मोतिहारी (बिहार): मोतिहारी से करीब 15 किलोमीटर पश्चिम स्थित वनस्पति देवी का मंदिर एक प्रमुख धार्मिक स्थल है। यह मंदिर राष्ट्रीय राजमार्ग-28 के किनारे, मोतिहारी-बेतिया मार्ग पर सेमरा रेलवे स्टेशन के पास स्थित है। यह स्थान न केवल बिहार, बल्कि उत्तर प्रदेश और नेपाल के श्रद्धालुओं की आस्था का बड़ा केंद्र बन चुका है।
श्रद्धालुओं की अटूट आस्था
वनस्पति देवी मंदिर में सालभर भक्तों का तांता लगा रहता है। खासकर नवरात्रि के दौरान यहां देश-विदेश से श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं। मान्यता है कि माता वनस्पति की कृपा से कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटता और सच्चे मन से की गई पूजा अवश्य फल देती है।
पुजारी की भक्ति और शांति की अनुभूति
मंदिर के पुजारी रामशरण दास का कहना है कि वे प्रतिदिन मां की पूजा करते हैं और इसके बाद उन्हें असीम शांति की अनुभूति होती है। उनका मानना है कि माता की कृपा से कोई भक्त दुखी न रहे। हाल ही में मंदिर के एक अन्य पुजारी राधारमण दास का निधन हुआ, लेकिन पूजा-अर्चना की परंपरा पहले की तरह निर्बाध रूप से जारी है।
मंदिर की ऐतिहासिक कहानी
कहा जाता है कि कई साल पहले यह पूरा इलाका घना जंगल था। स्थानीय निवासी सहदेव पासवान यहां अपने मवेशी चराने आते थे। एक दिन उन्हें एक वृक्ष के पास मिट्टी का पिंड मिला, जिसकी उन्होंने पूजा शुरू कर दी। बाद में माता ने स्वप्न में दर्शन देकर अपनी उपस्थिति का आभास कराया। इसके बाद जंगल को साफ कर मंदिर का निर्माण करवाया गया।
चिकनौटा गांव का महत्व
यह मंदिर सुगौली प्रखंड के चिकनौटा गांव के पास स्थित है और अब आस्था का प्रतीक बन चुका है। यहां अष्टयाम, लखराव, वाहन पूजा और विवाह जैसे धार्मिक आयोजन होते हैं। बड़ी संख्या में बिहार, उत्तर प्रदेश और नेपाल से भक्त यहां पहुंचते हैं।
स्थानीय लोगों का योगदान
स्थानीय निवासी पंकज कुमार बताते हैं कि पहले यहां केवल जंगल था। लोग मवेशी चराने आते और प्रसाद खाते थे। एक रात तीन लोगों को एक ही स्वप्न में माता ने दर्शन देकर पूजा करने का आदेश दिया। इसके बाद स्थानीय लोगों ने मिलकर इस स्थान को मंदिर का रूप दिया।
उन्होंने कहा,
“पहले यहां जंगल था। लोग केवल प्रसाद खाते थे लेकिन पूजा नहीं करते थे। एक ही रात में तीन लोगों को माता ने दर्शन देकर कहा कि पूजा करो। तभी से मंदिर की शुरुआत हुई।”
51 शक्तिपीठों से जुड़ी मान्यता
पुजारी रामशरण दास के अनुसार, यह स्थान प्राचीन और पवित्र है, जहां माता स्वयं प्रकट हुईं। संतों का मानना है कि यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक हो सकता है, जहां देवी का कोई अंग गिरा हो। स्थानीय लोगों के सहयोग से इसका लगातार विकास हो रहा है और यह आज वनस्पति देवी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।


