बिहार में ‘सियासी उत्तराधिकार’ की बिसात: निशांत कुमार और दीपक प्रकाश लड़ेंगे MLC चुनाव; जून में खाली हो रही 10 सीटों पर टिकी सूबे की नजर

पटना। बिहार की राजनैतिक फिजाओं में इन दिनों एक नई और बेहद दिलचस्प पटकथा लिखी जा रही है, जिसके केंद्र में ‘वंशवाद’ बनाम ‘उत्तराधिकार’ की वह बहस है जिसने सूबे के गलियारों को गर्मा दिया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में हाल ही में हुए कैबिनेट विस्तार के बाद अब सबकी निगाहें आगामी विधान परिषद् (MLC) चुनावों पर टिक गई हैं। भरोसेमंद सूत्रों और सचिवालय के गलियारों में तैर रही खबरों की मानें तो पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इकलौते पुत्र निशांत कुमार और राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश की सदन में एंट्री का रास्ता साफ हो गया है। जून महीने में खाली हो रही विधान परिषद् की 10 सीटों को इस ‘सियासी ताजपोशी’ के लिए सबसे मुफीद मंच माना जा रहा है। पटना के राजनैतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह केवल दो युवाओं की सदन में एंट्री नहीं है, बल्कि बिहार की उस ‘विरासत की राजनीति’ का औपचारिक ऐलान है, जिसके लिए पिछले कई महीनों से जमीन तैयार की जा रही थी।

संवैधानिक बाध्यता और 6 महीने की ‘डेडलाइन’

​बिहार कैबिनेट में बतौर स्वास्थ्य मंत्री शामिल हुए निशांत कुमार और पंचायती राज मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे दीपक प्रकाश के सामने वर्तमान में सबसे बड़ी संवैधानिक चुनौती सदन की सदस्यता हासिल करना है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(4) के मुताबिक, यदि कोई व्यक्ति बिना किसी सदन का सदस्य रहे मंत्री पद की शपथ लेता है, तो उसे 6 महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद् का सदस्य बनना अनिवार्य होता है। चूंकि दोनों ही युवा नेताओं ने 07 मई 2026 को मंत्री पद की शपथ ली है, इसलिए नवंबर की शुरुआत से पहले उन्हें सदन की सदस्यता हासिल करनी होगी।

​यही कारण है कि जून में खाली हो रही सीटों को इनके लिए ‘सुरक्षित गलियारे’ के रूप में देखा जा रहा है। विधान परिषद् का रास्ता चुनने के पीछे की रणनीति वही है जो वर्षों तक नीतीश कुमार ने अपनाई—बिना प्रत्यक्ष चुनाव की आपाधापी में पड़े उच्च सदन के जरिए सत्ता के शीर्ष तक पहुँचना।

जून की रिक्तियों का गणित: नीतीश की छोड़ी सीट भी शामिल

​बिहार विधान परिषद् में आगामी जून का महीना बड़े बदलावों का गवाह बनने वाला है। जानकारी के मुताबिक, कुल 10 सीटें इस दौरान खाली हो रही हैं। इनमें से 9 सदस्यों का कार्यकाल 28 जून 2026 को समाप्त हो रहा है। वहीं, एक महत्वपूर्ण सीट वह है जो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद रिक्त हुई है। गौरतलब है कि नीतीश कुमार ने 30 मार्च 2026 को विधान परिषद् की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था और 10 अप्रैल को उन्होंने राज्यसभा सांसद के रूप में शपथ ली थी।

​मुख्यमंत्री की यह रिक्त सीट अब उनके पुत्र निशांत कुमार के लिए सबसे प्रबल विकल्प मानी जा रही है। निर्वाचन आयोग की ओर से मई के अंतिम सप्ताह तक इन 10 सीटों पर चुनाव के लिए आधिकारिक अधिसूचना जारी होने की प्रबल संभावना है। इन रिक्तियों में सत्ताधारी गठबंधन और विपक्ष के बीच सीटों का बंटवारा विधानसभा में उनके संख्या बल के आधार पर होगा, जिसमें एनडीए का पलड़ा भारी नजर आ रहा है।

निशांत कुमार: जदयू की ‘सेकेंड जनरेशन’ का आगाज

​निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री किसी सरप्राइज से कम नहीं रही है। वर्षों तक खुद को लाइमलाइट से दूर रखने वाले निशांत ने मार्च 2026 में औपचारिक रूप से जदयू का दामन थामा था। हाल ही में उन्होंने पश्चिम चंपारण के बगहा से ‘सद्भाव यात्रा’ की शुरुआत की थी, जिसे उनके राजनैतिक ‘लॉन्चपैड’ के रूप में देखा गया। जदयू के भीतर एक बड़ा वर्ग उन्हें नीतीश कुमार के ‘क्लीन और सुलझे हुए’ उत्तराधिकारी के रूप में पेश कर रहा है।

