सबौर/भागलपुर, 11 जुलाई 2025 – बिहार अब जैविक सिंदूर के उत्पादन में भी अग्रणी बनने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर की पहल पर अब बड़े पैमाने पर जैविक सिंदूर की खेती की जाएगी। इस प्रयास से न केवल रोजगार के नए अवसर खुलेंगे, बल्कि नारी सशक्तिकरण को भी बढ़ावा मिलेगा।
‘लिपस्टिक ट्री’ से निकलेगा जैविक सिंदूर
बिहार कृषि विश्वविद्यालय ने अपने परिसर में बिक्सा ओरेलाना (Bixa Orellana) के 200 पौधे लगाए हैं, जिसे आमतौर पर ‘लिपस्टिक ट्री’ कहा जाता है। यही पौधा प्राकृतिक और जैविक सिंदूर का मुख्य स्रोत है। यह सिंदूर त्वचा के लिए सुरक्षित, रासायनिक तत्वों से मुक्त और औषधीय गुणों से भरपूर होता है।
बीएयू के वैज्ञानिकों के अनुसार, इस सिंदूर में त्वचा रोग, आंखों के संक्रमण और यहां तक कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से लड़ने की क्षमता भी हो सकती है।
बाजार में मिल रहे सिंदूर से खतरा
फिलहाल बाजारों में मिलने वाले अधिकांश सिंदूर में कैमिकल और कृत्रिम रंग होते हैं, जो महिलाओं के लिए स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकते हैं। इसी को देखते हुए BAU ने पहले मधुबनी जिले में जैविक सिंदूर की खेती शुरू की थी। अब विश्वविद्यालय परिसर में लगाए गए पौधे 2-3 साल में फल देने लगेंगे, जिससे प्राकृतिक सिंदूर तैयार किया जाएगा।
गांवों में लगेगी प्रसंस्करण इकाइयां
बीएयू के कुलपति डॉ. डीआर सिंह इस परियोजना को आगे बढ़ाने में निरंतर प्रयासरत हैं। उनका उद्देश्य है कि आने वाले समय में कई गांवों में जैविक सिंदूर की प्रोसेसिंग यूनिट्स स्थापित की जाएं। इससे स्थानीय महिलाओं को रोजगार मिलेगा, और वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकेंगी।
डॉ. सिंह ने कहा:
“सिंदूर सिर्फ एक श्रृंगार नहीं, बल्कि शक्ति और संस्कार का प्रतीक है। जैविक सिंदूर की खेती से हम परंपरा को सुरक्षित रखते हुए समाज को भी सशक्त बना सकते हैं।”
प्राकृतिक खुशबू और अलग पहचान
बीएयू के अनुसार, पहले चरण में लगाए गए कुछ पौधों से जब प्राकृतिक सिंदूर तैयार हुआ तो उसकी खुशबू और रंग अन्य सिंदूरों से बिलकुल अलग थी। यही वजह है कि अब इसे बाजार में विशेष पहचान दिलाने की तैयारी की जा रही है।


