मौत की पटरियों पर ‘शॉर्टकट’ की तलाश: भागलपुर जंक्शन पर सुरक्षा दावों की उड़ती धज्जियां

भागलपुर। भारतीय रेल को देश की जीवन रेखा कहा जाता है, लेकिन भागलपुर जंक्शन पर जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे इस जीवन रेखा को ‘मृत्यु रेखा’ में बदलने के लिए पर्याप्त हैं। रेशम नगरी का यह प्रमुख रेलवे स्टेशन इन दिनों एक ऐसे खतरनाक खेल का गवाह बन रहा है, जहाँ यात्री चंद सेकंड बचाने की जद्दोजहद में अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं। पटरियों पर खड़ी ट्रेनों के पहियों के बीच से रेंगकर निकलना यहाँ की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। यह दृश्य न केवल यात्रियों की घोर संवेदनहीनता को दर्शाता है, बल्कि रेलवे प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों की उस गहरी नींद की भी तस्दीक करता है, जो किसी बड़े हादसे के बाद ही टूटती है।

​मौत के पहियों के नीचे रेंगती संवेदनाएं

​भागलपुर जंक्शन के प्लेटफॉर्मों पर सुबह की धुंध छंटते ही अफरा-तफरी का जो मंजर शुरू होता है, वह किसी डरावनी फिल्म के दृश्य जैसा है। जब कोई मालगाड़ी या यात्री ट्रेन प्लेटफॉर्म पर लंबी अवधि के लिए खड़ी होती है, तो फुटओवर ब्रिज (FOB) की सीढ़ियां चढ़ने के बजाय लोग ट्रेन के नीचे से गुजरना ज्यादा आसान समझते हैं। वृद्ध, युवा और यहाँ तक कि छोटे बच्चों को लेकर महिलाएं भी पटरियों पर झुककर, ट्रेन के एक्सल और कपलिंग के बीच से रास्ता तलाशती नजर आती हैं।

​यह केवल एक नियम का उल्लंघन नहीं है, बल्कि यह उस नागरिक बोध (Civic Sense) की सामूहिक विफलता है, जो एक सभ्य समाज की पहचान होती है। पटरियों पर रेंगते इन लोगों को इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं होता कि अगर ट्रेन ने एक इंच भी हरकत की, या इंजन ने अचानक वैक्यूम प्रेशर रिलीज किया, तो उनके पास संभलने का मौका तक नहीं होगा। लोहे के इन भारी-भरकम पहियों के नीचे जिंदगी के चिथड़े उड़ने में पल भर का भी समय नहीं लगता।

​आरपीएफ और जीआरपी: वर्दी की खामोशी पर उठते सवाल

​किसी भी रेलवे स्टेशन की आंतरिक सुरक्षा और यात्रियों के आचरण को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी रेलवे सुरक्षा बल (RPF) और राजकीय रेलवे पुलिस (GRP) की होती है। लेकिन भागलपुर जंक्शन की जमीनी हकीकत यह है कि जहाँ यह जानलेवा खेल चलता है, वहां खाकी वर्दी का खौफ नदारद है। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि कई बार सुरक्षाकर्मी प्लेटफॉर्म पर मौजूद होते हैं, लेकिन वे इन यात्रियों को टोकने या उन पर जुर्माना लगाने की जहमत नहीं उठाते।

​प्रशासन की यह उदासीनता अपराधियों और नियम तोड़ने वालों के लिए एक मौन निमंत्रण की तरह है। जब सुरक्षा एजेंसियां अपनी आंखों के सामने लोगों को मौत के मुंह में जाते देखकर भी खामोश रहती हैं, तो उनकी कार्यकुशलता पर सवाल उठना लाजिमी है। क्या प्रशासन किसी बड़ी विभीषिका का इंतजार कर रहा है? क्या कानून की धाराओं का उपयोग केवल कागजों पर खानापूर्ति के लिए है? पटरियों पर गश्त करने और यात्रियों को अनुशासित करने के बजाय सुरक्षाकर्मियों की निष्क्रियता भागलपुर जंक्शन को असुरक्षित बना रही है।

​इंफ्रास्ट्रक्चर की उपलब्धता बनाम मानवीय हठ

​अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि स्टेशनों पर सुविधाओं की कमी के कारण यात्री पटरियां पार करते हैं। लेकिन भागलपुर जंक्शन पर यह तर्क पूरी तरह खोखला साबित होता है। स्टेशन पर आधुनिक फुटओवर ब्रिज और सबवे की व्यवस्था है, जो यात्रियों को सुरक्षित तरीके से एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँचाने के लिए पर्याप्त हैं। समस्या इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी नहीं, बल्कि मानवीय स्वभाव में बसी वह घातक ‘जल्दबाजी’ है जो सुरक्षा पर भारी पड़ रही है।

​यात्रियों के भीतर यह धारणा घर कर गई है कि “मेरे साथ कुछ नहीं होगा”। यह अति-आत्मविश्वास ही पटरियों पर बिछी मौत की बिसात का सबसे बड़ा कारण है। स्टेशन परिसर में लगे लाउडस्पीकरों से चौबीसों घंटे सुरक्षा संबंधी निर्देश प्रसारित होते रहते हैं, लेकिन वे निर्देश इन यात्रियों के कानों तक पहुँचने से पहले ही शोर में तब्दील हो जाते हैं। लोग सूचनाओं को सुनते जरूर हैं, लेकिन उन्हें आत्मसात करने की इच्छाशक्ति का सर्वथा अभाव दिखता है।

