मुजफ्फरपुर की ‘गुड़िया’ ने बदली सुमेरा पंचायत की तकदीर! लाह की चूड़ियों से खादी मॉल तक का सफर; स्कूटी पर सवार होकर आत्मनिर्भर बन रही हैं गांव की बेटियां

HIGHLIGHTS: मुजफ्फरपुर की इस मुखिया ने ‘घूंघट’ से ‘मॉल’ तक पहुंचाया रास्ता; चूड़ियों की खनक से गूंजी खुशहाली

  • मिसाल: कुढ़नी प्रखंड की सुमेरा पंचायत बनी महिला सशक्तिकरण का ‘रोल मॉडल’।
  • बिजनेस पार्टनर: मुखिया गुड़िया कुमारी ने महिलाओं को लाह की चूड़ियों के कारोबार से जोड़कर पटना के खादी मॉल तक पहुँचाया।
  • आर्थिक क्रांति: घर की दहलीज न लांघने वाली महिलाएं अब स्कूटी खरीद रही हैं और फैक्ट्रियों में सिलाई ऑपरेटर बनी हैं।
  • शिक्षा की रोशनी: महादलित बच्चों के लिए टोले में ही पाठशाला; ड्रॉपआउट रोकने के लिए ‘प्री-स्कूल’ की शुरुआत।

मुजफ्फरपुर | 21 मार्च, 2026

​नीतीश कुमार के ‘आधी आबादी’ को 50 फीसदी आरक्षण देने के फैसले ने बिहार के गांवों की शक्ल बदलनी शुरू कर दी है। इसका सबसे ताजा और जीवंत उदाहरण मुजफ्फरपुर जिले की सुमेरा पंचायत है। यहाँ की मुखिया गुड़िया कुमारी ने साबित कर दिया है कि अगर जनप्रतिनिधि की सोच ‘स्मार्ट’ हो, तो पंचायत भी किसी ‘कॉर्पोरेट ऑफिस’ की तरह काम कर सकती है। यहाँ महिलाएं अब केवल मनरेगा की मजदूरी नहीं कर रहीं, बल्कि ‘हॉर्टिप्रेन्योर’ और ‘बिज़नेस वुमन’ बन रही हैं।

लाह की चूड़ियां और ‘विभा’ की सफलता की कहानी

​2021 में मुखिया पद संभालने के बाद गुड़िया कुमारी ने नाला-सड़क के पारंपरिक कामों से हटकर ‘महिला उद्यमिता’ को अपना मिशन बनाया:

  1. मार्केट लिंकेज: 30 वर्षीय विभा देवी और उनके समूह को मुख्य बाजार से जोड़ा गया।
  2. उद्यमी पुरस्कार: विभा देवी के समूह द्वारा तैयार की गई हाथ की लाह की चूड़ियां अब पटना के खादी मॉल की शोभा बढ़ा रही हैं। इस समूह को पंचायती राज मंत्री द्वारा ‘उद्यमी पुरस्कार’ से भी नवाजा जा चुका है।
  3. विविधता: लाह के काम के अलावा, महिलाएं अब पशुपालन, बकरी पालन और ऑनलाइन सेलिंग से भी जुड़ चुकी हैं।

बदल गई लाइफस्टाइल: सिलाई मशीन से स्कूटी तक

​सुमेरा पंचायत की महिलाएं अब आर्थिक रूप से इतनी मजबूत हो गई हैं कि उनके रहन-सहन का स्तर बदल गया है:

  • सिलाई ऑपरेटर: पंचायत की 28 महिलाएं फैक्ट्रियों में सिलाई ऑपरेटर और मॉल्स में नौकरी कर अच्छी मासिक कमाई कर रही हैं।
  • स्कूटी की सवारी: अपनी मेहनत की कमाई से यहाँ की कई महिलाओं ने स्कूटी खरीद ली है, जो उनकी ‘गतिशीलता’ और ‘आजादी’ का प्रतीक बन गई है।

VOB का नजरिया: क्या ‘सुमेरा मॉडल’ ही बिहार के हर गांव का भविष्य है?

​मुखिया गुड़िया कुमारी की यह पहल केवल रोजगार तक सीमित नहीं है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ का मानना है कि जब एक महिला जनप्रतिनिधि खुद को ‘मैनेजर’ समझकर काम करती है, तभी बदलाव आता है।

​सुमेरा पंचायत में महादलित बच्चों के लिए टोले में ही स्कूल चलाना और आंगनबाड़ियों को ‘प्री-स्कूल’ में बदलना यह दर्शाता है कि यहाँ ‘आज’ (रोजगार) के साथ-साथ ‘कल’ (शिक्षा) पर भी काम हो रहा है। अक्सर मुखिया फंड की बंदरबांट में उलझे रहते हैं, लेकिन गुड़िया कुमारी ने महिलाओं को ‘स्कूटी’ पर बैठाकर यह बता दिया है कि पंचायत के पास संसाधन नहीं, केवल विजन की कमी होती है। अगर बिहार की हर पंचायत ‘सुमेरा’ बन जाए, तो रिवर्स माइग्रेशन (शहरों से गांवों की ओर लौटना) हकीकत बन सकता है।

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