संविधान शिल्पी को नमन और सत्ता का महाप्रयाण: पटना हाईकोर्ट के समीप बाबा साहब की जयंती पर उमड़ा आस्था और राजनीति का सैलाब, नीतीश कुमार का बतौर सीएम आखिरी सार्वजनिक नमन

पटना। बिहार की राजधानी पटना के राजनैतिक और सामाजिक वातावरण में आज एक अद्भुत संगम देखने को मिला। मौका था भारत रत्न बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की जयंती का, जिसे पूरा देश ‘समानता दिवस’ के रूप में मना रहा है। लेकिन बिहार के लिए 14 अप्रैल 2026 की यह सुबह केवल एक जयंती समारोह तक सीमित नहीं थी; यह सत्ता के उस परिवर्तन काल का साक्षी भी बनी, जिसकी चर्चा आज देश के हर कोने में है। पटना हाईकोर्ट के समीप स्थापित बाबा साहब की आदमकद प्रतिमा के चरणों में जब राज्य के मुखिया नीतीश कुमार ने माल्यार्पण किया, तो वह केवल एक पुष्प अर्पित करने की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि संविधान के निर्माता के प्रति उस अटूट निष्ठा का प्रदर्शन था, जिसने बिहार को पिछले दो दशकों से ‘सुशासन’ की राह पर चलने का हौसला दिया। राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवा निवृत्त) सैयद अता हसनैन और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मिलकर जब बाबा साहब की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित किए, तो समूचा वातावरण ‘बाबा साहब अमर रहें’ के नारों और देशभक्ति की धुनों से गुंजायमान हो उठा। यह समारोह इस मायने में भी ऐतिहासिक रहा क्योंकि इसे नीतीश कुमार के वर्तमान कार्यकाल के अंतिम सार्वजनिक कार्यक्रम के रूप में देखा जा रहा है।

संविधान और लोकतन्त्र की मर्यादा: राजभवन और सचिवालय की एकजुटता

​राजकीय समारोह की शुरुआत सुबह साढ़े दस बजे के करीब हुई। हाईकोर्ट के पास स्थित अम्बेडकर प्रतिमा स्थल को फूलों और तिरंगे की आभा से भव्य रूप से सजाया गया था। राज्यपाल सैयद अता हसनैन और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जैसे ही प्रतिमा के समीप पहुँचकर नमन किया, सूचना एवं जन-सम्पर्क विभाग के कलाकारों ने शंखनाद और मधुर भजनों से कार्यक्रम में आध्यात्मिकता का रंग भर दिया। इस दौरान मुख्यमंत्री के चेहरे पर एक विशेष गंभीरता और संतोष का भाव था। यह वही स्थान है जहाँ से संविधान की रक्षा की शपथ ली जाती है, और आज उसी संविधान के निर्माता को नमन कर नीतीश कुमार अपने एक लंबे राजनीतिक सफर के अगले पड़ाव की ओर बढ़ने जा रहे हैं।

​राज्यपाल ने अपने संक्षिप्त संवाद में बाबा साहब के उन मूल्यों को याद किया जो भारत को एक अखंड और समावेशी राष्ट्र बनाते हैं। उन्होंने कहा कि अम्बेडकर केवल एक वर्ग के नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के मार्गदर्शक हैं। नीतीश कुमार ने प्रतिमा के समक्ष कुछ पल मौन रहकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। यह दृश्य उन तमाम अटकलों और हलचलों के बीच एक शांत संवैधानिक स्थिरता का प्रतीक था, जो इस समय बिहार की सत्ता में महसूस की जा रही है।

सत्ता के दिग्गजों का जमावड़ा: विदाई और नई शुरुआत का संगम

​इस राजकीय समारोह में केवल मुख्यमंत्री ही नहीं, बल्कि बिहार की वर्तमान और आने वाली सत्ता के लगभग सभी मुख्य किरदार एक साथ मौजूद थे। यह एक दुर्लभ संयोग था जहाँ निवर्तमान नेतृत्व और उभरते नेतृत्व ने एक ही मंच से संविधान शिल्पी को नमन किया। समारोह में उपस्थित रहने वालों में केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह, उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और उप मुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा प्रमुख रूप से शामिल थे। इन नेताओं की उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि बिहार में सत्ता का चेहरा भले ही बदलने जा रहा हो, लेकिन बाबा साहब द्वारा स्थापित सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर एनडीए गठबंधन की प्रतिबद्धता यथावत रहेगी।

​समारोह में जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी, ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार, ग्रामीण कार्य मंत्री अशोक चौधरी और कृषि मंत्री रामकृपाल यादव भी मौजूद थे। इन मंत्रियों ने भी बारी-बारी से प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की। इनके साथ ही खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री लेशी सिंह, लघु जल संसाधन मंत्री संतोष कुमार सुमन, लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण मंत्री संजय कुमार सिंह और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मो. जमा खान ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष सह सांसद संजय कुमार झा, विधायक महेश्वर हजारी, श्याम रजक, अरूण मांझी, विधान पार्षद संजय कुमार सिंह उर्फ गांधीजी और कुमुद वर्मा सहित अन्य जनप्रतिनिधियों ने भी बाबा साहब के चरणों में अपनी श्रद्धा निवेदित की। नेताओं की यह लंबी कतार यह बताने के लिए काफी थी कि बिहार की राजनीति में अम्बेडकर एक ऐसा ध्रुव हैं जिनके इर्द-गिर्द हर विचारधारा को नतमस्तक होना पड़ता है।

सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से गूँजा ‘बिहार गीत’ और ‘देशभक्ति’

