पटना, 20 मई:पटना उच्च न्यायालय ने मंगलवार को एक अहम आदेश में बिहार के महाविद्यालयों में प्राचार्य पदों पर लॉटरी सिस्टम के जरिए पदस्थापन की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगा दी है। यह प्रक्रिया बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग की अनुशंसा और शिक्षा विभाग की मंजूरी के बाद राज्यपाल सचिवालय द्वारा 16 मई 2025 को अधिसूचित की गई थी।
सुहेली मेहता ने दी थी चुनौती
राज्यपाल सचिवालय की अधिसूचना को सुहेली मेहता और अन्य द्वारा पटना हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ प्रसाद ने अदालत में पक्ष रखा। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि उच्च शिक्षण संस्थानों के प्राचार्य जैसे प्रतिष्ठित पदों पर इस प्रकार की रैंडम लॉटरी प्रक्रिया पारदर्शिता और योग्यता आधारित प्रणाली के विपरीत है।
कोर्ट ने दी कड़ी टिप्पणी, अधिसूचना पर रोक
मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायमूर्ति राजेश कुमार वर्मा की एकलपीठ ने त्वरित सुनवाई की और राज्यपाल सचिवालय की अधिसूचना पर अगले आदेश तक रोक लगा दी। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि राज्यपाल सचिवालय चाहे तो अधिसूचना में संशोधन कर कानून के दायरे में नई अधिसूचना जारी कर सकता है।
16 जून को अगली सुनवाई
कोर्ट ने अगली सुनवाई की तिथि 16 जून 2025 निर्धारित की है। तब तक इस प्रक्रिया पर कोई भी नियुक्ति अथवा पदस्थापन नहीं किया जा सकेगा।
क्या था लॉटरी सिस्टम?
राजभवन की अधिसूचना के अनुसार, कॉलेजों की अनुमंडलवार अंग्रेजी वर्णक्रम सूची तैयार की जानी थी। अनुशंसित प्राचार्यों के नामों की पर्चियां बनाकर एक डिब्बे में रखी जातीं और किसी कर्मचारी से एक पर्ची निकलवाकर संबंधित प्राचार्य को सूची के पहले कॉलेज में पदस्थापित किया जाता। चयन में अनुमंडल विकल्प तो पूछा जाता, लेकिन कॉलेज का विकल्प नहीं दिया जाता था। इस प्रणाली पर शिक्षा जगत और समाज के विभिन्न वर्गों ने गंभीर सवाल उठाए थे।


