
पटना, 18 मई 2026। बिहार के कृषि क्षेत्र को सुदृढ़ करने, सिंचाई प्रणालियों के ढांचागत संकट को दूर करने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के मुख्य आधार यानी किसानों की आय को सुरक्षा कवच प्रदान करने के उद्देश्य से राज्य प्रशासन में एक बड़ा नीतिगत और सांगठनिक फेरबदल किया गया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने राजकीय नलकूपों (ट्यूबवेल्स) के रख-रखाव, मरम्मत और संचालन की संपूर्ण कमान पंचायती राज विभाग से वापस लेकर पूरी तरह से लघु जल संसाधन विभाग को सौंपने का कड़ा विधिक निर्देश जारी किया है। लोकसेवक आवास, 1 अणे मार्ग स्थित ‘संकल्प’ सभागार में सोमवार को आयोजित एक उच्चस्तरीय और संवेदनशील समीक्षा बैठक के दौरान यह दूरगामी निर्णय लिया गया। इस बैठक के भीतर राज्य के भीतर स्थापित हजारों बंद या आंशिक रूप से चालू नलकूपों, पारंपरिक तालाबों, आहर, पईन और पोखरों के पुनरुद्धार और उनके आधुनिक तकनीकी प्रबंधन को लेकर एक विस्तृत ब्लूप्रिंट तैयार किया गया ताकि आगामी खरीफ सीजन और मॉनसून की संभावित अनिश्चितताओं के बीच फसलों को शत-प्रतिशत पटवन की विधा हस्तगत कराई जा सके।
सिंचाई ग्रिड का नया संरेखण: विभागों के बीच तालमेल की अनिवार्यता
उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक के दौरान मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने स्पष्ट किया कि बिहार की चौदह करोड़ की आबादी में एक विशाल हिस्सा प्रत्यक्ष रूप से कृषि और उससे जुड़े व्यवसायों पर आश्रित है। ऐसी स्थिति में खेतों तक समय पर और पर्याप्त मात्रा में सिंचाई का पानी पहुंचाना सरकार की सबसे बड़ी नीतिगत प्राथमिकता है। सिंचाई के इस बड़े ग्रिड को सुचारू बनाने के लिए यह आवश्यक हो गया था कि तकनीकी रूप से दक्ष विभाग ही नलकूपों का प्रबंधन संभाले। इसी विन्यास के तहत लघु जल संसाधन विभाग को अब राज्य के सभी राजकीय नलकूपों के संचालन का विधिक उत्तरदायित्व सौंपा गया है।
इस बड़े सांगठनिक बदलाव को धरातल पर सुगमता से उतारने के लिए मुख्यमंत्री ने लघु जल संसाधन विभाग, पंचायती राज विभाग तथा पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग को आपस में एक मजबूत और पारदर्शी समन्वय स्थापित करने का निर्देश दिया है। बैठक के दौरान लघु जल संसाधन विभाग के सचिव बी. कार्तिकेय धनजी ने राज्य भर में स्थापित नलकूपों की अद्यतन भौतिक स्थिति, उनके विद्युत संचरण ग्रिड से जुड़ाव और बंद पड़े नलकूपों को चालू करने की विभागीय योजनाओं व बजटीय प्रस्तावों की विस्तृत विवरणी प्रस्तुत की। इसके समानांतर ही पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के अपर मुख्य सचिव आनंद किशोर और पंचायती राज विभाग के सचिव मनोज कुमार सिंह ने भी जल संचयन प्रणालियों को पर्यावरण-अनुकूल बनाने और स्थानीय स्तर पर उनके कुशल उपयोग से जुड़े कई महत्वपूर्ण नीतिगत सुझाव बैठक के पटल पर रखे।
विकेंद्रीकृत प्रबंधन: वार्ड स्तर पर बनेगी नलकूप प्रबंधन समितियां
