
पटना/किशनगंज: बिहार पुलिस के गलियारों में इन दिनों एक ऐसे अधिकारी के कारनामों की चर्चा है, जिसने खाकी वर्दी को महज धन उगाही और निजी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने का जरिया बना लिया। किशनगंज के निलंबित एसडीपीओ गौतम कुमार की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है, जहाँ भ्रष्टाचार की जड़ें केवल नोटों की गड्डियों तक सीमित नहीं थीं, बल्कि एक ‘सियासी साम्राज्य’ खड़ा करने के सपने से जुड़ी थीं। आर्थिक अपराध इकाई (ईओयू) की हालिया जांच ने गौतम कुमार के उन काले पन्नों को पलट दिया है, जिन्हें उसने सिलीगुड़ी की वादियों और बेनामी संपत्तियों के पीछे छिपा रखा था।
मोहब्बत, सियासत और भ्रष्टाचार का त्रिकोण
जांच में जो सबसे चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है, वह है गौतम कुमार का अपनी एक महिला मित्र (गर्लफ्रेंड) के प्रति समर्पण, जिसे वह किसी भी कीमत पर माननीय की कुर्सी पर देखना चाहता था। बताया जा रहा है कि किशनगंज में तैनाती के दौरान गौतम ने जो भी ‘अवैध वसूली’ की, उसका एक बड़ा हिस्सा अपनी प्रेमिका के राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने में झोंक दिया। गौतम का लक्ष्य स्पष्ट था—अपनी महिला मित्र को किशनगंज से विधायक का चुनाव लड़ाना। इसके लिए वह न केवल करोड़ों का फंड जुटा रहा था, बल्कि खुद के लिए भी साल 2030 के बाद राजनीति की पिच तैयार कर रहा था। पुलिस अधिकारी के रूप में रसूख का इस्तेमाल कर वह आने वाले वर्षों में अपनी सेवानिवृत्ति के बाद खुद भी सफेदपोश बनने का ख्वाब देख रहा था।
सिलीगुड़ी में बेनामी संपत्तियों का ‘अघोषित स्वर्ग’
ईओयू की टीम जब गौतम कुमार के निवेश की कड़ियों को जोड़ने निकली, तो सुराग बिहार की सीमाओं को पार कर पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी तक जा पहुँचे। यहाँ गौतम ने अपनी प्रेमिका के नाम पर संपत्तियों का एक ऐसा अंबार खड़ा कर दिया था, जिसे देखकर अनुभवी अधिकारी भी दंग रह गए। जांच में सिलीगुड़ी में 7 आलीशान प्लॉट और एक भव्य बंगले का पता चला है। ये तमाम संपत्तियाँ बेनामी तरीके से खरीदी गई थीं ताकि कानून की नजरों से बचा जा सके।
सिलीगुड़ी को चुनने के पीछे की वजह भी काफी रणनीतिक थी। किशनगंज से सटा होने के कारण यहाँ से संपत्तियों की देखरेख करना आसान था और सीमावर्ती क्षेत्र होने की वजह से नकदी का प्रवाह छिपाना भी सुलभ था। ईओयू अब उन दस्तावेजों की बारीकी से जांच कर रही है, जिनके जरिए इन जमीनों की रजिस्ट्री कराई गई और भुगतान के लिए किस माध्यम का इस्तेमाल हुआ।
अतिशयोक्ति की पराकाष्ठा: नौकरानी के पास ‘थार’ और ‘बुलेट’
गौतम कुमार की रईसी और पैसों की बर्बादी का आलम यह था कि उसने भ्रष्टाचार की मर्यादाओं को भी लांघ दिया था। किशनगंज स्थित उसके सरकारी आवास पर काम करने वाली नौकरानी भी सामान्य जीवन नहीं जी रही थी। जांच में पता चला है कि गौतम ने अपनी नौकरानी को आने-जाने के लिए ‘थार’ जैसी महंगी गाड़ी और एक ‘बुलेट’ मोटरसाइकिल दे रखी थी। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि अधिकारी के पास काली कमाई का इतना अधिक प्रवाह था कि उसे खपाने के लिए वह अपने कर्मचारियों पर भी दिल खोलकर खर्च कर रहा था। एक सरकारी आवास, जहाँ कानून का पालन होना चाहिए था, वहाँ भ्रष्टाचार की नुमाइश इस कदर की जा रही थी कि एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी भी लग्जरी गाड़ियों में घूम रहा था।
