नालंदा | 21 फरवरी, 2026: नालंदा जिले के चंडी प्रखंड अंतर्गत बढौना पंचायत के किसानों के लिए आज का शनिवार बड़ी राहत लेकर आया। पिछले लंबे समय से फसलों को बर्बाद कर रहे घोड़परास (नीलगाय) के आतंक को खत्म करने के लिए वन विभाग और स्थानीय प्रशासन ने साझा ‘सफारी’ अभियान चलाया। फसलों की तबाही देख खून के आंसू रो रहे किसानों की गुहार पर मुखिया अशोक शर्मा की सक्रियता रंग लाई और पंजीकृत शूटरों ने एक ही दिन में 25 घोड़परास मार गिराए।
600 एकड़ फसल पर मंडरा रहा था ‘नीला’ खतरा
बढौना पंचायत के किसानों की व्यथा किसी से छिपी नहीं थी। लगभग 600 एकड़ की उपजाऊ भूमि पर लगी फसलें घोड़परास के पैरों तले रौंदी जा रही थीं।
- प्रभावित फसलें: गेहूं, सरसों, चना, धनिया और मसूर।
- नुकसान का तरीका: ये जानवर न केवल फसलें खाते थे, बल्कि झुंड में दौड़कर पौधों को पूरी तरह कुचल देते थे, जिससे किसानों की महीनों की मेहनत मिट्टी में मिल रही थी।
ऑपरेशन ‘घोड़परास’: अस्सी और बढौना खंधा में गूंजी गोलियां
किसानों के बढ़ते आक्रोश और मुखिया की लिखित शिकायत पर वन विभाग ने त्वरित संज्ञान लिया। शनिवार को पंजीकृत शूटरों की एक अनुभवी टीम टाल क्षेत्रों में पहुँची।
- सर्च ऑपरेशन: अस्सी खंधा और बढौना खंधा के इलाकों में घंटों तक तलाशी अभियान चला।
- कार्रवाई: सटीक निशानेबाजी के जरिए 25 घोड़परास को मार गिराया गया।
- सुरक्षा: इस दौरान वन विभाग के कर्मी और स्थानीय पुलिस भी मुस्तैद रही ताकि किसी तरह की अप्रिय घटना न हो।
पूरे जिले में आतंक: सरकार का मास्टर प्लान
सिर्फ चंडी ही नहीं, बल्कि नालंदा के रहूई, सरमेरा, अस्थावां और हरनौत जैसे क्षेत्रों में भी घोड़परास ने किसानों की नींद उड़ा रखी है। हालात इतने खराब हैं कि किसान कड़ाके की ठंड में भी रातभर खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं।
सरकार का नया कदम:
किसानों के व्यापक नुकसान को देखते हुए राज्य सरकार ने अब पंजीकृत शूटरों की संख्या बढ़ाकर 400 करने का लक्ष्य रखा है। प्रशासन का मानना है कि शूटरों की संख्या बढ़ने से बिहार के अन्य प्रभावित जिलों में भी घोड़परास के आतंक पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकेगा।
”किसानों का दर्द देखा नहीं जा रहा था। बैंक से कर्ज लेकर फसल लगाने वाले किसान बर्बाद हो रहे थे। वन विभाग की इस कार्रवाई से कम से कम अब बची हुई फसल सुरक्षित रह पाएगी।”
— अशोक शर्मा, मुखिया, बढौना पंचायत
द वॉयस ऑफ बिहार का नजरिया
नीलगायों का मुद्दा बिहार के कई जिलों में खेती के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। हालांकि, उन्हें मारना एक कड़ा निर्णय है, लेकिन किसानों की आजीविका बचाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर यह कदम उठाना अनिवार्य हो गया था। जरूरत इस बात की है कि इस अभियान को नियमित अंतराल पर चलाया जाए ताकि जानवरों की संख्या संतुलित रहे।
ब्यूरो रिपोर्ट, द वॉयस ऑफ बिहार।