नलकूपों के संचालन में स्थानीय स्तर पर होने वाली लापरवाही, ऑपरेटरों की अनुपलब्धता और छोटी तकनीकी खराबियों के कारण हफ्तों तक पटवन ठप रहने की पुरानी विसंगतियों को पूरी तरह से ब्लॉक करने के लिए मुख्यमंत्री ने एक नई विकेंद्रीकृत व्यवस्था संधारित करने का आदेश दिया है। नए नियमों के अनुसार, अब प्रत्येक राजकीय नलकूप के सुचारू संचालन और दैनिक देख-रेख के लिए ‘वार्ड स्तर पर विशेष मैनेजमेंट कमिटी’ (नलकूप प्रबंधन समिति) का विन्यास किया जाएगा। इस स्थानीय समिति में संबंधित वार्ड के प्रगतिशील किसानों, उपभोक्ताओं और स्थानीय जन-प्रतिनिधियों को शामिल किया जाएगा, जो सीधे तौर पर नलकूप के चालू रहने के समय, पानी के समान वितरण और बिजली आपूर्ति की निरंतरता की मॉनिटरिंग करेंगे।
मुख्यमंत्री ने कड़े शब्दों में निर्देश दिया कि सभी ट्यूबवेल्स हर हाल में ठीक ढंग से फंक्शनल (क्रियाशील) रहने चाहिए और इसकी विधिक जिम्मेदारी स्थानीय अभियंताओं की होगी। वर्तमान समय में वैश्विक जलवायु परिवर्तनों के कारण मॉनसून की अनिश्चितता और आंशिक सुखाड़ का खतरा हमेशा बना रहता है। ऐसी आपातकालीन मौसमी परिस्थितियों में यदि पारंपरिक वर्षा पर निर्भरता के कारण किसानों की फसलें प्रभावित होती हैं, तो ये नलकूप ही कृषि कार्य को संकट से बचाने का मुख्य सहारा साबित होते हैं। वार्ड स्तरीय समितियों के गठन से स्थानीय स्तर पर जवाबदेही तय होगी और किसी भी प्रकार की तकनीकी खराबी आने पर लघु जल संसाधन विभाग के कनिष्ठ अभियंता तुरंत उसे दुरुस्त करने की प्रविधि को पूरा करेंगे।
पारंपरिक जल संरचनाओं का संरक्षण: आहर, पईन और पोखरों का पुनरुद्धार
आधुनिक नलकूप प्रणालियों के समानांतर ही मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बिहार की प्राचीन और पारंपरिक जल प्रबंधन प्रणालियों के संरक्षण पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है। उन्होंने रेखांकित किया कि राज्य के दक्षिणी और उत्तरी प्रमंडलों के भूगोल में तालाब, आहर, पईन और पोखरों की सिंचाई कार्यों में एक अत्यंत ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ये पारंपरिक जल संरचनाएं न केवल भूजल स्तर (वाटर टेबल) को रिचार्ज रखने का मुख्य जरिया बनती हैं, बल्कि सूखे के दिनों में पशुधन और फसलों के लिए तात्कालिक जल आपूर्ति का सबसे सुलभ माध्यम साबित होती हैं।
लघु जल संसाधन विभाग को यह कड़ा टास्क सौंपा गया है कि जल जीवन हरियाली अभियान के साथ एकीकृत करते हुए राज्य के सभी प्रक्षेत्रों में अवस्थित आहर और पईनों के गाद निकालने (डी-सिल्टिंग), उनके तटबंधों को सुदृढ़ करने और जल भराव की क्षमता को बढ़ाने के विन्यासों पर युद्धस्तर पर काम किया जाए। पईनों के माध्यम से नदियों के अधिशेष पानी को सुदूर खेतों तक डाइवर्ट करने की पुरानी नहर प्रणालियों को दोबारा लाइव किया जाएगा, जिससे भूजल के अत्यधिक दोहन पर प्रभावी रोक लगाई जा सके और किसानों को मुफ्त व प्राकृतिक सिंचाई की सुविधा कड़ाई से सुनिश्चित कराई जा सके।
पंचायती राज विभाग का अपना इंजीनियरिंग सेल: अभियंताओं की होगी बहाली
ग्रामीण क्षेत्रों में आधारभूत संरचनाओं के विनिर्माण, पंचायत भवनों के निर्माण और तकनीकी कार्यों की गुणवत्ता को बेहतर करने के लिए मुख्यमंत्री ने एक बड़ा ढांचागत निर्णय लिया है। उन्होंने पंचायती राज विभाग को कड़ा विधिक निर्देश जारी किया है कि वह अन्य तकनीकी विभागों की भांति ही पूरी तरह से अपना स्वयं का एक समर्पित ‘इंजीनियरिंग सेल’ (तकनीकी प्रकोष्ठ) स्थापित करे। अब तक पंचायती राज विभाग को ग्रामीण स्तर के तकनीकी विन्यासों और आकलनों के लिए अन्य विभागों के अभियंताओं पर निर्भर रहना पड़ता था, जिससे विकास कार्यों की गति आंशिक रूप से प्रभावित होती थी।