ईओयू का शिकंजा: शुक्रवार को फिर होगी ‘अग्निपरीक्षा’
आर्थिक अपराध इकाई (ईओयू) ने इस मामले में अपनी कार्रवाई तेज कर दी है। 6 अप्रैल को हुई पहले दौर की लंबी पूछताछ के बाद, गौतम कुमार को आज यानी शुक्रवार को फिर से तलब किया गया है। अधिकारियों के पास सवालों की एक लंबी फेहरिस्त तैयार है, जो मुख्य रूप से बेनामी संपत्तियों के वित्तपोषण के इर्द-गिर्द घूमती है।
जांच एजेंसी के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि एक सीमित वेतन पाने वाले सरकारी अधिकारी के पास सिलीगुड़ी में चाय बागान और करोड़ों के बंगले खरीदने के लिए पैसे कहाँ से आए? क्या इसमें केवल स्थानीय वसूली का पैसा था या कोई बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा था? इसके अलावा, गौतम के उन संपर्कों की भी तलाश की जा रही है जिन्होंने उसे राजनीतिक जमीन तैयार करने में मदद की।
पूर्णिया के विधायक से ‘खास’ कनेक्शन की जांच
गौतम कुमार के राजनीतिक मंसूबों के पीछे कुछ रसूखदार सफेदपोशों के हाथ होने की आशंका भी जताई जा रही है। जांच की आंच पूर्णिया के एक विधायक तक पहुँच रही है, जिनसे गौतम के बेहद करीबी रिश्ते बताए जाते हैं। ईओयू इस एंगल पर भी काम कर रही है कि क्या गौतम की काली कमाई का कोई हिस्सा इस राजनीतिक नेटवर्क के जरिए निवेश किया जा रहा था। विधायक के साथ गौतम की बैठकों और फोन कॉल रिकॉर्ड्स को खंगाला जा रहा है ताकि इस सांठगांठ के पीछे की असल सच्चाई सामने आ सके।
2030 का मास्टर प्लान: वर्दी से खादी तक का सफर
गौतम कुमार की महत्त्वाकांक्षाएं केवल वर्तमान तक सीमित नहीं थीं। उसने अपनी सेवानिवृत्ति के लिए एक पूरा रोडमैप तैयार कर रखा था। साल 2030 में रिटायर होने के बाद उसने खुद को एक स्थापित राजनेता के रूप में पेश करने की योजना बनाई थी। किशनगंज जैसे संवेदनशील और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जिले में एसडीपीओ के पद पर रहते हुए उसने जो नेटवर्क बनाया, उसका मकसद केवल अपराध नियंत्रण नहीं, बल्कि अपना निजी वोट बैंक और प्रभाव क्षेत्र तैयार करना था।
वर्दी पर लगा गहरा दाग
गौतम कुमार जैसे अधिकारियों के कारनामे पूरी पुलिस बिरादरी के लिए शर्मिंदगी का सबब बनते हैं। जहाँ एक ओर ईमानदार अधिकारी दिन-रात कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए संघर्ष करते हैं, वहीं दूसरी ओर गौतम जैसे लोग पद की गरिमा को निजी स्वार्थ और विलासिता के लिए बेच देते हैं। भ्रष्टाचार का यह मामला केवल एक अधिकारी की व्यक्तिगत गिरावट नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था पर भी सवाल उठाता है जहाँ एक उप-मंडल पुलिस अधिकारी बेखौफ होकर करोड़ों की संपत्तियाँ बनाता रहा और उसकी नौकरानी थार से घूमती रही, लेकिन विभाग को इसकी भनक बहुत देर से लगी।
फिलहाल, गौतम कुमार निलंबित हैं और उनकी किस्मत का फैसला अब ईओयू की जांच रिपोर्ट और अदालती कार्यवाही पर टिका है। शुक्रवार की पूछताछ में कई और बड़े नामों के चेहरे से नकाब उतरने की उम्मीद है। बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही इस मुहिम ने यह संदेश तो दे दिया है कि वर्दी की चमक अब काली कमाई के दागों को ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं पाएगी।


