पिता की चिता को मुखाग्नि दी और फिर जा पहुँचीं UPSC इंटरव्यू! किशनगंज की ‘बेटी’ जूही दास ने गम के आंसुओं को बनाया ‘सफलता’ का हथियार; 649वीं रैंक लाकर सबको चौंकाया

खबर के मुख्य बिंदु:

  • हौसले की जीत: पिता के निधन के ठीक 10 दिन बाद साक्षात्कार (Interview) देकर जूही दास ने हासिल की 649वीं रैंक
  • अटूट संकल्प: श्राद्ध कर्म की प्रक्रियाओं के बीच दिल्ली पहुँचीं और देश की सबसे कठिन परीक्षा में हुईं सफल।
  • संघर्ष: चौथे प्रयास में मिली कामयाबी; इससे पहले दो बार इंटरव्यू तक पहुँचकर रह गई थीं पीछे।
  • किशनगंज का मान: खगड़ा प्रेमपुल निवासी स्वर्गीय निवारन दास की बेटी ने पेश की ‘साहस’ की बेमिसाल मिसाल।

किशनगंज: कहते हैं कि सफलता की राह फूलों की सेज नहीं होती, लेकिन किशनगंज की जूही दास के लिए यह राह अंगारों पर चलने जैसी थी। जब पूरा देश और बिहार यूपीएससी के नतीजों का जश्न मना रहा है, तब जूही की कहानी सुनकर हर किसी की आँखें नम हैं और सीना गर्व से चौड़ा है। जूही ने उस वक्त खुद को संभाला जब दुनिया का सबसे बड़ा सहारा—उनके पिता—उनका साथ छोड़ गए थे।

10 दिन का ‘अग्निपथ’: मौत और मंजिल के बीच की जंग

​जूही दास के लिए नियति ने सबसे कठिन परीक्षा उनके साक्षात्कार के ऐन वक्त पर तय की थी:

  • तारीख 13 फरवरी: जूही के पिता निवारन दास का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। जूही ने एक बेटी के फर्ज को निभाया और पिता की चिता को मुखाग्नि दी।
  • तारीख 24 फरवरी: ठीक 11 दिन बाद यूपीएससी मुख्यालय (धौलपुर हाउस) में उनका साक्षात्कार था।
  • चुनौती: जहाँ लोग अपनों को खोने के बाद हफ्तों तक शोक में डूबे रहते हैं, जूही ने पिता के ‘अधूरे सपने’ को अपनी ताकत बनाया। श्राद्ध कर्म की सभी धार्मिक प्रक्रियाओं को पूरा करते हुए उन्होंने इंटरव्यू की तैयारी जारी रखी और दिल्ली जा पहुँचीं।

चौथे प्रयास में चूम ली मंजिल

​जूही की यह सफलता रातों-रात नहीं मिली है। यह उनके धैर्य का इम्तिहान था।

  1. पिछला सफर: जूही अपने दूसरे और तीसरे प्रयास में भी इंटरव्यू (साक्षात्कार) तक पहुँची थीं, लेकिन अंतिम सूची में जगह बनाने से चूक गईं।
  2. हार न मानने की जिद: तीन बार असफल होने के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। इस बार ईश्वर ने उनके धैर्य की ‘अग्नि परीक्षा’ ली, लेकिन जूही का संकल्प हिमालय से भी ऊँचा निकला।
  3. पारिवारिक पृष्ठभूमि: जूही किशनगंज के खगड़ा प्रेमपुल निवासी स्वर्गीय निवारन दास और अनिका दास की बेटी हैं। आज उनकी सफलता पर पूरे जिले को नाज है।

VOB का नजरिया: जूही नहीं, ये ‘जीजीविषा’ की जीत है!

​जूही दास की कहानी उन तमाम अभ्यर्थियों के लिए एक संदेश है जो छोटी समस्याओं के आगे घुटने टेक देते हैं। पिता की मृत्यु के बाद साक्षात्कार बोर्ड के सामने बैठकर आत्मविश्वास के साथ जवाब देना किसी ‘महानायक’ के कृत्य से कम नहीं है। जूही ने साबित कर दिया कि अगर इरादे फौलादी हों, तो मौत का मातम भी सफलता के शोर को नहीं रोक सकता। जूही अब न केवल एक प्रशासनिक अधिकारी हैं, बल्कि संघर्ष की एक जीवित गाथा भी हैं।

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