इस नए तकनीकी प्रकोष्ठ के गठन के उपरांत पंचायती राज विभाग के भीतर बड़े पैमाने पर सहायक अभियंताओं, कनिष्ठ अभियंताओं और तकनीकी प्रबंधकों की विधिक बहाली की प्रक्रिया को तीव्र गति से शुरू किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि इस समर्पित इंजीनियरिंग विंग में स्थायी और पारदर्शी रूप से अभियंताओं की नियुक्ति होने से ग्राम पंचायत के स्तर पर होने वाले सभी प्रकार के विनिर्माण कार्य, सड़कों की मैपिंग, सामुदायिक भवनों का संरेखण और अन्य तकनीकी विलेख अत्यंत गुणवत्तापूर्ण और समयबद्ध तरीके से धरातल पर उतारे जा सकेंगे, जिससे वित्तीय अनियमितताओं और बिचौलियों की कड़ियों को पूरी तरह से समाप्त किया जा सकेगा।
व्यावहारिक ग्रामीण नियोजन: गांव के बाहर के नालों को ढकने की नहीं है जरूरत
ग्रामीण अवसंरचना के विकास और जल निकासी प्रणालियों के निर्माण को लेकर मुख्यमंत्री ने एक अत्यंत व्यावहारिक और तकनीकी रूप से सुदृढ़ नीतिगत स्पष्टीकरण जारी किया है। उन्होंने निर्देश दिया कि ग्रामीण क्षेत्रों में विकासात्मक योजनाओं के तहत नालियों और नालों के निर्माण के समय अनावश्यक वित्तीय व्यय को रोकने के नियमों का कड़ाई से पालन किया जाए। मुख्यमंत्री ने साफ किया कि ग्रामीण बस्तियों और आबादी वाले मुख्य वार्डों के भीतर जल निकासी के नालों को स्वच्छता और जनस्वास्थ्य के मानकों के तहत ढकना विधिक रूप से अनिवार्य है, परंतु गांव की भौगोलिक सीमा के बाहर सुदूर खेतों या सुनसान प्रक्षेत्रों की ओर जाने वाले बड़े नालों को कंक्रीट के स्लैब से ढकने की कोई व्यावहारिक या तकनीकी आवश्यकता नहीं है।
इस व्यावहारिक दृष्टिकोण के पीछे का मुख्य इंजीनियरिंग तर्क यह है कि खुले नाले सूर्य के प्रकाश के सीधे संपर्क में रहने के कारण प्राकृतिक रूप से जल को वाष्पीकृत करने और जैविक कचरे को नष्ट करने में सहायक होते हैं। साथ ही, खुले नालों की सफाई और उनकी गाद निकालने की प्रविधि कंक्रीट से ढके नालों की तुलना में अत्यंत सुगम और कम खर्चीली होती है। इस निर्देश के बाद पंचायती राज और ग्रामीण विकास विभाग के अभियंताओं को अपने इस्टिमेट्स में सुधार करने का आदेश दिया गया है, जिससे सरकारी बजटीय आवंटन का एक बड़ा हिस्सा अनावश्यक कंक्रीट संरचनाओं में बर्बाद होने से बच सकेगा और उस संचित पूंजी का उपयोग अन्य जन-कल्याणकारी ग्रामीण योजनाओं में सुगमता से किया जा सकेगा।
इस महत्वपूर्ण और दूरगामी नीतिगत बैठक के दौरान मंच पर लघु जल संसाधन मंत्री संतोष कुमार सुमन, पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश, मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव दीपक कुमार, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के अपर मुख्य सचिव आनंद किशोर, मुख्यमंत्री के सचिव लोकेश कुमार सिंह सहित विभिन्न संबंधित विभावों के अनेक वरीय प्रशासनिक कप्तान और तकनीकी योजनाकार पूरी कड़ाई और मुस्तैदी के साथ उपस्थित रहे, जिन्हें इन सभी कड़े निर्देशों का धरातल पर ससमय अनुपालन सुनिश्चित करने का कड़ा टास्क सौंपा गया है।


