95 की उम्र में भी खेतों में सक्रिय पद्मश्री डॉ. गोपालजी त्रिवेदी, लीची बागानों को दिया नया जीवन; किसानों की आय में बड़ा इजाफा

मुजफ्फरपुर/पटना: जहां आमतौर पर लोग 95 वर्ष की उम्र में आराम की जिंदगी चुनते हैं, वहीं आज भी खेतों में उतरकर किसानों के लिए नई राह तैयार कर रहे हैं। पद्मश्री से सम्मानित इस कृषि वैज्ञानिक ने अपनी तकनीक और अनुभव के दम पर बिहार की मशहूर लीची के पुराने बागानों को नया जीवन दिया है और हजारों किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है।

कैनोपी मैनेजमेंट से बदली तस्वीर

मुजफ्फरपुर और आसपास के इलाकों में फैले लीची के बागों में 40-50 साल पुराने पेड़ अब कम उत्पादन देने लगे थे। ऐसे में डॉ. त्रिवेदी ने ‘कैनोपी मैनेजमेंट’ तकनीक विकसित कर एक नई उम्मीद जगाई।

इस तकनीक के तहत:

  • पेड़ों की वैज्ञानिक छंटाई (Pruning) कर ऊंचाई नियंत्रित की जाती है
  • पेड़ों के भीतर धूप और हवा का बेहतर प्रवाह सुनिश्चित होता है
  • कीटों और बीमारियों का असर कम होता है
  • जैविक खाद और सूक्ष्म पोषक तत्वों से पेड़ों को पोषण मिलता है

विशेषज्ञों के अनुसार, इस तकनीक से उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। जहां पहले एक पेड़ से औसतन 100 किलो फल मिलता था, अब यह बढ़कर करीब 115 किलो तक पहुंच गया है।

हजारों हेक्टेयर बागानों का कायाकल्प

बताया जा रहा है कि इस तकनीक के जरिए बिहार में करीब 5,000 हेक्टेयर से अधिक लीची बागानों को पुनर्जीवित किया जा चुका है। इससे न सिर्फ उत्पादन बढ़ा है, बल्कि फल की गुणवत्ता भी बेहतर हुई है, जिससे किसानों को बाजार में बेहतर कीमत मिल रही है।

जलजमाव को बनाया कमाई का जरिया

उत्तर बिहार की एक बड़ी समस्या ‘जलजमाव’ को भी डॉ. त्रिवेदी ने अवसर में बदल दिया। उन्होंने ‘बाबा परियोजना’ (Bihar Aquaculture Based Agriculture) के जरिए परती और पानी भरी जमीन को आय का स्रोत बना दिया।

इस मॉडल में शामिल हैं:

  • मत्स्य पालन (Fish Farming)
  • मखाना और सिंघाड़ा उत्पादन
  • एकीकृत खेती प्रणाली

इससे:

  • किसानों की आमदनी में कई गुना वृद्धि हुई
  • करीब 30 लोगों को सीधे और 200 से अधिक लोगों को परोक्ष रोजगार मिला
  • पर्यावरण और भूजल स्तर में भी सुधार देखने को मिला

सामाजिक बदलाव में भी निभाई भूमिका

डॉ. त्रिवेदी का योगदान सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने सामाजिक बदलाव के क्षेत्र में भी अहम काम किया।

  • के साथ मिलकर माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में कृषि के जरिए शांति स्थापित करने की पहल
  • के साथ ग्रामीण विकास मॉडल पर काम

उनका मानना है कि तकनीक तभी सफल है जब उसका फायदा सीधे किसान तक पहुंचे।

किसानों के लिए मिसाल

डॉ. त्रिवेदी की सोच साफ है—“खेती को लाभकारी बनाना और पर्यावरण को सुरक्षित रखना”
उनकी तकनीक और प्रयोग आज किसानों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं।

95 साल की उम्र में भी डॉ. गोपालजी त्रिवेदी का जज्बा यह साबित करता है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो उम्र सिर्फ एक संख्या है। उनके प्रयासों ने न सिर्फ खेती की दिशा बदली है, बल्कि हजारों किसानों के जीवन में समृद्धि का नया अध्याय जोड़ा है।

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