
उत्तर प्रदेश के संभल जिले में सरकारी भूमि के कथित फर्जी आवंटन से जुड़े बड़े घोटाले में प्रशासन और पुलिस ने सख्त कार्रवाई करते हुए कई अधिकारियों, कर्मचारियों और अन्य लोगों के खिलाफ शिकंजा कस दिया है। गुन्नौर तहसील क्षेत्र में गंगा किनारे स्थित करीब 1000 बीघा सरकारी जमीन के आवंटन में अनियमितताओं की जांच के बाद अब तक छह प्रमुख आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि कुल 19 लोगों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। इस कार्रवाई के बाद राजस्व विभाग और प्रशासनिक व्यवस्था में हड़कंप मच गया है।
प्रशासन के अनुसार मामला सरकारी झाऊ श्रेणी की उस जमीन से जुड़ा है, जो राजस्व रिकॉर्ड में सरकारी संपत्ति के रूप में दर्ज थी। आरोप है कि वर्षों पहले इस भूमि के आवंटन की प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी कर अपात्र लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए और सरकारी अभिलेखों में गलत प्रविष्टियां दर्ज कर दी गईं। जांच में कई स्तरों पर अनियमितताएं सामने आने के बाद प्रशासन ने इस पूरे प्रकरण को गंभीर वित्तीय और राजस्व घोटाले के रूप में लिया।
जांच रिपोर्ट के मुताबिक यह मामला केवल एक-दो अधिकारियों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें कई स्तरों पर राजस्व विभाग के अधिकारी, कर्मचारी और स्थानीय स्तर के अन्य लोग भी शामिल पाए गए। आरोप है कि सरकारी नियमों का पालन किए बिना भूमि आवंटन की प्रक्रिया पूरी की गई और पात्रता संबंधी शर्तों की भी अनदेखी की गई। यही वजह है कि जांच समिति ने दोषियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की सिफारिश की।
बताया जा रहा है कि यह पूरा मामला गुन्नौर तहसील के असदपुर, सुखैला और आसपास के क्षेत्रों में स्थित सरकारी भूमि से जुड़ा है। वर्षों पहले से सरकारी रिकॉर्ड में कथित तौर पर बदलाव कर जमीन को अलग-अलग लोगों के नाम दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। बाद में जब इस मामले की जांच हुई तो कई प्रविष्टियां संदिग्ध पाई गईं। प्रशासन का दावा है कि सरकारी रिकॉर्ड में की गई कई एंट्रियां नियमों के अनुरूप नहीं थीं।
सूत्रों के अनुसार इस मामले में पहले भी कार्रवाई हो चुकी थी। पूर्व में कई आवंटनों को निरस्त किया गया था और कुछ मामलों में मुकदमे भी दर्ज हुए थे। इसके बावजूद बाद के वर्षों में फिर से कथित रूप से उन्हीं जमीनों का आवंटन कर दिया गया। जांच में यह भी सामने आया कि कई मामलों में आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं की गई और ग्राम सभा से संबंधित औपचारिकताओं का पालन भी नहीं हुआ।
प्रशासनिक जांच के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि जिन लोगों के नाम पर जमीन दर्ज की गई थी, उनमें से कई को वास्तविक रूप से भूमि का कब्जा तक नहीं दिया गया था। यानी पूरा मामला कागजी रिकॉर्ड और दस्तावेजों तक सीमित था। इससे यह आशंका और मजबूत हुई कि सरकारी रिकॉर्ड में बदलाव कर फर्जी तरीके से लाभ पहुंचाने का प्रयास किया गया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन ने विशेष जांच कराई। जांच समिति ने कई महीनों तक राजस्व रिकॉर्ड, आवंटन संबंधी दस्तावेज, सरकारी फाइलें और संबंधित अधिकारियों के रिकॉर्ड का परीक्षण किया। विस्तृत जांच रिपोर्ट तैयार होने के बाद इसे जिलाधिकारी को सौंपा गया, जिसमें कई अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध बताई गई।
जांच रिपोर्ट के आधार पर संबंधित लेखपाल की शिकायत पर पुलिस ने धोखाधड़ी, सरकारी दस्तावेजों में हेराफेरी, आपराधिक षड्यंत्र और अन्य गंभीर धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की। इसके बाद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए छह प्रमुख आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया।
गिरफ्तार किए गए आरोपियों में एक सेवानिवृत्त उप जिलाधिकारी, पूर्व जिला शासकीय अधिवक्ता (राजस्व), पूर्व ग्राम प्रधान, सेवानिवृत्त राजस्व निरीक्षक, सेवानिवृत्त सहायक चकबंदी अधिकारी तथा तत्कालीन चकबंदी लेखपाल शामिल हैं। सभी आरोपियों को मेडिकल परीक्षण के बाद न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह जांच अभी प्रारंभिक चरण में है और आने वाले दिनों में अन्य आरोपियों की भूमिका की भी गहन जांच की जाएगी। यदि जांच के दौरान अतिरिक्त साक्ष्य सामने आते हैं तो और गिरफ्तारियां भी हो सकती हैं। पुलिस राजस्व विभाग से जुड़े दस्तावेजों की भी विस्तृत जांच कर रही है।
इस मामले में वर्तमान में कार्यरत एक उप जिलाधिकारी सहित कई राजस्व अधिकारियों, लेखपालों, कानूनगो, चकबंदी विभाग के कर्मचारियों तथा पंचायत प्रतिनिधियों के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया गया है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि कथित फर्जी आवंटन की प्रक्रिया में किस स्तर पर किस अधिकारी या कर्मचारी की क्या भूमिका रही।
प्रशासन का कहना है कि सरकारी संपत्ति से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार की अनियमितता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यदि जांच में कोई भी अधिकारी या कर्मचारी दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई के साथ-साथ कानूनी कार्रवाई भी जारी रहेगी। अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकारी भूमि को सुरक्षित रखना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है और ऐसे मामलों में सख्त कदम उठाए जाएंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी जमीन से जुड़े विवादों में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए रिकॉर्ड का नियमित सत्यापन और डिजिटल निगरानी आवश्यक है। यदि समय-समय पर राजस्व अभिलेखों की जांच होती रहे तो इस प्रकार की अनियमितताओं को शुरुआती स्तर पर ही रोका जा सकता है। साथ ही भूमि आवंटन की प्रत्येक प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाना भी जरूरी है।
फिलहाल पुलिस और प्रशासन दोनों इस मामले की संयुक्त रूप से जांच कर रहे हैं। दस्तावेजों का परीक्षण, संबंधित अधिकारियों से पूछताछ और राजस्व रिकॉर्ड का मिलान लगातार जारी है। अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद यदि किसी अन्य व्यक्ति की संलिप्तता सामने आती है तो उसके खिलाफ भी नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
संभल का यह कथित सरकारी जमीन आवंटन घोटाला प्रदेश के बड़े राजस्व मामलों में शामिल माना जा रहा है। प्रशासन का कहना है कि सरकारी संपत्ति की सुरक्षा और दोषियों को कानून के दायरे में लाने के लिए अभियान आगे भी जारी रहेगा। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट के आधार पर इस मामले में और बड़े खुलासे होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।


