
पटना | बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने के लिए सरकार ने अपनी रणनीति बदल दी है। अब राज्य के विभिन्न जिलों में खुलने वाले नए मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल पूरी तरह सरकारी नहीं होंगे, बल्कि उन्हें पीपीपी मोड (लोक निजी भागीदारी) पर बनाया जाएगा। शुक्रवार को विधानसभा में एक सवाल के जवाब में उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने यह घोषणा की।
सरकार की मजबूरी: “पैसा खर्च हो रहा, पर डॉक्टर नहीं जा रहे”
सम्राट चौधरी ने सदन में स्वीकार किया कि सुदूर जिलों में हालात ठीक नहीं हैं। उन्होंने दो टूक कहा:
- डॉक्टरों की मनमानी: “हम बेतिया और मधेपुरा मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों को भेजते हैं, लेकिन वे वहां जाने को तैयार नहीं होते।”
- फंड की बर्बादी: “सरकार मेडिकल कॉलेजों के निर्माण और संचालन पर भारी-भरकम पैसा खर्च करती है, लेकिन जब डॉक्टर ही नहीं रहेंगे तो जनता को उसका लाभ नहीं मिल पाता।”
- समाधान: इसी को देखते हुए सरकार ने अब ‘सात निश्चय-3’ के तहत पीपीपी मोड को प्रोत्साहित करने का फैसला किया है, ताकि पढ़ाई और इलाज दोनों बेहतर हो सके।
सहरसा के लिए गुड न्यूज: सत्तरकटैया में बनेगी बिल्डिंग
सहरसा में मेडिकल कॉलेज की मांग कर रहे लोगों के लिए अच्छी खबर है। विधायक इंद्रजीत प्रसाद गुप्ता के सवाल पर प्रभारी मंत्री प्रमोद चंद्रवंशी ने अपडेट दिया:
- मंजूरी: सहरसा मेडिकल कॉलेज को 20 सितंबर 2023 को मंजूरी मिली थी।
- जमीन: अब राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने 19 मई 2025 को सहरसा के सत्तरकटैया में 21.27 एकड़ जमीन ट्रांसफर करने की मंजूरी दे दी है। जल्द ही यहां निर्माण कार्य आगे बढ़ेगा।