​कैबिनेट में उन्हें स्वास्थ्य जैसा भारी-भरकम विभाग सौंपना यह दर्शाता है कि गठबंधन उन पर बड़ा दांव खेल रहा है। हालांकि, विपक्ष इसे ‘परिवारवाद’ का नया अध्याय बता रहा है, लेकिन जदयू समर्थकों का तर्क है कि निशांत अपनी योग्यता और प्रशासनिक सूझबूझ से खुद को साबित करेंगे। उनके लिए विधान परिषद् का चुनाव एक औपचारिक प्रक्रिया मात्र होगी, क्योंकि गठबंधन के पास उन्हें जिताने के लिए पर्याप्त संख्या बल मौजूद है।

दीपक प्रकाश और कुशवाहा वोट बैंक की कमान

​उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र दीपक प्रकाश की कहानी भी निशांत से काफी मिलती-जुलती है। बीटेक की डिग्री रखने वाले दीपक ने पिछले कुछ समय में राष्ट्रीय लोक मोर्चा के सांगठनिक कार्यों में सक्रियता दिखाई है। उन्हें सम्राट चौधरी कैबिनेट में पंचायती राज मंत्री बनाया गया है। दीपक की सदन में एंट्री के जरिए एनडीए नेतृत्व कुशवाहा समाज के युवाओं के बीच एक संदेश देना चाहता है कि पार्टी में नई पीढ़ी को पूरा सम्मान दिया जा रहा है।

​दीपक प्रकाश के लिए एमएलसी सीट की मांग उपेंद्र कुशवाहा की उस राजनैतिक सौदेबाजी का हिस्सा मानी जा रही है, जिसके तहत उन्होंने गठबंधन को मजबूती प्रदान की है। दीपक प्रकाश की कार्यशैली और उनकी तकनीकी पृष्ठभूमि उन्हें एक आधुनिक राजनेता के रूप में पेश करती है, जो पंचायती राज जैसे जमीनी विभाग में नवाचार लाने की क्षमता रखते हैं।

MLC मार्ग ही क्यों? नीतीश की राह पर नई पीढ़ी

​बिहार की राजनीति में यह चर्चा आम है कि नीतीश कुमार ने हमेशा प्रत्यक्ष चुनावों की तुलना में उच्च सदन को तरजीह दी है। उन्होंने साल 2005 के बाद से कभी भी विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा और हमेशा विधान परिषद् के जरिए ही मुख्यमंत्री बने रहे। अब निशांत कुमार और दीपक प्रकाश के लिए भी इसी रास्ते को चुना गया है।

​इसके पीछे कई रणनीतिक कारण बताए जा रहे हैं:

  • सुरक्षित विकल्प: उपचुनावों में किसी विधानसभा सीट पर जाने से बेहतर है कि संख्या बल के आधार पर परिषद् के जरिए सुरक्षित सदन पहुँचा जाए।
  • समय की बचत: विधानसभा उपचुनाव में पूरी ताकत झोंकने के बजाय मंत्री के रूप में विभागीय कार्यों पर ध्यान केंद्रित करना आसान होगा।
  • भविष्य की तैयारी: विधान परिषद् की सदस्यता से दोनों युवा नेताओं को सदन की कार्यवाही समझने और अपना संसदीय कौशल निखारने का पर्याप्त समय मिलेगा।

बिहार की भावी राजनीति पर प्रभाव

​निशांत और दीपक की सदन में एंट्री के साथ ही बिहार की राजनीति में ‘लीगेसी’ का एक नया दौर शुरू होगा। आरजेडी के तेजस्वी यादव पहले से ही स्थापित हैं, वहीं अब एनडीए की ओर से निशांत कुमार एक नया चेहरा बनकर उभरेंगे। यह मुकाबला 2030 तक की बिहार की राजनीति की दिशा तय करेगा।

​आगामी कुछ हफ्तों में पटना की सड़कों पर इन चुनावों को लेकर पोस्टर और बैनरों की जंग तेज होने वाली है। जदयू और आरएलएम के कार्यकर्ता अपने-अपने ‘युवा नेताओं’ के लिए जमीन तैयार करने में जुट गए हैं। मई के अंत में अधिसूचना आने के बाद यह साफ हो जाएगा कि इन 10 सीटों के लिए कौन-कौन से चेहरे मैदान में होंगे, लेकिन फिलहाल निशांत और दीपक का नाम सबसे ऊपर है। बिहार की जनता यह देखना चाहती है कि क्या ये युवा नेता अपने पिताओं की तरह ही बिहार की जटिल राजनीति की नब्ज को पकड़ पाते हैं या नहीं। विधान परिषद् का यह चुनाव केवल एक पद की लड़ाई नहीं, बल्कि बिहार के सियासी भविष्य की एक बड़ी परीक्षा साबित होने वाला है।

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