​जयंती समारोह को जीवंत बनाने में सूचना एवं जन-सम्पर्क विभाग के कलाकारों की भूमिका सराहनीय रही। कलाकारों ने सबसे पहले बाबा साहब के प्रिय भजनों की प्रस्तुति दी। इसके पश्चात ‘बिहार गीत’ के बोल जैसे ही गूँजे, उपस्थित जनसमूह में एक अलग ही ऊर्जा का संचार हो गया। देशभक्ति के गीतों ने वातावरण को राष्ट्रप्रेम से सराबोर कर दिया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी कलाकारों के संगीत को काफी देर तक सुना और उनकी सराहना की। आरती पूजन और भजनों के माध्यम से यह संदेश देने की कोशिश की गई कि बाबा साहब का जीवन केवल कानूनों का संग्रह नहीं था, बल्कि वह मानवीय संवेदनाओं और समानता की एक पवित्र आरती की तरह था।

​समारोह के दौरान सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ उमड़ी थी। पटना के विभिन्न कोनों से आए लोगों ने बाबा साहब के जयकारे लगाए। सुरक्षा के कड़े इंतजामों के बीच आम जनता ने भी अपने मसीहा को नमन किया। जिला प्रशासन और पुलिस के आला अधिकारियों ने यह सुनिश्चित किया कि राजकीय प्रोटोकॉल का पूरी तरह पालन हो और आम लोगों को भी दर्शन में असुविधा न हो।

बिहार की राजनीति में अम्बेडकर जयंती का विशेष संदर्भ: 2026 का मोड़

​आज की इस जयंती का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि यह बिहार के एक बड़े सत्ता परिवर्तन के दिन ही पड़ी है। नीतीश कुमार ने अपने दो दशकों के शासनकाल में हमेशा बाबा साहब के ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो’ के नारे को अपनी नीतियों का आधार बनाया। चाहे वह दलितों और पिछड़ों के लिए आरक्षण की व्यवस्था हो या महादलित विकास मिशन की स्थापना, नीतीश कुमार ने अम्बेडकर के सपनों को जमीन पर उतारने की भरपूर कोशिश की।

​आज जब वे मुख्यमंत्री के रूप में अंतिम बार बाबा साहब के सामने झुके, तो यह एक युग की पूर्णता का संकेत था। दूसरी ओर, भाजपा के सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा जैसे नेताओं का उसी श्रद्धा के साथ वहां खड़ा होना यह दर्शाता है कि भविष्य का नेतृत्व भी सामाजिक समरसता की इसी राह पर चलने के लिए तैयार है। यह समारोह एक तरह से सत्ता के सहज और गरिमापूर्ण हस्तांतरण की प्रस्तावना बन गया। अम्बेडकर जयंती पर होने वाला यह आयोजन केवल एक सरकारी कैलेंडर का हिस्सा नहीं, बल्कि बिहार की नई राजनैतिक दिशा का प्रस्थान बिंदु भी बन गया है।

सतुआन और जयंती: परंपरा और प्रगति का मिलन

​आज बिहार सतुआन का पर्व भी मना रहा है। सतुआन और अम्बेडकर जयंती का एक ही दिन होना बिहार की सांस्कृतिक और राजनैतिक जड़ों को और मजबूती देता है। सतुआन जहाँ माटी की खुशबू और सेहत का संदेश देता है, वहीं अम्बेडकर जयंती समाज की सेहत और संवैधानिक अधिकारों की बात करती है। समारोह स्थल पर मौजूद कई लोगों ने इस सुखद संयोग की चर्चा की। मुख्यमंत्री ने भी इस अवसर पर राज्यवासियों को सतुआन और अम्बेडकर जयंती, दोनों की शुभकामनाएं दीं।

​यह राजकीय समारोह दोपहर तक चला, जिसके बाद मुख्यमंत्री सीधे सचिवालय के लिए रवाना हुए जहाँ उनकी कैबिनेट की आखिरी बैठक प्रस्तावित थी। पटना की सड़कों पर बाबा साहब की झांकियां और उनके विचार लिखे हुए पोस्टर आज एक नई उम्मीद जगा रहे हैं। समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को मुख्यधारा में लाने का जो संकल्प बाबा साहब ने लिया था, उसे आज के इन प्रतीकों और राजनैतिक चेहरों के माध्यम से फिर से दोहराया गया।

निष्कर्ष: बाबा साहब के विचार और बिहार का भविष्य

​भारत रत्न डॉ. भीमराव अम्बेडकर की 135वीं जयंती (2026) के इस अवसर पर पटना हाईकोर्ट के समीप हुआ यह आयोजन सदियों तक याद रखा जाएगा। राज्यपाल और मुख्यमंत्री की ‘भावभीनी श्रद्धांजलि’ केवल शब्दों का खेल नहीं थी, बल्कि यह उस अटूट विश्वास का प्रकटीकरण था जो बिहार की जनता का अपने संविधान और लोकतंत्र पर है। बिहार आज बदलाव की दहलीज पर है, और इस बदलाव की गवाह बाबा साहब की वह आदमकद प्रतिमा बनी है जो शांति और स्थिरता के साथ पटना के आसमान के नीचे खड़ी है।

​राजनीति में चेहरे बदलते रहेंगे, पद आते-जाते रहेंगे, लेकिन बाबा साहब द्वारा गढ़ा गया लोकतंत्र और समानता का मंत्र बिहार की गलियों में हमेशा गूँजता रहेगा। आज के इस समारोह ने यह सिद्ध कर दिया है कि बिहार की राजनीति चाहे कितनी भी उथल-पुथल भरी क्यों न हो, जब बात संविधान निर्माता की आती है, तो पूरा प्रदेश एक स्वर में उन्हें नमन करता है। The Voice of Bihar इस पावन अवसर पर बाबा साहब के विचारों को जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प दोहराता है।

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