्रशासन सिर्फ वादों तक सीमित
बाढ़ राहत की स्थिति अत्यंत दयनीय है। कहीं कोई राहत शिविर नहीं, पीने के पानी की कोई व्यवस्था नहीं, और सरकारी अमला सिर्फ दौरे और आश्वासन तक सिमटा नजर आता है। हर साल गंगा चढ़ती है, हर साल घर बहते हैं, लेकिन सिस्टम की संवेदना अब तक बहरी बनी हुई है।
एक महिला की आंखों से सवाल
सड़क किनारे चूल्हे पर रोटियां बनाती एक पीड़ित महिला की आंखों में सिर्फ एक सवाल है –
“अब आगे क्या?”
यह सवाल केवल उसका नहीं, बल्कि पूरे भागलपुर की उस बाढ़ग्रस्त आबादी का है जो सरकार से नहीं, इंसानियत से मदद की आस लगाए बैठी है।


