आईएएस अधिकारी संजीव हंस को पटना हाईकोर्ट से राहत, पीएमएलए केस में मिली जमानत

पटना। पटना हाईकोर्ट ने स्पेशल ट्रायल (पीएमएलए) में गिरफ्तार आईएएस अधिकारी संजीव हंस को जमानत दे दी है। जस्टिस चंद्रप्रकाश सिंह की बेंच ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) का मामला कमजोर और साक्ष्यहीन है। कोर्ट ने माना कि इस स्तर पर संजीव हंस की निरंतर हिरासत उचित नहीं ठहराई जा सकती

ईडी का मामला साबित नहीं, प्रेडिकेट प्राथमिकी पहले ही रद्द

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि ईडी का पूरा केस अधिकार क्षेत्र और साक्ष्यगत कमियों से ग्रस्त है। जिस प्रेडिकेट प्राथमिकी (रूपसपुर थाना कांड संख्या–18/2023) पर ईसीआईआर आधारित था, उसे कोर्ट ने 6 अगस्त 2024 को ही रद्द कर दिया था। इसके बाद दर्ज ऐडेंडम ईसीआईआर केवल एक विजिलेंस केस पर टिका है, जो अभी प्रारंभिक जांच चरण में है।

कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला

कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष कोई स्वतंत्र या ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो कि संजीव हंस किसी अवैध वित्तीय लेन-देन या अपराध से अर्जित धन के स्वामित्व में शामिल थे। जांच मुख्य रूप से धारा 50 पीएमएलए के तहत दर्ज बयानों और कुछ व्हाट्सएप चैट्स पर आधारित थी, जिन्हें कोर्ट ने असत्यापित और असमर्थित माना।

संजीव हंस की छवि साफ, जांच में किया सहयोग

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि संजीव हंस का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और उन्होंने ईडी की जांच में पूर्ण सहयोग किया है। कोर्ट ने माना कि उन्होंने धारा 45 पीएमएलए की दोनों शर्तों को पूरा किया है, इसलिए जमानत से इनकार करने की कठोर शर्तें इस मामले में लागू नहीं होतीं।

कोर्ट ने क्या कहा

जस्टिस चंद्रप्रकाश सिंह ने कहा,

“मुकदमा अभी प्रारंभिक अवस्था में है और इसमें जटिल व विलंबित सामग्री शामिल है। ऐसी स्थिति में अभियुक्त की निरंतर हिरासत का कोई औचित्य नहीं बनता।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस चरण पर संजीव हंस अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों में दोषी प्रतीत नहीं होते। इसलिए उनकी स्वतंत्रता सीमित करना न्यायोचित नहीं है।

जमानत का आदेश और शर्तें

इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने उचित शर्तों के साथ जमानत मंजूर की। अदालत ने कहा कि मुकदमे की प्रकृति ऐसी है कि जांच के दौरान अभियुक्त की उपस्थिति जमानती शर्तों से सुनिश्चित की जा सकती है

न्यायपालिका में विश्वास, हंस की प्रतिक्रिया

इस आदेश को न्यायपालिका में न्यायसंगतता और स्वतंत्रता के सिद्धांत की पुष्टि माना जा रहा है। संजीव हंस ने कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें न्यायिक प्रक्रिया पर पूरा भरोसा था और जैसे-जैसे मुकदमे की कार्यवाही आगे बढ़ेगी, उनकी निर्दोषता सिद्ध हो जाएगी।


 

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