सहरसा में एमडीएम विवाद के बाद प्रशासन सख्त, केंद्रीय रसोईघर की हुई बड़ी जांच

बिहार के सहरसा जिले में मध्याह्न भोजन योजना को लेकर सामने आए गंभीर मामले के बाद प्रशासन पूरी तरह सतर्क हो गया है। स्कूलों में परोसे गए एमडीएम भोजन में सांप मिलने और बड़ी संख्या में बच्चों के बीमार पड़ने की घटना ने पूरे जिले को झकझोर दिया है। इस मामले के सामने आने के बाद जिला प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई शुरू कर दी है। शनिवार को अधिकारियों की टीम ने एनजीओ द्वारा संचालित केंद्रीय रसोईघर का औचक निरीक्षण किया और भोजन की गुणवत्ता से लेकर साफ-सफाई तक हर पहलू की गहन जांच की।

प्रशासन की इस कार्रवाई को बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य को लेकर उठाया गया बड़ा कदम माना जा रहा है। अधिकारियों ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि भोजन की गुणवत्ता और सुरक्षा के मामले में किसी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। हालिया घटनाओं के बाद जिले में मध्याह्न भोजन योजना की व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं, जिसके बाद प्रशासन अब लगातार निगरानी बढ़ाने में जुट गया है।

जानकारी के अनुसार सहरसा जिले के महिषी और सौरबाजार प्रखंड के कुछ विद्यालयों में परोसे गए मध्याह्न भोजन में सांप मिलने की शिकायत सामने आई थी। इसके बाद कई बच्चों की तबीयत खराब हो गई और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इस घटना ने अभिभावकों और स्थानीय लोगों के बीच भारी चिंता और आक्रोश पैदा कर दिया। लोगों ने स्कूलों में बच्चों को दिए जा रहे भोजन की गुणवत्ता पर सवाल उठाए और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।

घटना के बाद जिला प्रशासन ने तुरंत जांच के आदेश दिए। इसी क्रम में शनिवार को एडीएम विभागीय जांच गणेश कुमार के नेतृत्व में अधिकारियों की एक टीम सत्तरकटैया प्रखंड के मेनहा स्थित केंद्रीय रसोईघर पहुंची। यह रसोईघर एक एनजीओ द्वारा संचालित किया जाता है, जहां से बड़ी संख्या में स्कूलों के लिए भोजन तैयार कर भेजा जाता है।

निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने रसोईघर की पूरी व्यवस्था का जायजा लिया। टीम ने भोजन तैयार करने की प्रक्रिया, कच्चे माल के भंडारण, रसोई की स्वच्छता और वितरण व्यवस्था को विस्तार से देखा। अधिकारियों ने मौके पर तैयार किए जा रहे भोजन की गुणवत्ता की जांच की और वहां मौजूद खाद्य सामग्री के नमूने भी एकत्र किए।

जांच टीम में एडीएम के अलावा बीडीओ सह बीईओ रोहित कुमार साह और सीओ शिखा सिंह भी शामिल थीं। अधिकारियों ने रसोईघर में रखे चावल, दाल, सब्जियों और मसालों की गुणवत्ता को ध्यान से परखा। साथ ही खाद्य सामग्री के सैंपल लैब जांच के लिए भेजने का निर्णय लिया गया ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं भोजन में किसी प्रकार की गड़बड़ी या लापरवाही तो नहीं हुई।

निरीक्षण के दौरान साफ-सफाई को लेकर भी कई महत्वपूर्ण बिंदुओं की जांच की गई। अधिकारियों ने रसोईघर की स्वच्छता, बर्तनों की सफाई, खाद्य सामग्री रखने की व्यवस्था और कर्मचारियों की कार्यप्रणाली को बारीकी से देखा। प्रशासन ने एनजीओ संचालकों को सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि भोजन तैयार करने और वितरण के दौरान निर्धारित सभी सुरक्षा मानकों का पालन हर हाल में करना होगा।

एडीएम गणेश कुमार ने स्पष्ट कहा कि बच्चों के स्वास्थ्य के साथ किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि यदि जांच में किसी प्रकार की लापरवाही या अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी। अधिकारियों ने यह भी कहा कि भोजन की गुणवत्ता और स्वच्छता बनाए रखने के लिए नियमित निगरानी जारी रहेगी।

स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी इस मामले को गंभीर बताया। निरीक्षण के दौरान पंचायत समिति सदस्य कृष्ण कुमार उर्फ माखन यादव और मुखिया प्रतिनिधि संजय साह भी मौजूद रहे। उन्होंने अधिकारियों के सामने भोजन की गुणवत्ता को लेकर ग्रामीणों की चिंताओं को रखा। स्थानीय लोगों का कहना है कि भोजन की गुणवत्ता को लेकर पहले भी कई बार शिकायतें की गई थीं, लेकिन समय पर कार्रवाई नहीं होने के कारण स्थिति बिगड़ती गई।

ग्रामीणों का आरोप है कि कई विद्यालयों में लंबे समय से खराब गुणवत्ता वाला भोजन बच्चों को दिया जा रहा था। कई बार भोजन में सफाई की कमी और घटिया सामग्री के इस्तेमाल की शिकायतें सामने आईं, लेकिन जिम्मेदार एजेंसियों ने गंभीरता नहीं दिखाई। अब जब बड़ी घटना सामने आई और बच्चे बीमार पड़े, तब प्रशासन पूरी तरह सक्रिय हुआ है।

जानकारी के अनुसार सत्तरकटैया प्रखंड के लगभग 96 प्राथमिक और मध्य विद्यालयों में इसी केंद्रीय रसोईघर से भोजन की आपूर्ति की जाती है। ऐसे में यह मामला केवल एक विद्यालय या एक दिन की घटना तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि पूरी व्यवस्था की निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण पर सवाल खड़े कर रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि मध्याह्न भोजन योजना का उद्देश्य बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना और विद्यालयों में उनकी उपस्थिति बढ़ाना है। लेकिन यदि भोजन की गुणवत्ता और सुरक्षा पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तो यह योजना बच्चों के स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकती है। इसलिए नियमित निरीक्षण, खाद्य परीक्षण और जवाबदेही तय करना बेहद जरूरी है।

इस घटना के बाद प्रशासन अब जिले के अन्य एनजीओ संचालित रसोईघरों की भी जांच करने की तैयारी में है। अधिकारियों का कहना है कि सभी रसोईघरों में खाद्य सुरक्षा मानकों और साफ-सफाई की स्थिति की जांच की जाएगी। साथ ही स्कूलों में भोजन वितरण प्रक्रिया की निगरानी भी बढ़ाई जाएगी।

अभिभावकों के बीच फिलहाल चिंता का माहौल बना हुआ है। कई अभिभावकों ने मांग की है कि बच्चों को दिए जाने वाले भोजन की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए स्थायी व्यवस्था बनाई जाए। उनका कहना है कि सरकारी योजनाओं का उद्देश्य बच्चों का स्वास्थ्य बेहतर बनाना है, लेकिन लापरवाही के कारण बच्चों की जान खतरे में पड़ रही है।

राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने भी इस घटना पर चिंता जताई है। कई संगठनों ने दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

फिलहाल प्रशासन की जांच जारी है और खाद्य सामग्री के सैंपल रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। लेकिन इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि बच्चों को दिए जाने वाले भोजन की निगरानी व्यवस्था कितनी मजबूत है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे।

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