बिहार के बचपन का सौदा! मुजफ्फरपुर-साबरमती एक्सप्रेस में ‘इंसानी शिकारी’ का भंडाफोड़; 5 मासूमों का रेस्क्यू, राजस्थान की मंडियों में मजदूरी की भट्टी में झोंकने की थी तैयारी

समाचार के मुख्य बिंदु: आरपीएफ की सजगता से बचा पांच मासूमों का भविष्य

  • बड़ी कार्रवाई: आरपीएफ लखनऊ और उन्नाव की संयुक्त टीम ने मानव तस्करी के एक बड़े प्रयास को विफल करते हुए पांच नाबालिग बच्चों को मुक्त कराया है।
  • तस्कर गिरफ्तार: खगड़िया जिले का रहने वाला 28 वर्षीय दिलीप कुमार पुलिस की गिरफ्त में है, जो बच्चों को बहला-फुसलाकर ले जा रहा था।
  • सस्ते सौदे का खेल: मात्र 3000 रुपये का एडवांस देकर मासूमों को राजस्थान के आबू रोड स्थित अनाज मंडी में मजदूरी के लिए बेचा जाना था।
  • पीड़ितों का प्रोफाइल: छुड़ाए गए बच्चे सहरसा, दरभंगा और खगड़िया जिलों के रहने वाले हैं, जिनकी उम्र महज 14 से 15 साल के बीच है।
  • ट्रेन का सुराग: मुजफ्फरपुर-साबरमती जनसाधारण एक्सप्रेस (15269) के कोच डी-12 में आरपीएफ ने रेकी के बाद इस ऑपरेशन को अंजाम दिया।
  • VOB इनसाइट: बिहार के पिछड़े इलाकों से ‘सस्ते श्रम’ की तस्करी कोई नई बात नहीं है, लेकिन आरपीएफ की इस मुस्तैदी ने साबित किया है कि ‘इंटेलिजेंस शेयरिंग’ से इन शिकारी नेटवर्कों को तोड़ा जा सकता है। यह घटना दर्शाती है कि गरीबी का फायदा उठाकर दलाल कैसे बच्चों को ‘चाइल्ड लेबर’ की आग में झोंक रहे हैं।

उन्नाव/लखनऊ | 29 मार्च, 2026

​बिहार की गरीबी और लाचारी को ढाल बनाकर मासूमों के बचपन का व्यापार करने वाले एक गिरोह का उत्तर प्रदेश के उन्नाव में पर्दाफाश हुआ है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, मुजफ्फरपुर से चलकर साबरमती जाने वाली जनसाधारण एक्सप्रेस में सवार पांच नाबालिगों को राजस्थान की मंडियों में बंधुआ मजदूरी के लिए ले जाया जा रहा था। आरपीएफ लखनऊ और उन्नाव की सक्रियता ने न केवल इन बच्चों को ‘आधुनिक दासता’ की जंजीरों में बंधने से बचाया, बल्कि उस तस्कर को भी दबोच लिया जो इनके बचपन की कीमत लगाकर राजस्थान की अनाज मंडियों तक पहुँचाने वाला था।

रेकी से रेस्क्यू तक: चारबाग से उन्नाव तक का फिल्मी घटनाक्रम

​पूरा मामला शनिवार दोपहर का है जब आरपीएफ लखनऊ को कुछ संदिग्ध गतिविधियों की सूचना मिली थी। आरपीएफ लखनऊ की इंस्पेक्टर चंदना सिन्हा के नेतृत्व में एक विशेष टीम ने चारबाग रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर चार पर नजरें गड़ाई हुई थीं। दोपहर करीब 1:09 बजे जैसे ही ट्रेन संख्या 15269 (मुजफ्फरपुर-साबरमती जनसाधारण एक्सप्रेस) स्टेशन पर पहुँची, टीम ने कोच डी-12 की सघन तलाशी शुरू की।

​कोच के भीतर का नजारा हृदयविदारक था। धूल और शोर के बीच पांच किशोर उम्र के बच्चे संदिग्ध हालत में बैठे और कुछ सो रहे थे। उनके साथ कोई अभिभावक नजर नहीं आ रहा था, सिवाय एक युवक के जो उन पर पैनी नजर रखे हुए था। आरपीएफ ने अपनी पहचान छुपाते हुए लखनऊ से उन्नाव तक ट्रेन में रेकी की और पुख्ता सबूत मिलने के बाद उन्नाव जंक्शन पर ऑपरेशन को अंजाम दिया। जैसे ही ट्रेन उन्नाव पहुँची, आरपीएफ की टीम ने घेराबंदी कर पांचों बच्चों और उन्हें ले जा रहे तस्कर को ट्रेन से नीचे उतार लिया।

3000 रुपये की कीमत और राजस्थान की ‘अनाज मंडी’ का सच

​पूछताछ के दौरान पकड़े गए तस्कर की पहचान खगड़िया निवासी 28 वर्षीय दिलीप कुमार के रूप में हुई है। दिलीप ने जो सच उगला, वह हमारे समाज की विद्रूपता को उजागर करता है। उसने कबूल किया कि वह इन बच्चों को राजस्थान के शिवगंज स्थित अनाज मंडी (अबू रोड) ले जा रहा था। दिलीप ने बताया कि उसके गांव के ही एक रसूखदार ठेकेदार रणधीर सिंह ने इन बच्चों को लाने के लिए उसे मोटी कमीशन का लालच दिया था।

कैसे फंसाया गया जाल में?

