90 मिनट में 50 बार गूंजा नाम: सदन में नहीं थे फिर भी क्यों छाए रहे नीतीश कुमार

पटना। बिहार विधानसभा के विशेष सत्र में एक दिलचस्प और राजनीतिक रूप से अहम तस्वीर देखने को मिली। सदन में शारीरिक रूप से मौजूद न होने के बावजूद नीतीश कुमार पूरे समय चर्चा के केंद्र में बने रहे। करीब 90 मिनट तक चली बहस के दौरान उनका नाम 50 से अधिक बार लिया गया। यह न केवल उनके राजनीतिक कद को दर्शाता है, बल्कि बिहार की सियासत में उनकी गहरी पकड़ का भी संकेत देता है।

करीब दो दशकों में यह दूसरा मौका था जब विधानसभा की कार्यवाही के दौरान नीतीश कुमार मौजूद नहीं थे। बावजूद इसके, सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक—हर किसी के भाषण में उनका जिक्र बार-बार सुनाई दिया। इससे साफ है कि भले ही उन्होंने मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया हो, लेकिन बिहार की राजनीति में उनका प्रभाव अब भी बरकरार है।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बताया ‘गार्जियन’

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपने संबोधन में नीतीश कुमार को विशेष सम्मान देते हुए उन्हें ‘गार्जियन’ की भूमिका में बताया। उन्होंने कहा कि आज वे जिस पद पर हैं, उसमें नीतीश कुमार की इच्छा शक्ति और मार्गदर्शन का बड़ा योगदान है।

सम्राट चौधरी ने यह भी कहा कि बिहार में ‘सुशासन’ की जो अवधारणा बनी, उसका श्रेय पूरी तरह से नीतीश कुमार को जाता है। उन्होंने उनके कार्यकाल की कई योजनाओं और उपलब्धियों का जिक्र करते हुए यह संकेत दिया कि उनकी सरकार उसी विकास मॉडल को आगे बढ़ाएगी।

विजय चौधरी हुए भावुक, ‘दीपक’ से की तुलना

उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने भी अपने भाषण में नीतीश कुमार की अनुपस्थिति को महसूस किया। उन्होंने कहा कि सदन में एक खालीपन सा लग रहा है। उन्होंने नीतीश कुमार की तुलना एक ऐसे ‘दीपक’ से की, जिसकी रोशनी में सभी ने लंबे समय तक काम किया।

विजय चौधरी ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार नीतीश कुमार की नीतियों और उनके विकास के विजन को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। उनके अनुसार, बिहार में जो विकास की नींव रखी गई है, उसे और मजबूत किया जाएगा।

जदयू और सहयोगी दलों का समर्थन

जदयू विधायक दल के नेता श्रवण कुमार ने भी अपने संबोधन में नीतीश कुमार का जिक्र करते हुए कहा कि पार्टी के सभी विधायक उनके निर्देश पर विश्वास मत का समर्थन कर रहे हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि जदयू के भीतर अब भी नीतीश कुमार का प्रभाव कायम है।

सिर्फ जदयू ही नहीं, बल्कि सहयोगी दलों के नेताओं ने भी अपने भाषण में नीतीश कुमार के कार्यकाल और उनकी नीतियों की चर्चा की। रालोमो, एआईएमआईएम और वाम दलों के नेताओं ने भी उनके शासनकाल की कुछ उपलब्धियों का उल्लेख किया।

‘ब्रांड एंबैसडर’ और ‘सामाजिक सौहार्द’ की चर्चा

कुछ नेताओं ने नीतीश कुमार को बिहार का ‘ब्रांड एंबैसडर’ तक करार दिया। उनके शासनकाल में सामाजिक सौहार्द और कानून-व्यवस्था को लेकर किए गए कार्यों की सराहना भी की गई।

उनके समर्थकों का मानना है कि बिहार की छवि सुधारने में नीतीश कुमार की बड़ी भूमिका रही है। यही कारण है कि आज भी उनका नाम राजनीतिक बहसों के केंद्र में बना रहता है।

विपक्ष ने भी उठाए सवाल

दिलचस्प बात यह रही कि विपक्ष ने भी अपने हमलों में नीतीश कुमार का जिक्र किया। विपक्षी नेताओं ने कहा कि मौजूदा सरकार को जो जनादेश मिला है, वह काफी हद तक नीतीश कुमार के नाम और उनके काम के आधार पर मिला है।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अगर सरकार नीतीश कुमार के नाम पर बनी है, तो उनकी भूमिका को नजरअंदाज कैसे किया जा सकता है। विपक्ष का यह तर्क भी इस बात को मजबूत करता है कि नीतीश कुमार आज भी बिहार की राजनीति के केंद्रीय चेहरा बने हुए हैं।

राजनीतिक संदेश क्या है?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम का एक बड़ा संदेश है। नीतीश कुमार भले ही अब मुख्यमंत्री नहीं हैं और राज्यसभा में चले गए हैं, लेकिन उनका प्रभाव सत्ता और संगठन दोनों में बना हुआ है।

सत्ता पक्ष के लिए उनका नाम एक मार्गदर्शक और अनुभव का प्रतीक है, जबकि विपक्ष के लिए वह एक ऐसा चेहरा हैं, जिसके नाम पर सवाल उठाकर सरकार को घेरा जा सकता है।

बिहार विधानसभा के इस सत्र ने यह स्पष्ट कर दिया कि राजनीति में केवल पद ही सब कुछ नहीं होता, बल्कि व्यक्ति का प्रभाव और उसकी छवि भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। नीतीश कुमार इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आए हैं।

90 मिनट की बहस में 50 बार नाम लिया जाना इस बात का प्रमाण है कि वे आज भी बिहार की राजनीति के केंद्र में हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी यह भूमिका किस तरह से राज्य की सियासत को प्रभावित करती है।

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