​तकनीकी जोखिम: एक घातक भूल

​ट्रेन के नीचे से गुजरने वाले यात्री अक्सर यह मान लेते हैं कि ट्रेन स्थिर है और ड्राइवर अचानक उसे स्टार्ट नहीं करेगा। लेकिन रेलवे की तकनीकी कार्यप्रणाली इससे कहीं अधिक जटिल है। कई बार सिग्नल मिलने के बाद ट्रेन जब चलना शुरू करती है, तो डिब्बों के बीच के खिंचाव (Jerks) के कारण ट्रेन के पहिये अचानक तेजी से घूम सकते हैं। मालगाड़ियों के मामले में यह जोखिम और भी बढ़ जाता है क्योंकि उनमें कपलिंग का अंतर अधिक होता है।

​इसके अलावा, यदि कोई ट्रेन ‘शंटिंग’ मोड में है, तो बिना किसी हॉर्न या चेतावनी के वह पीछे की ओर भी सरक सकती है। ऐसे में जो व्यक्ति पहियों के बीच फंसा होगा, उसके लिए बचने का कोई रास्ता नहीं बचता। भागलपुर जंक्शन पर लोग जिस तरह से भारी भरकम बोझ और बच्चों के साथ ट्रेनों के नीचे से निकलते हैं, वह यह बताने के लिए काफी है कि उन्हें विज्ञान और सुरक्षा के इन बुनियादी सिद्धांतों की कोई जानकारी नहीं है, या वे जानबूझकर इन्हें नजरअंदाज कर रहे हैं।

​लोको पायलटों और स्टेशन स्टाफ का मानसिक दबाव

​इस लापरवाही का एक और पहलू है—रेलवे कर्मचारियों का मानसिक स्वास्थ्य। एक लोको पायलट जब इंजन से ट्रेन को आगे बढ़ाता है, तो उसका पूरा ध्यान सिग्नल और ट्रैक पर होता है। उसे यह पता भी नहीं चलता कि पीछे के डिब्बों के नीचे कोई इंसान मौत से खेल रहा है। यदि कोई दुर्घटना होती है, तो कानूनी जांच और नैतिक अपराधबोध का बोझ लोको पायलट और स्टेशन मास्टर को ही झेलना पड़ता है। यात्रियों की एक छोटी सी गलती पूरे रेलवे तंत्र के परिचालन को घंटों के लिए बाधित कर सकती है और निर्दोष कर्मचारियों के करियर पर दाग लगा सकती है।

​समाधान: केवल अपील नहीं, सख्ती की जरूरत

​अब समय आ गया है कि रेलवे प्रशासन ‘अपील’ करने के दायरे से बाहर निकले और ‘एक्शन’ मोड में आए। भागलपुर जंक्शन पर इस जानलेवा लापरवाही को रोकने के लिए कुछ कड़े कदम उठाने अनिवार्य हैं:

  • भारी जुर्माना और कानूनी कार्रवाई: रेलवे अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत पटरियां पार करने वालों पर न केवल भारी आर्थिक दंड लगाया जाना चाहिए, बल्कि उन्हें हिरासत में लेकर जेल भेजने की प्रक्रिया भी शुरू होनी चाहिए।
  • घेराबंदी (Fencing): प्लेटफॉर्म के किनारों और पटरियों के बीच जहाँ संभव हो, ऐसी फेंसिंग की जानी चाहिए जिसे पार करना मुश्किल हो।
  • सीसीटीवी निगरानी और त्वरित कार्रवाई: जंक्शन पर लगे कैमरों के जरिए ऐसे लोगों की पहचान की जानी चाहिए और तुरंत आरपीएफ की टीम को वहां भेजकर उन्हें पकड़ना चाहिए।
  • सुरक्षा कर्मियों की जवाबदेही: यदि किसी सुरक्षाकर्मी की मौजूदगी में कोई यात्री ट्रेन के नीचे से गुजरता है, तो संबंधित कर्मचारी के खिलाफ भी विभागीय कार्रवाई होनी चाहिए।
  • डिजिटल अवेयरनेस: प्लेटफॉर्म पर लगी डिजिटल स्क्रीन पर दुर्घटनाओं के वास्तविक वीडियो (चेतावनी के साथ) दिखाए जाने चाहिए ताकि लोगों के मन में इस खतरे के प्रति वास्तविक डर पैदा हो सके।

​निष्कर्ष: जीवन अनमोल है, समय नहीं

​भागलपुर जंक्शन की यह तस्वीर एक चेतावनी है। यह हमें याद दिलाती है कि हम तकनीक में तो आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन बुनियादी नागरिक मूल्यों और अपनी जान की कीमत समझने में आज भी बहुत पीछे हैं। पटरियों पर बिछी ये लोहे की जंजीरें और पहिये किसी के सगे नहीं होते।

​प्रशासन को अपनी उदासीनता त्यागनी होगी और यात्रियों को अपनी लापरवाही। अगर आज सख्ती नहीं दिखाई गई, तो कल किसी मासूम की चीख भागलपुर की इस व्यस्त सुबह को मातम में बदल सकती है। याद रखिए, आपके घर पर कोई आपका इंतजार कर रहा है; दो मिनट का शॉर्टकट आपके परिवार के लिए पूरी जिंदगी का लंबा इंतजार बन सकता है। भागलपुर जंक्शन को सुरक्षित बनाना केवल प्रशासन का नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति का दायित्व है जो वहां से सफर करता है। पटरियों के ऊपर से गुजरने वाला पुल आपकी सुरक्षा के लिए है, उसके नीचे का रास्ता केवल श्मशान की ओर जाता है।

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