दिलीप ने स्वीकार किया कि इन बच्चों के परिजनों को महज 3000 रुपये का ‘एडवांस’ देकर झांसे में लिया गया था। बच्चों को बेहतर काम और अच्छे पैसे का लालच दिया गया, जबकि असलियत यह थी कि उन्हें राजस्थान की भीषण गर्मी में अनाज मंडियों में बोरे ढोने और कड़ा श्रम करने के लिए बेचा जा रहा था। जिन मासूमों के हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं, उन्हें दलालों ने मजदूरी की भट्टी में झोंकने की पूरी तैयारी कर ली थी।

सहरसा, दरभंगा और खगड़िया: बिहार के ये जिले बने शिकार

​छुड़ाए गए पांचों बच्चों की उम्र 14 से 15 साल के बीच है। प्राथमिक जांच में पता चला है कि ये बच्चे बिहार के उन इलाकों से आते हैं जहाँ शिक्षा और रोजगार के संसाधन बेहद सीमित हैं।

  1. सहरसा: कोसी के इस इलाके से पलायन की समस्या विकराल है।
  2. दरभंगा: मिथिलांचल के इस केंद्र से भी दलाल अक्सर कम उम्र के बच्चों को दिल्ली या राजस्थान ले जाते हैं।
  3. खगड़िया: इसी जिले का तस्कर भी है, जो बच्चों के साथ ‘घर का आदमी’ बनकर विश्वास जीतता था।

​आरपीएफ इंस्पेक्टर चंदना सिन्हा के मुताबिक, बच्चों को फिलहाल बाल संरक्षण गृह भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है और उनके परिजनों को सूचित किया जा रहा है। दिलीप कुमार के खिलाफ मानव तस्करी (Human Trafficking) की गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज कर उसे जेल भेजने की तैयारी है।

VOB का नजरिया: क्या केवल ‘गिरफ्तारी’ काफी है?

​’द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) का मानना है कि यह घटना हमारे तंत्र पर कई सवालिया निशान लगाती है:

  • मुजफ्फरपुर स्टेशन की सुरक्षा: जब ट्रेन मुजफ्फरपुर से चली, तो वहां की स्थानीय पुलिस या आरपीएफ की नजर इन पांच संदिग्ध बच्चों पर क्यों नहीं पड़ी? क्या केवल उत्तर प्रदेश की सीमा में घुसने के बाद ही सुरक्षा एजेंसियां सक्रिय होती हैं?
  • ठेकेदारों का नेटवर्क: दिलीप कुमार तो महज एक मोहरा है। असली अपराधी रणधीर सिंह जैसे ठेकेदार हैं जो राजस्थान और गुजरात में बैठकर बिहार के बचपन का सौदा करते हैं। क्या बिहार पुलिस ऐसे ठेकेदारों के ठिकानों पर छापेमारी करेगी?
  • पलायन की मजबूरी: 3000 रुपये के एडवांस के लिए माता-पिता अपने बच्चों को अनजान लोगों के साथ भेज रहे हैं। यह सरकार के ‘हर हाथ को काम’ और ‘गरीबी उन्मूलन’ के दावों की पोल खोलता है।
  • मंडियों में शोषण: राजस्थान की अनाज मंडियों में बिहार के हजारों बच्चे ‘चाइल्ड लेबर’ के रूप में खप रहे हैं। राजस्थान और बिहार सरकार के बीच एक संयुक्त टास्क फोर्स की जरूरत है जो इन मंडियों का औचक निरीक्षण कर सके।

​सुशासन और बचपन की सुरक्षा

​मुजफ्फरपुर-साबरमती एक्सप्रेस की यह घटना एक चेतावनी है। अगर आरपीएफ ने समय पर कार्रवाई नहीं की होती, तो आज ये पांच बच्चे राजस्थान की किसी अंधेरी मंडी में गुमनाम जिंदगी जी रहे होते। बिहार सरकार को चाहिए कि वह सहरसा, खगड़िया और दरभंगा जैसे जिलों में ‘माइग्रेशन ट्रैकिंग सिस्टम’ को मजबूत करे ताकि यह पता चल सके कि कौन सा बच्चा किसके साथ और क्यों राज्य से बाहर जा रहा है।

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