पटना का ‘एकता भवन’ ढहा: शहर ने खोया एक अनोखा लैंडमार्क, 1986 से जुड़ी थी पहचान

पटना: राजधानी ने अपने एक ऐसे ऐतिहासिक और अनोखे लैंडमार्क को खो दिया है, जो दशकों तक लोगों के लिए कौतूहल और पहचान का केंद्र रहा। गांधी मैदान के पास गंगा किनारे स्थित ‘एकता भवन’ को हाल ही में ध्वस्त कर दिया गया, जिससे शहर की वास्तुकला विरासत का एक अहम अध्याय समाप्त हो गया।

40 साल पुरानी इमारत का अंत

करीब चार दशक पुराना यह भवन अपनी अनोखी डिजाइन के कारण दूर से ही पहचाना जाता था। इसकी बनावट इतनी अलग थी कि स्थानीय लोग इसे ‘सैटेलाइट बिल्डिंग’ के नाम से भी जानते थे।

यह इमारत न सिर्फ एक संरचना थी, बल्कि पटना के बदलते शहरी स्वरूप की एक पहचान बन चुकी थी। कई लोगों के लिए यह एक यादगार जगह थी, जो शहर के इतिहास और आधुनिकता के बीच एक पुल का काम करती थी।

1986 में रखी गई थी नींव

इस इमारत की नींव 9 सितंबर 1986 को रखी गई थी, जब तत्कालीन उपराष्ट्रपति ने इसका शिलान्यास किया था।

हालांकि भवन का ढांचा तैयार हो गया था, लेकिन इसके अंदरूनी काम—जैसे साज-सज्जा और इलेक्ट्रिकल कार्य—पूरी तरह कभी खत्म नहीं हो सके। यही वजह रही कि यह इमारत सालों तक “अधूरी लेकिन आकर्षक” संरचना के रूप में खड़ी रही।

‘पटना हाट’ के लिए तोड़ा गया भवन

सरकार ने इस इमारत को हटाने का फैसला इसलिए लिया, ताकि प्रस्तावित “पटना हाट” परियोजना के लिए जगह बनाई जा सके।

यह परियोजना शहर के पर्यटन और व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लाई जा रही है, लेकिन इसके लिए एक ऐतिहासिक ढांचे को हटाना कई लोगों को खटक रहा है।

वास्तुकला का अनोखा नमूना

विशेषज्ञों के अनुसार, यह इमारत ‘ब्रूटलिस्ट’ (Brutalist) वास्तुकला शैली का उदाहरण थी—

  • कंक्रीट आधारित भारी संरचना
  • असामान्य और प्रयोगात्मक डिजाइन
  • पारंपरिक इमारतों से बिल्कुल अलग पहचान

संरक्षण वास्तुकारों का मानना है कि बिहार में इस तरह की इमारतें बहुत कम हैं, इसलिए इसे संरक्षित किया जाना चाहिए था।

विरोध और सवाल

इमारत को ढहाए जाने के बाद:

  • वास्तुकारों और शहरी विशेषज्ञों ने नाराजगी जताई
  • स्थानीय लोगों ने इसे “इतिहास का नुकसान” बताया
  • यह सवाल उठा कि क्या इसे नई परियोजना में शामिल नहीं किया जा सकता था?

कई विशेषज्ञों का कहना है कि “एडेप्टिव रीयूज़” (Adaptive Reuse) के तहत इस भवन को संरक्षित रखते हुए भी विकास किया जा सकता था।

रहस्य भी बना रहा

दिलचस्प बात यह है कि:

  • इस इमारत के असली वास्तुकार के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं है
  • माना जाता है कि इसे किसी बाहरी कंपनी ने डिजाइन किया था

इस तरह, इमारत के साथ उसका इतिहास और रहस्य भी मिट गया।

शहर की पहचान पर असर

पटना जैसे तेजी से बदलते शहर में पुराने लैंडमार्क्स का महत्व और बढ़ जाता है।

  • ये शहर की सांस्कृतिक पहचान बनाते हैं
  • लोगों की यादों से जुड़े होते हैं
  • और आने वाली पीढ़ियों को इतिहास से जोड़ते हैं

ऐसे में ‘एकता भवन’ का हटना सिर्फ एक इमारत का गिरना नहीं, बल्कि शहर की पहचान का एक हिस्सा खत्म होना भी है।

विकास बनाम विरासत

यह मामला एक बड़े सवाल को सामने लाता है—

क्या विकास के लिए विरासत को मिटाना जरूरी है?

या फिर दोनों के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ा जा सकता है?

पटना के ‘एकता भवन’ का मामला इसी बहस को और तेज कर गया है।

‘एकता भवन’ अब इतिहास बन चुका है, लेकिन इसके साथ जुड़ी यादें और बहस लंबे समय तक जिंदा रहेंगी।

अब देखना यह होगा कि भविष्य में शहर के विकास के दौरान:

  • क्या विरासत को बचाने पर ध्यान दिया जाएगा
  • या फिर ऐसे और लैंडमार्क्स भी इतिहास बनते जाएंगे

पटना ने एक अनोखी पहचान खो दी है—और यह नुकसान सिर्फ कंक्रीट का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति का भी है।

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